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आस्था पर एक और हमला

अब हमारी आस्थाओं की आश्रयस्थली – मंदिर भी असुरक्षित हो चले हैं। आतंक की जड़ें निर्दोष श्रद्धालुओं को काल का ग्रास बनाने लगी हैं। क्या अब भारतीय हिन्दु मंदिरों में पूजा के लिये एकत्र होने तक के लिये दस बार सोचेंगे? यह हमारी आस्थाओं पर कैसा आघात है? इसके लिये कौन ज़िम्मेदार है? महज हमारा सीमा पार का पडौी देश व इस्लामिक आतंकवाद? या 'हिन्दु राष्ट्र के निर्माण' की अतिवादी ज़िद? क्यों एक मजबूत राष्ट्र साल दर साल यह आतंकवाद क्यों सहता आ रहा है? हर सरकार यहीं आकर असफल क्यों हो जाती है? हर समस्या अंतत: वोट की राजनीति पर आकर क्यों अटक जाती है?

गांधी नगर के अक्षरधाम मंदिर में ढाये गये आतंकवादी कहर के बाद अब जम्मू में हाल ही में हुए रघुनाथ मंदिर के अतिरिक्त दो पूजा स्थलों पर आतंकवादी हमले के बाद यह आतंकवाद का नया चेहरा सामने आया है। हर हमले के बाद किसी नये उगे आतंकवादी गुट का नाम उभरता है हमले की ज़िम्मेदारी की स्वीकारोक्ति में। इस बार इस्लामिक फ्रन्ट संगठन ने ज़िम्मेदारी ली है। अक्षरधाम मंदिर में हमले की ज़िम्मेदारी एक अलग ही 'तहरीके मसाक' नामक आतंकवादी संगठन ने ली थी। लगाये अमेरिका गिने चुने इस्लामिक आतंकवादी संगठनों पर रोक ‚ कितनों पर रोक लगायेगा? यह तो हर बार नये नामों‚ नये निशानों के साथ ज़हरीले कुकुरमुत्तों की तरह पूरे विश्व में फैल जायेंगे। हर बार नया हमला‚ नया नाम।

कश्मीर में पिछले सप्ताह से इन आतंकवादी हमलों की प्रक्रिया में अचानक तेजी आई है। शुक्रवार को सीआरपीएफ कैम्प पर हमला हुआ‚ शनिवार को सेना की बस उड़ाई और रविवार को 1860 में बने इस भव्य रघुनाथ मंदिर पर ग्रेनेडों से हमला किया जिसमें सुरक्षाकर्मियों सहित 12 लोग मारे गये। यह आतंकवाद आखिर किस बात की हड़बड़ाई हुई प्रतिक्रिया है? जम्मू कश्मीर की जनता के पूर्ण सहयोग से चुनी गई नवनिर्वाचित सरकार के खिलाफ है यह प्रतिक्रिया अथवा विश्व हिन्दु परिषद तथा बजरंग दल की अतिरंजित धमकियों से भरी भाषा का परिणाम है यह? यह अतिवादी धार्मिकता हम भारतीयों को किस कगार पर ले जा रही है?

गोधराकाण्ड का बर्बर बदला फिर उस बदले का एक और बदला… उस पर बाहरी इस्लामिक देशों का आतंकवादी हस्तक्षेप… मंदिरों पर हमले‚ निर्दोष जनता पर अत्याचार? आखिर आम भारतीय इस दशहत से अपना सर छिपाए तो कहाँ छिपाये?

एक ओर भाजपा सरकार से संघ परिवार तो उखड़ा हुआ ही है तथा विहिप तथा बजरंग दल जैसे संगठन भी भाजपा को सबक सिखाने पर तुले हैं। ऐसे में भाजपा के लिये सरकार चलाना पतली रस्सी पर चलने जैसा है। विहिप के अन्तर्राष्ट्रीय सचिव प्रवीण तोगड़िया के भावना भड़काऊ बयान भाजपा सरकार के लिये नाक का बाल साबित हो रहे हैं। तो दूसरी ओर देश में इस्लामी आतंकवादी संगठन अपनी जड़ें जमा रहे हैं। वे जब तब देश की अस्मिता तथा संप्रभुता की धज्जियां उड़ा कर रख देते हैं। राजनैतिक हालात इस कदर खराब हैं कि हर आतंकवादी घटना के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष में आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला शुरु हो जाता है। जिससे आतंकवादी संगठनों को बढ़ावा मिलता है। ऐसे में सरकार के लिये आतंकवाद पर काबू पाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। ये साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण भारत में कभी कुशल प्रशासन चलने देगा भी या नहीं?

रघुनाथ मंदिर पर हमले के साथ ही यह तो स्पष्ट हो गया है कि जम्मू कश्मीर में सरकार चलाने के लिये और मुख्यमंत्री पद के लिये जो जोड़तोड़ हुई है‚ गठबंधन हुआ है वह सरकार तथा वह पद एक कांटों के ताज से कम नहीं है। अब चाहे सीमापार आतंकवाद पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और कांग्रेस की इस मिलीजुली सरकार के पांव उखाड़े या विहिप व बजरंग दल हिन्दुराष्ट्र के नारों से आतंकित करे। इस सरकार के खिलाफ दोनों तरह की अतिवादी धार्मिकता खड़ी है‚ एक ओर कुंआ दूसरी ओर खाई की तरह।

इस बार 'गुजरात' विधान सभा के चुनावों में नरेन्द्र मोदी की जीत के साथ ही सांप्रदायिक टकराव के केन्द्र के रूप में चर्चित हो चला है। इस साल के आरंभ में हुई साम्प्रदायिक हिंसा के बाद गुजरात में हिन्दु एकता भले ही शक्ति बन गयी हो और नरेन्द्र मोदी हिन्दुत्व के प्रतीक – पुरुष मगर गुजरात ऐसा राज्य बन गया है जहाँ रहना और बसना आसान काम नहीं।

आज भारत में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण अपने चरम पर है और इस साम्प्रदायिक नफरत की लहर पर राज्यों की विधानसभा के चुनाव हारे व जीते जा रहे हैं। इसका खामियाजा एक आम भारतीय भुगतता है। कभी गोधरा काण्ड के रूप में‚ फिर इस काण्ड के बदले में हताहत होता है ‚ फिर बदले के बदले की कार्यवाही में मंदिर में पूजा के दौरान मारा जाता है। इन बुरी तरह उलझे मसलों को सत्ता की कीमत पर सुलझाना आसान काम नहीं‚ पिछले कई सालों से लगातार चारों ओर फैलते धार्मिकता के इस रायते को हमारी पिछली कई सरकारें समेट नहीं सकी तो हम वर्तमान सरकार से क्या उम्मीद करें जिसकी दस पैबन्दों से जुड़ी गठबन्धन की चादर इधर से खींचो तो उधर से खुल जाती है।

एक आम भारतीय को तो चारों दिशाओं से हालात की मार खानी ही है – अकाल‚ भुखमरी‚ मंहगाई‚ बेरोजगारी उस पर आतंकवाद की प्राणघाती चोट?  उसकी थकी हारी आस्था को आश्रय देते मंदिर भी अब सुरक्षित नहीं?

– मनीषा कुलश्रेष्ठ
 

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