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सहअस्तित्व  

सहअस्तित्व व समन्वय भारत के लिये नया विषय नहीं है। सदियों से हम भारतीय अनेकानेक धर्मों‚ संस्कृतियों‚ भाषाओं के साथ सहअस्तित्व तथा समन्वय स्थापित करके जीने के आदी रहे हैं। फिर आज भारतीयों को यह समझाना बेमानी है कि सहअस्तित्व क्या है‚ और क्या है समन्वय! यह हमारी रगों में है‚ मगर आज हम इसे उपेक्षित कर बैठे हैं।

इस समय हमारा देश एक विचित्र संकट से गुज़र रहा है। गहनता से मनन किया जाये तो साम्प्रदायिक एकता में ज़हर घोलने का काम अगर सबसे पहले अंग्रेज़ों ने किया तो उसके बाद से अब तक ये वोट बैंक के लालची नेता व राजनैतिक पार्टियां कर रही हैं। वरना एक मोहल्ले में रहने वाले‚ दु:ख मुसीबत में काम आने वाले‚ एक दूसरे के व्यवसायों पर निर्भर रहने वाले आम शहरी को क्या लेना देना कि उसका पड़ौसी घर में कौनसा धर्म निर्वाह करता है? वह कौनसा धर्मगन्थ पढ़ता है? वह धर्मग्रन्थ क्या कहता है? किसके पास समय है आज की व्यस्ततापूर्ण ज़िन्दगी में? मानव के लिये समाज सम्प्रदाय से बड़ा है‚ जहाँ सहअस्तित्व ही काम आता है‚ समाज के लिये सम्प्रदाय से महत्वपूर्ण है एक अच्छा इन्सान। चाहे वह किसी धर्म‚ किसी सम्प्रदाय से सम्बद्ध हो।

'विष्णुप्रभाकर जी' अपने निबन्ध 'साम्प्रदायिक सद्भाव और धर्म का रूप' में लिखते हैं – आज जो विश्व में चारों ओर आपाधापी मची हुई है उसका स्पष्ट कारण यही है कि हमने धर्म को संर्कीण सम्प्रदाय के रूप में लिया है और अपनी सत्ता की भूख मिटाने के लिये नाना प्रकार के जाल अपने चारों ओर बुन लिये हैं। इनसे मुक्ति तभी पाई जा सकती है‚ जब हम सम्प्रदाय‚ जाति‚ धर्म‚ व्यवसाय‚ प्रान्त इन सबको व्यक्तिगत स्तर पर स्वीकार कर सकें यानि एक मनुष्य को दूसरे से यह कहने का अधिकार नहीं होना चाहिये कि मेरा धर्म या जाति श्रेष्ठ है।

यह राष्ट्रीय एकता का विषय इतना ही ज्वलन्त दशकों से बना रहा है‚ जितना कि आज है। किन्तु सम्प्रदायों के बीच की खाईयां हैं कि चौड़ी ही होती जाती हैं। ईसाई धर्म के प्रचार प्रसार पर हिन्दू संगठनों की आपत्ति व ईसाईयों के साथ र्दुव्यवहार‚ कश्मीर में कश्मीरी ब्राह्मणों तथा सिखों के प्रति भीषण असहिष्णुता के चलते जघन्य हत्याकाण्डों की लहर अब जम्मू तक उतर आई है‚ गुजरात का गोधरा काण्ड‚ फिर पूरे गुजरात में हुआ बर्बर साम्प्रदायिक दंगा। इस एकता को बचाने के लिये सराकारों ने न जाने कितने प्रयत्न किये हैं। न जाने कितनी समीतियां संगठित हुईं‚ कई संगोष्ठियां हुईं‚ जनमानस में एकता के भाषण हुए‚ बहुत कुछ लिखा गया। लेकिन जनसाधारण तो शांति व प्रेम तथा सौहार्दपूर्ण ही जीवन व्यतीत करता रहा। लेकिन इसमें सम्प्रदायों का कुछ लेना देना नहीं था यह आपसी इन्सानी प्रेम था। सम्प्रदायों के प्रमुखों तथा सत्ता लोलुपों ने अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ मान दूसरे पर अपना धर्म लादने की कोशिशों ने इस परस्पर मानवीय सौहार्द के मूल को ज़हर से सींचना चाहा है।

किन्तु क्या जनसाधारण का अपना स्वयं का विवेक नहीं? एक ही समाज में सहअस्तित्व से रहने वाला आम आदमी… ज़रा सी आंच पर उफन क्यों जाता है? क्यों कठपुतली बन जाता है सत्ता लोलुपों व धर्म के कट्टर प्रमुखों के हाथों की। पर शायद वह कहीं स्वयं को विवश व आहत पाता होगा धर्म के सन्दर्भ में। पर सही मायनों में धर्म क्या है यह हर भारतीय को समझना आवश्यक है। माना भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है‚ यहां सभी को अपने अपने धर्म निर्वाह करने की पूरी स्वतन्त्रता है पर दूसरों का धर्म हीन मानने की नहीं‚ दूसरों के धर्म का अपमान करने की नहीं। बल्कि अपने धर्म के माध्यम से मानवीयता‚ सहिष्णुता तथा समन्वय का प्रचार करने की पूरी आज़ादी है। आखिर अपने धर्म के प्रति आपकी निष्ठा का स्वरूप क्या हो इस विषय पर रोम्या रोलाँ के सुन्दर विचार शायद पाठकों को कहीं मनन करने पर विवश करें।

" बहुत से व्यक्ति ऐसे हैं‚ जो सभी तरह के धार्मिक विश्वासों से अलग हैं‚ या उनका ख्.याल है कि वे दूर हैं‚ लेकिन वास्तव में उनमें अतिबौद्धिक चेतना जाग्रत रहती है‚ जिसे वे समाजवाद‚ साम्यवाद‚ मानवहितवाद‚ राष्ट्रवाद या बौद्धिकवाद कहते हैं। विचार का उद्देश्य क्या है‚ विचार का स्तर क्या है‚ यह हम देख कर समझ जाते हैं कि वह विचार धार्मिकता से प्रेरित है या नहीं। अगर वह विचार हर तरह की कठिनाई सहकर एकनिष्ठ लगन और हर तरह के बलिदान के लिये तैयार हो सत्य की खोज में निर्भीकता से ले जाता है तो वह मेरे विचार से धर्म ही है। क्योंकि धर्म के अन्दर यह विश्वास शामिल है कि मानवीय पुरुषार्थ का उद्देश्य तत्कालीन समाज के जीवन से ऊंचा है बल्कि सारे मानव समाज के जीवन से भी ऊंचा है।"

आखिर धर्म है ही वह शक्ति जो जीवन तथा उसके महत्तर उद्देश्यों को समझने में मदद करे न कि हीन स्वार्थों की पूर्ति का माध्यम बने। कोई भी एक धर्म ऐसा नहीं जो सहअस्तित्व की प्रेरणा न देता हो। सबसे पहला धर्म तो प्रकृति ही है मानव का‚ जिसने सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया है सहअस्तित्व का! भले ही आज वह स्वार्थ में अन्धा हो यह पाठ भूल चला हो बिलकुल उसी तरह जिस तरह पहली शिक्षिका मां के पाठ बच्चे बड़े होने पर तुच्छ समझने लगते हैं…किन्तु ठोकर खाने पर वे पाठ उन्हें अवश्य याद आते हैं। फिर मानवता का धर्म जिसने उसे झुण्ड में रहना सिखाया होगा‚ चाहे सुरक्षा व एकता का स्वार्थ ही उसके पीछे क्यों न रहा हो। साम्प्रदायिक धर्म तो सहअस्तित्व के बहुत बाद में आये। जिन्होंने फिर से सहअस्तित्व का पाठ पढ़ाया। आज यह सहअस्तित्व ही हमारा सर्वोपरि धर्म है। जिसके बिना मानव धर्म का निर्वाह सम्भव नहीं।

हम भारतीयों की तो आदत ही रही है कि जब जब हम पर बाहरी संकट आया है हम एक हो गये हैं किन्तु वह संकट टलते ही हम फिर एक दूसरे के खिलाफ लड़ने लगते हैं।हम हैं ही स्वकेन्द्रित मनुष्य। हम यह ज़रा सी बात नहीं समझ पाते‚ श्री अरविन्द के शब्दों में – " देश ही जातीयता की पृष्ठभूमि है। जाति नहीं है‚ धर्म नहीं है‚ और कुछ भी नहीं है। एकमात्र देश ही आधार है और जितने भी जातीयता के उपकरण हैं वे सब गौण हैं। देश ही मुख्य और आवश्यक है।"

माना बुद्धि रखने वाला मनुष्य एक सा नहीं सोच सकता। एक सा व्यवहार नहीं कर सकता। बुद्धि विविधता को जन्म देती है किन्तु अलगाव को नहीं। विविधता के विभिन्न रूप एक दूसरे से जुड़ कर समन्वय की शक्ति बन सकते हैं‚ अलगाव की कमज़ोर कड़ियां नहीं। इसी विविधता को एक बनाने वाला जो मजबूत सूत्र है वह है देश।

विष्णु प्रभाकर जी के विचार इस विषय में बहुत ही उदार व सुन्दर हैं — "अनेक जातियों का होना‚ अनेक धर्म – मत होना‚ अनेक भाषाएं होना किसी भी दृष्टि से दोष नहीं है। विविधता सौंदर्य का प्रतीक है। लेकिन यह किसी एक का निर्माण करती है। सात रंग मिल कर इन्द्रधनुष की रचना करते हैं। संगीत का आधार भी सात स्वर ही हैं। लेकिन यदि वे स्वर तथा वे रंग अपने अपने सौन्दर्य को लेकर खड़गहस्त हो जायें तो प्रकृति और वाणी का सौन्दर्य सदा के लिये नष्ट हो जायेगा। वैसे ही जैसे आज भारत की एकरूपता नष्ट हो गई है।"

क्या हमारा कर्तव्य नहीं कि हम इस एकरूपता के बिखरे मोतियों को फिर एक कर दें? सच्चे दिल से पूछे आज हर भारतीय… क्या वह इस विविधता में एकता के सौन्दर्य के प्रति गौरवान्वित नहीं महसूस करता है? आये दिन के उत्सव‚ मेले‚ तरह तरह के विभिन्न धर्मों के त्यौहार उसे जीवन्त नहीं करते? क्या उसने हिन्दु होकर भी बचपन में सांता क्लॉज़ को देखकर उत्साह नहीं जताया? या मुहर्रम के ताजियों को देख कर कुतुहल नहीं हुआ? कभी ईद की सिवईयों का मज़ा नहीं लिया? ईसाई या मुसलमान होकर दिवाली का मज़ा नहीं लिया या होली के रंगों में भीगा नहीं? जब हम इस विविधता में मज़ा पाते हैं तो फिर मन की दरारों को पाटने से क्यों ठिठकते हैं?

आईये नये साल का स्वागत हम रवीन्द्रनाथ टैगोर की इन पंक्तियों के साथ करें –

आओ हे आर्य! आओ अनार्य! हिन्दू मुसलमान।
आओ आओ तुम अंग्रेज‚ आओ आओ सब क्रिश्चियन।।
आओ ब्राह्मण गले मिलो‚ सब शुद्ध कर अपने मन को।
आओ पतित मिलो सब भाई‚ दूर फेंको अपमान को।।
शीघ्र आओ माँ का अभिषेक है‚ मंगलघट अभी भरा नहीं है।
सबके स्पर्श से पवित्र किये हुए तीर्थ नीर से।।
आज भारत के महामानव सागर के किनारे।

– मनीषा कुलश्रेष्ठ
 

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