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लोकतन्त्र और संविधान

क्या लोकतन्त्र और संविधान भारत में एक मज़ाक बन कर रह गया है? क्या जनादेश अदालत के फैसलों की अवमानना कर सकता है? भ्रष्टाचार के कई मामलों में दोषी व्यक्ति को मुख्यमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर आना चाहिये? क्या संविधान के अस्पष्ट प्रावधानों के चलते देश अब भ्रष्टाचारियों‚ सजायाफ्ता लोगों के हाथों चलने वाला है?
अनेकों भ्रष्टाचार के मामलों में आरोपी और तीन मामलों में सजा पा चुकी अन्नाद्रमुक की नेता जयललिता को चुनाव लड़ने से भले ही रोक दिया गया‚ मगर वे तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनने में कामयाब रहीं। और उनका कहना है कि‚ '' लोगों ने अन्नाद्रमुक को भारी बहुमत इसलिये दिया कि वे मुझे मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। मुझे शपथ दिलाने के अलावा कोई भी फैसला जनादेश का अपमान होता।''
इस शपथ के पीछे दो परस्पर विरोधी कानून काम कर रहे थे। जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 8 के अनुसार किसी भी अपराधिक मामले में 24 माह से अधिक की सजा पाए व्यक्ति पर 6 वर्ष का चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध है। और संविधान के 164 वें अनुच्छेद के अनुसार राज्यपाल किसी भी व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाने को स्वतन्त्र है‚ बशर्ते वह छह महीने के भीतर सदन का सदस्य चुन लिया जाए।
जयललिता की सियासी चालों के आगे सब स्तब्ध हैं। पूर्व चुनाव आयुक्त जी। वी। जी। कृष्णमूर्ति का कहना है कि जयललिता का शपथग्रहण अदालतों के मुँह पर तमाचा है।
क्या ऐसी घटनाओं से और भ्रष्टाचारी नेताओं को बढ़ावा नहीं मिलेगा? इस तरह कभी राजनीति अपराधमुक्त हो पाएगी? अब आगे आगे देखिये अब किस अस्पष्ट संविधान की पूंछ पकड़ जयललिता अपने चुनाव लड़ने पर लगे प्रतिबंध को हटाती है। प्रेम और युद्ध की तरह राजनीति में भी सब कुछ जायज है।
महाराष्ट्र में कई गाँवों में कुपोषण की समस्या किसी महामारी की तरह फैली है। फसलों और मानसून पर निर्भर इन गाँवों में अकाल की स्थिति है‚ लोगों के पास खाने के लिये अन्न तक नहीं है‚ पोषक आहार तो दूर की बात है। और विडम्बना यह है कि हमारे सरकारी गोदाम अपनी भंडारण क्षमता से अधिक अन्न से अंटे पड़े हैं।
आज जब भारत में भी आई टी जागरुकता गाँवों की ओर भी बढ़ रही है‚ गलियों में साइबर कैफे खुल रहे हैं‚ इस सबका एक विपरीत असर हुआ है‚ यहाँ भी टीनएज बच्चे साइबर अपराधों में लिप्त होने लगे हैं। अश्लील साईट्स को खुल कर देखने लगे हैं। ऐसे में भारतीय माता–पिता चाहते हंै कि इंटरनेट पर अश्लीलता रोकने के लिये विश्वव्यापी कानून बनें। हालांकि ऐसी वैसी साइट्स के लिये सर्फ सेफ्टी सॉफ्टवेयर आ गए हैं जो स्कूलों में इस्तेमाल किये जाते हैं। यही समय की भी माँग है क्योंकि आइ टी क्रान्ति का देश के विकास में बहुत बड़ा हाथ है। ज़रूरत बस इसके साइड इफेक्ट्स के लिये पूर्व निदानों की।
मालगुड़ी डेज़ और बहुचर्चित ऊपन्यास तथा फिल्म गाईड के लेखक आर। के नारायण के निधन से हमारे देश को एक उत्कृष्ट साहित्यकार से वंचित होना पड़ा है। कुछ समय पूर्व ही हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार शैलेश मटियानी का आर्थिक अभावों में एक मनोरोग अस्पताल में दु:खद अंत हुआ‚ एक उत्कृष्ट साहित्यकार का ये अंत स्वयं में एक संर्घष गाथा है। दोनों लेखकों के प्रति बोलोजी की ओर से श्रद्धान्जली।
 

– मनीषा कुलश्रेष्ठ

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