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यौन उत्पीड़न

यह विषय इतना नाज़ुक है कि इसे छूने से भी डर सा लगता है। यह डर शरीर का नहीं मन के उस नाज़ुक कोने का है जिसे आपको डरा धमका कर कुचल कर रख दिया जाता है। आपसे सामान्य होकर एक आत्मविश्वासी व्यक्ति बन कर साहस के साथ जीने का अधिकार एक कामुक व्यक्ति की क्षणिक तुष्टि या बदले की भावना के तहत छीन लिया गया होता है। देह की पीड़ा और घाव तो भर जाते हैं पर स्वयं से घृणा और एक आतंक के मन के भीतर परत दर परत जम जाता है। सहज पर भी विश्वास न कर सकना एक यौन उत्पीड़ित व्यक्ति की विवशता होती है। बलात्कार और यौन उत्पीड़न के कानूनों में बदलाव और सख्ती और निरन्तर उजागर होते कितने ही आंकड़ों के बावज़ूद यौन उत्पीड़न का दर्दनाक सिलसिला थमने को ही नहीं आता।
आखिर किसे दी जाए इस की ज़िम्मेदारी? सरकार‚ सामाजिक विषमताओं‚ कानून और लापरवाह माता–पिता या बलात्कारी को या बलत्कृत बच्चे‚ युवति या स्त्री को? किसे? आरोप–प्रत्यारोप की गुंजाईश ही कहाँ रह जाती है जब कोई इस हादसे का शिकार होता है। फिर भी कुछ है ऐसा जिस पर सोचा जा सकता है। हैं कुछ बिन्दु जिनपर थोड़ा मिल कर सोचा जाए तो कुछ तो हानि कम हो।

यह विषय इतना नाज़ुक है कि इसे छूने से भी डर सा लगता है। यह डर शरीर का नहीं मन के उस नाज़ुक कोने का है जिसे आपको डरा धमका कर कुचल कर रख दिया जाता है। आपसे सामान्य होकर एक आत्मविश्वासी व्यक्ति बन कर साहस के साथ जीने का अधिकार एक कामुक व्यक्ति की क्षणिक तुष्टि या बदले की भावना के तहत छीन लिया गया होता है। देह की पीड़ा और घाव तो भर जाते हैं पर स्वयं से घृणा और एक आतंक के मन के भीतर परत दर परत जम जाता है। सहज पर भी विश्वास न कर सकना एक यौन उत्पीड़ित व्यक्ति की विवशता होती है। बलात्कार और यौन उत्पीड़न के कानूनों में बदलाव और सख्ती और निरन्तर उजागर होते कितने ही आंकड़ों के बावज़ूद यौन उत्पीड़न का दर्दनाक सिलसिला थमने को ही नहीं आता।

जब एक अबोध बच्चा उत्पीड़न का शिकार होता है तो वहाँ ज्यादातर अपराधी उस बच्चे के अभिभावक स्वयं या बच्चे को जानने वाले या रिश्तेदार‚ अध्यापक या घर के नौकर या पड़ौसी ही होता है। यह बड़ी त्रासद स्थिति है। कुछ वर्ष पहले ही की तो बात है जब एक आई ए एस अधिकारी लगातार अपने कुछ सहकर्मियों के साथ मिल कर अपनी ही बच्ची के साथ घृणित यौनाचार करता रहा‚ माँ पता होते हुए भी विवशता से चुप रही। ऐसे में माँ का क्या कर्तव्य नहीं था कि वह आरंभ में ही इस बात का विरोध करती तो स्थिति इतनी खराब नहीं हुई होती। अब जो भी है कि उस घृणित पिता को सज़ा हुई पर क्या बच्ची सहज हो सकी होगी‚ स्कूल जाने पर उस पर अंगुलियाँ उठी न होंगी। बड़े होकर उसका विवाह अगर हुआ भी तो उसका दाम्पत्य सहज होगा?

ऐसे में माता पिता होने के नाते या अध्यापक अध्यापिका होने के नाते हमारा दायित्व है कि हम अबोध बच्चों को स्पष्ट शब्दों में पहले ही आगाह कर दें कि‚ '' बेटा आपको कोई छुए या आपकी अन्डरवियर छुए तो सीधे मम्मी या टीचर को बताओ।'' ''या किसी परिचित या अजनबी के साथ अकेले में जाने की आवश्यकता नहीं।'' पर विडम्बना तो यह है कि ऐसे हादसे गोदी के और बोलना न जानने वाले बच्चों के साथ भी हो जाते हैं तब? नौकरीशुदा या व्यवसायिक महिलाओं को तो अपने बच्चों को कहीं न कहीं छोड़ना ही होता है। दिल्ली की बात है कि एक क्रेच के मालिक के बीस वर्षीय लड़के ने तीन वर्ष की दो तीन बच्चियों के साथ यह कुकृत्य करने का प्रयास किया। अब किस पर विश्वास किया जाए किस पर नहीं?

अब प्रश्न उठता है सामाजिक व्यवस्था पर‚ यह इतना उलझाने वाला विषय है कि समाज का विषम बिन्दु आसानी से पकड़ नहीं आता जिसके चलते यह स्थिति उत्पन्न होती है। नैतिकता‚ धर्म‚ शिक्षा हर माध्यम से तो मनुष्य को युगों–युगों से जानवर से मानव बनाने की निरन्तर प्रक्रिया चली आ रही है। फिर कहाँ कमी है‚ किन किन विरोधाभासी तथ्यों को दोष दें – समाज में बढ़ते खुलेपन को या सेक्स को दबा–छिपा कर रखने से उपजी कुण्ठा को? एकांगी परिवार में असुरक्षित रहते बच्चों को या सामूहिक परिवार में अपनों के ही द्वारा असुरक्षित महसूसते बच्चों को। टी वी के खुले माध्यम को या यौन शिक्षा के अभाव को। ये समस्त तथ्य इतने विरोधाभासी हैं कि इन पर वादविवाद तो हो सकता है पर यौन उत्पीड़न की समस्या का हल नहीं निकाला जा सकता है। हमारे बच्चे और युवतियाँ‚ स्त्रियाँ‚ तथा कुछ मामलों में युवक भी यौनउत्पीड़न का लगातार शिकार हो रहे हैं।

इस विषम और पल में अच्छे–भले इन्सान को जानवर बनाने वाली परिस्थिति का एक ही हल है कि माता–पिता‚ बच्चों में तथा युवतियों‚ स्त्रियों में जागरुकता हो। या उन्हें स्वयं को ऐसी स्थिति से उबारने का पाठ पढ़ाया जाए। दूसरों के अनुभव से शिक्षा ली जाए। अपराधी का नाम न छुपाया जाए। अनुभव बांटे जाएं। सही समय पर यौन शिक्षा का ज्ञान कराया जाए। स्वरक्षा हेतु लड़कियां मार्शल आर्ट सीखें। और सहज ही किसी पर भी विश्वास न करें। माता–पिता का कर्तव्य है कि अपने किसी भी उम्र के बच्चे को घर में नौकरों के भरोसे न छोड़ें‚ किसी अकेले परिचित रिश्तेदार के साथ न भेजें‚ न ही साथ सोने दें। क्रेच में भेजने से पहले वहां की सारी जानकारी अवश्य प्राप्त कर लें। स्कूल जाने वाले बच्चे को सदैव समझाएं कि किसी अध्यापक या चपरासी या बड़े बच्चे के साथ किसी भी स्थिति में अकेला न जाए। बच्चों को किसी मित्र के घर सोने के लिये न छोड़ें। यौन अपराध का जानवर एक अच्छे खासे समझदार परिपक्व व्यक्ति के मन में भी छिपा हो सकता है।

जब भी ऐसे हादसे किसी के साथ होते हैं तब कहीं न कहीं ऐसी ही लापरवाही हुई होती या लगातार होती आ रही होती है। आप बच्चे की शिकायत पर ध्यान नहीं देते। या बच्चे में आप माता पिता के रूप में विश्वास पैदा नहीं कर पाते कि वह ऐसे किसी शर्मनाक हादसे का आपसे जिक्र करे ‚ ऐसे में वह डर कर आपसे छुपाता है और स्वयं उत्पीड़ित होता रहता है। कई बार किशोरियाँ‚ किशोर और युवतियां भी ऐसी बातें छुपा लेते हैं यह सबसे घातक परिस्थिति है। अपने बच्चों में इतना विश्वास पैदा करें कि वे कोई बात आपसे न छुपाएं।
फिर भी अगर ऐसे हादसे हो ही जाएं तो‚ आपका कर्तव्य है कि एक माता–पिता‚ भाई–बहन या पड़ौसी‚ सामाजिक व्यक्ति‚ मित्र‚ हितैषी की हैसियत से उस व्यक्ति को इस हादसे के प्रभाव से बाहर निकालने में मदद करें। सबसे पहले अपराधी को छूटने न दें ना ही अपमान व झमेलों के डर से उसे माफ करें।
हादसे के शिकार व्यक्ति के यदि आप माता–पिता‚ भाई बहन हैं तो उसे घर में सुरक्षित वातावरण दें। उस हादसे का जिक्र करना बंद करदें। दया या सहानुभूति के स्थान पर सहज व्यवहार करें जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं‚ हुआ भी तो घर की खुशियों उत्साह के आगे व्यर्थ था। ज़रूरत हो तो मनोचिकित्सक का परामर्श लें।

पड़ौसी या मित्र हैं तो अपनी मित्रता व स्नेह से उसे वंचित न करें‚ अगर वह चाहे तभी उसका दुख बांटें अन्यथा सहज हो मित्रता का निर्वाह करें। पीड़ित व्यक्ति के बारे में गलती से भी उल्टा सीधा न फैलाएं‚ यह अपराध करके आप उस व्यक्ति से सहजता जीने का अधिकार छीन लेंगे।

सामाजिक व्यक्ति की हैसियत से उस व्यक्ति को न्याय दिलाने में सहायता करें। ऐसी बातों को चटखारे लेकर सुनने–सुनाने की जगह सहानुभूति पूर्ण रवैय्या रखें। आपका कर्तव्य है कि पीड़ित व्यक्ति को सामाजिक सम्मान से न वंचित करें। यौन उत्पीड़न का शिकार यदि बालक भी है तो उसके अबोध मन पर इसका गहरा असर होता है‚ अत: माता पिता का कर्तव्य है कि बच्चे को मानसिक सहारा दें तथा अकेला न छोड़ें जब तक वह उबर न आए।

अब हमें सामाजिक रूप से चेत जाना चाहिये कि ऐसी घटनाएं किन परिस्थितियों‚ किन कारकों का परिणाम हैं। महज बहस इसका हल नहीं। इस विषय पर अभी और खुलकर चर्चा की आवश्यकता है। इस विषय पर अभी और गोष्ठियों की आवश्यकता है। कॉलेज‚ स्कूर्लोंघरों में बच्चों को ऐसी परिस्थितियों से बचाव से आगाह करने की आवश्यकता है। यह मन को हिला देने वाला दुखद विषय है। ऐसी घटनाएं जब हमारे मन पर बुरा असर छोड़ती हैं तो इसके शिकार व्यक्तियों की मन:स्थिति के बारे में आप स्वयं सोचें।

 

– मनीषा कुलश्रेष्ठ

इसी संदर्भ में :
कार्यालय में यौनशोषण
दिव्य प्रेम
यौन उत्पीड़न
यौन सम्बंध और दाम्पत्य
यौन शोषण
विवाह से पूर्व शारीरिक सम्बंध
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