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आतंकवाद

पाकिस्तान द्वारा अमेरिका के विशिष्ट सेना बलों के तैनाती के आग्रह को नकार देने के बाद मुस्लिमबहुल राष्ट्रों की आतंकवाद के प्रति भूमिका और संदिग्ध होकर सामने आई है।

पूरा अमेरिका पीड़ा से आज स्तब्ध है‚ और यह विश्वास नहीं कर पा रहा है कि‚ उसके गौरव और शक्ति को जेहाद के नाम पर कोई आंतकवाद इस तरह हिला कर रख सकता था। क्या अब भी अमेरिका इस्लामिक आतंकवाद के संसार भर पर छाने के अंदेशे से आंखे मूंदे रह सकेगा? क्या यह सही समय नहीं है कि आंतकवाद को समूल नष्ट कर दिया जाए? पर क्या यह इतना आसान होगा? ये आत्मघाती जेहादी ………आम चेहरों में अगर आप ही के बीच घूम रहे हों तो इन्हें पहचानना आसान होगा? ओसमा बिन लादेन को खोज कर उसके प्रभाव को समाप्त करने में निर्दोष जानों के जाने का खतरा भी बेशक अमेरिका को शायद विवश कर दे कि वह कोई अतिवादी कदम उठाने में हिचके।

अमेरिका और भारत दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश एक ही तरह के इस्लामिक आतंकवाद के शिकार हैं। दोनों का सहयोग इस समस्या को समूल नष्ट करने हेतु अब आवश्यक प्रतीत होता है। भारत ने तो इस इस्लामिक आतंकवाद को लम्बे अरसे से झेला है और हर बार समूचे विश्व को इस उन्मादी जेहादी प्रवृत्ति के खतरों से आगाह करने का प्रयास भी किया है। अब इस दुर्दान्त घटना के बाद भारत के इस दृष्टिकोण से पूरा विश्व समुदाय सहमत होगा कि आंतक वाद किसी देश विशेष की नहीं वरन् पूरे मानव समुदाय की समस्या है‚ इससे जूझने के लिये पूरे विश्व को एकजुट होकर इसका समूल नाश चाहे साम–दाम या दंड–भेद की नीति अपना कर करना ही होगा। अन्यथा जब अमेरिका जैसे देश में भी नागरिक स्वयं को सुरक्षित महसूस न कर सकें तो विकासशील देशों के नागरिकों के लिये सुरक्षा एक दूर का सपना ही है।

– मनीषा कुलश्रेष्ठ

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