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पुनरावृति एक इतिहास की

कहते हैं इतिहास अपने आप को दोहराता है। अगर अफगानिस्तान के इतिहास पर नजर डालें तो ऐसा लगता है कि ओसामा बिन लादेन जो की आज के महाशक्ति अमेरिका के लिए एक चुनौती बन गया है, एक इतिहास की पुनरावृति ही है।

अफगानिस्तान के साथ भारत व अन्य देशों का टकराव नया नहीं है। महाभारत काल को ही अगर सच मानें तो महाभारत कंधार ह्यउस समय का गंधारहृ के युवराज शकुनी के नापाक इरादों का परिणाम था। उस समय भी भारत दो भागों हस्तिनापुर और इन्द्रप्रस्थ में विभक्त होकर रणभूमि में नेस्तनाबूद हो गया था। 20वीं शताब्दि के इतिहास पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि ओसामा बिन लादेन के पहले भी एक ऐसा ही आतंकवादी अफगानिस्तान में हुआ था। जो तत्कालिक सर्वप्रकारेण सम्पन्न ब्रिटेन के नाक में दम कर दिया था। उस समय ब्रिटेन सरकार के विषय में यह कहावत प्रचलित था कि ब्रिटानी राज में सूर्यास्त नहीं होता। क्योंकि भारत उस समय उसका उपनिवेश था।

सन् 1939–45 के विश्व युद्ध के बाद श्री फ्रेंक लीसन उत्तर पश्चिम मोर्चे पर ब्रिटिश सेना के ऑफिसर के रूप में तैनात थे। उस समय एक अफगानिस्तानी फकीर ऑफ इपी ने पख्तूनिस्तान के स्वतंत्रता के नाम पर इस्लाम के लिए जेहाद छेड़ा था। उसने तत्कालिक महाशक्ति ब्रिटेन को नाकों चने चबवा दिया था। श्री फ्रेंक लीसन ने उस आतंकवादी के कारनामों पर एक पुस्तक "फ्रंटियर लीजंस" 1950 में लिखा और नेशनल आर्मी म्यूजियम को दे दिया। पर उस समय इसका प्रकाशन नहीं हो पाया था। लगभग 40 सालों के पश्चात् इस पुस्तक का प्रकाशन हो पाया।

इस पुस्तक के अनुसार फकीर आफ इपी का जन्म 1898 ई में अफगानिस्तान के इपी नामक गांव में हुआ था। इसने पख्तूनिस्तान के नाम पर जेहाद ह्यधर्मयुद्धहृ छेड़ा था। दरअसल इस्लाम के सोच के अनुसार मुसलमान के अलावा सारे लोग काफिर हैं और काफिरों को मुसलमान बनाकर मिल्लत में शामिल करना हर मुसलमान का मजहबी कर्तव्य है। सभी मुसलमान के लिए यही पुण्य कार्य है। वाजिब है कि इस्लाम के इस बात को मानने के लिए हर मुसलमान को संघर्ष करना पड़ेगा। इसी संघर्ष को जेहाद अर्थात् धर्मयुद्ध कहा जाता है। जिनका यकीन जेहाद पर है वे ही सच्चे मुसलमान हैं। शरियत के अनुसार मोमिन से ज्यादा ऊंचा दर्जा मुजाहिदीन अर्थात् इस्लाम का प्रचार–प्रसार करने के लिए जेहाद छेड़ने वालों का है। मुजाहिदीन से ज्यादा ऊंचा दर्जा उस मुसलमान को दिया गया है जिसने अपने हाथों कम से कम एक काफिर का कत्ल किया हो। फकीर आफ इपी ने इसी के नाम पर अपने समर्थकों की संख्या बढ़ानी शुरू की और ऐसा लगा की लगभग सारा का सारा तत्कालिक अफगानिस्तान उसके साथ शामिल हो गया हो। वह लगभग 12 वर्षों तक ब्रिटिश फौजों से लोहा लेता रहा। ठीक इसी प्रकार जैसे कि आज ओसामा बिन लादेन पूरे विश्व में आतंक का पर्याय बना हुआ है। उस समय आज का पाकिस्ताान नहीं था। तब पूरे भारत की सीमा अफगनिस्तान से लगी हुई थी। उसने कई आतंकवादी हमले किए थे। अपने हमलों में उसने कई हजार निर्दोष हिन्दुओं और सैनिकों को मारा था। उसका नेटवर्क भी उस जमाने में काफी उम्दा किस्म का था। उसके समर्थक बहुत ही निर्दयी थे। जो कोई उनके गिरफ्त में आ जाता था उसे निर्दयता पूर्वक मार डालते थे। जैसे कि तेल या पानी में डालकर उबाल देना। दोनों हाथ पैर बांधकर चाकू से उनके चमड़े उतारना। तलवार से पूरे अंग काटकर उसपर नमक और मिर्च का पाउडर छिड़क देना। फिर काफी यातना देने के बाद पानी में उबाल देना। जितना से जितना निर्मम यातना संभव था वे अपने विपक्षियों को देते थे।
फकीर आफ इपी ओसामा बिन लादेन की तरह ही उस समय भरत की सीमा पर गुफाओं और पहाड़ों में छिपकर ब्रिटिश फौजों को चकमा देता रहा। उसने हजारों हिन्दुओं को अपहरण कर उन्हें यातना देना शुरू किया। तब ब्रिटेन ने उसके खिलाफ युद्ध का अभियान शुरू किया। उसके साथ युद्ध में ब्रिटेन को एक साल में लगभग 15 लाख पाउण्ड खर्च करने पड़े। उसके लगभग 40 हजार सैनिक उसे खोजते रहे पर वह उसी प्रकार नहीं मिल पाया जिस प्रकार आज सर्वसाधन सम्पन्न अमेरिका को ओसामा अभी तक नहीं मिल पाया है। ब्रिटेन ने भी तत्कालिक उपलब्ध साधनों का पूरा इस्तेमाल किया पर नतीजा कुछ नहीं मिल पाया। फकीर आफ इपी गुफाओं में छिपता फिरा। 30 का पूरा दशक ब्रिटेन का इसी आतंकवादी के साथ संघर्ष में गुजरा।

ब्रिटेन और भारत की संयुक्त सेना इस अभियान में लगी रही। पर फकीर आफ इपी को पाना भगवान से मिलने के बराबर रहा। इसी क्रम में सन् 1936 में नववर्ष के पूर्व संध्या पर ब्रिटेन ने अपने गुप्तचर एजेंसियों से मिले पुख्ता सबूत के आधार पर अपने रैपिड ऐक्शन फोर्स के द्वारा अरसालकोट में उसपर हमला किया। यह हमला तत्कालिक समय के अनुसार लगभग वैसा ही था जैसा कि आज अमेरिका ने ओसामा के लिए उसके ठिकाने पर किया है। ब्रिटेन बहुत खुश था कि इस बार फकीर आफ इपी को वो मारकर हमेशा के लिए उससे निजात पा लिया है। पर जब हमला खत्म हुआ तो उसने पाया कि इसमें आठ गुफाएं पूरी तरह सुरक्षित बच गई हैं। फिर नये सिरे से तलाश शुरू हुयी तो पता चला कि फकीर आफ इपी उस समय वहां से लगभग पांच मिल की दूरी पर अवस्थित गुल जमीर कोट की गुफाओं में जाकर छिप गया था। ब्रिटेन ने वहां पर भी एक जबर्दस्त हमला बोला। पर उसकी गुप्तचर व्यवस्था इतनी सक्रिय और संवेदनशील थी कि वह पहले ही इस बात का पता लगाकर वहां से भाग निकला।

वह भागता रहा और ब्रिटेन का हमला तेज होता रहा। पर सभी हमलों में वह बचता रहा। अंततÁ ब्रिटेन ने उसे सुरक्षित रास्ता देने की पेशकश की। पर उसने परिणाम को सोचते हुए तैयार नहीं हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उसने ब्रिटेन के खिलाफ लड़ने वालों की खूब मदद की। उसने ब्रिटेन के नाक में उसी प्रकार दम कर दिया था जिस प्रकार आज ओसामा बिन लादेन ने अमेरिका के।
पूर्णतया असफल होने के बाद ब्रिटेन ने छल से मारने की कोशिश भी की। इसमें ब्रिटेन के एक गुप्तचर ने उसकी गुफा में जहां कि वह छिपा था रैपिड ऐक्शन फोर्स के द्वारा विशेष रूप से निर्मित टाइम बम छिपा कर रख दिया। पर फिर फकीर आफ इपी यहां से बच निकला। बम तो फटा पर फकीर का कुछ नहीं बिगड़ा। उसके ये कारनामे और इस तरह बच कर निकलना किसी आश्चर्य से कम नहीं था। अंततÁ ब्रिटेन हार गया और फकीर आफ इपी का आतंक चलता रहा। अंततÁ वह 1947 में स्वतÁ मृत्यु को प्राप्त हुआ और ब्रिटेन सहित हिन्दुओं को भी निजात मिल सका।

अमेरिका ने भी ओसामा बिन लादेन के आतंक से तंग आकर उसे जिन्दा या मुर्दा पकड़ने का एलान किया है साथ ही सैनिक कार्यवाही भी किया है। अफगानिस्तान की सरकार बदल भी गयी है। पर आज भी ओसामा उसके पहुंच के बाहर है। नतीजा कब और कैसा निकलेगा। इसपर सारे संसार के लोगों की नजरें लगी हैं। कहीं ओसामा भी इतिहास की पुनरावृति की तरह फकीर आफ इपी ही साबित न हो।

– सुधांशु सिन्हा "हेमन्त"
 

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