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दस्तक नये साल की…

आतंक और युद्ध की कुहेलिका से घिरे वातावरण से बेखबर नया साल दस्तक देता आ पहुँचा है‚ वह नहीं जानता कि पिछले साल के खूं रेज अतीत के कुछ छींटे उसके मासूम शफ्फाक दामन पर भी गिर सकते हैं। पिछला साल इस कदर घटनाप्रधान और नाटकीय बीता कि अतीत की ओर मुड़ कर देखें तो लगता है उफ! यह सब इस एक साल में घट गया? घटनाएं भी ऐसी कि जिनकी चीखो पुकार पूरा विश्व सुने! और लगभग पिछले साल के इन खूनी दुष्चक्रों से लगभग पूरा विश्व प्रभावित हुआ।

यह शुरुआत हुई थी 26 जनवरी 2001 को गुजरात के भुज और अहमदाबाद शहरों पर पड़ी प्रकृति की कुदृष्टि से…अचानक‚ अनायास… एक भयावह भूकम्प…हज़ारों निर्दोषों की मृत्यु से पूरा भारत ही नहीं विश्व स्तब्ध हो गया था और सहायता को हज़ारों हाथ आगे बढ़ आए थे। पूरा विश्व एकजुट हो गया था भूकम्प पीड़ितों की सहायता को।

इस सदमे से उबरते उबरते 2 जून 2001 को नेपाल के शाही परिवार के सामूहिक हत्याकाण्ड ने समूचे विश् को फिर हिला कर रख दिया। इस साल के कठिन भाग्य ने आम आदमी ही नहीं शाही परिवार तक को प्रभावित किया।

उधर नेपथ्य में अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान में मुस्लिम कट्टरपंथियों का आतंवादी मुहिम जारी रहा और इसके चलते कितने ही संहार हुए और इनका सबसे बड़ा षड्यंत्र    11 सितम्बर 2001 को कामयाब हुआ और अमेरिका स्थित वल्र्ड ट्रेड सेन्टर और पेन्टागन इमारत पर आतंकवादियों द्वारा अपहृत विमानों से हमला किया और हज़ारों लोग मारे गये। यह सबसे अधिक स्तब्ध कर देने वाली घटना थी जिसे अमेरिका माफ न कर सका और अमेरिका ने आतंवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई छेड़ने का निर्णय लिया और इसे सही कर दिखाया। यहां भी गेहूँ के साथ घुन पिसने की कहावत चरितार्थ हुई और अफगानियों को तालेबानों से छुटकारा पाने में कई मासूम जानों से हाथ धोना पड़ा।

भारत को लगातर आतंकवाद का शिकार बनाते हुए मुस्लिम कट्टरपंथियों को अरसा हो चुका था मगर जब 11 सितम्बर के अमेरीका की महत्वपूर्ण इमारतों पर हुए हमले के बाद जब जम्मू विधान सभा तक आतंकवादियों ने अपने नापाक हाथ बढ़ा दिये तब पहली बार भारत की आतंकवाद के खिलाफ आवाज़ को विश्वसमुदाय ने सुना था।


उसके बाद संयम की डोर तब टूटी जब हाल ही में 13 दिसम्बर 2001 आतंकवादी भारत के लोकतंत्र के गौरव हमारी संसद तक आस्तीन में छिपे सांपों की मदद से आ पहुँचे और एक भयानक हमले की साजिश को सफल करते हुए बहुत करीब आ पहुँचे ही थे कि दिल्ली पुलिस और सी आर पी एफ के जवानों ने उनकी कोशिशें नाकाम करदीं।

अब भी बचे हुए कुछ दिनों में यह वर्ष और क्या गर्भ में लिये हुए है यह कोई नहीं जानता मगर सीमा पर बढ़ते तनावों और आतंकवादी संगठनों पर पाकिस्तान की छूटती पकड़ के चलते युद्ध के काले बादल मंडराने लगे हैं…और अगर शीघ्र ही कोई हल न निकाला गया तो…नववर्ष की शुरुआत कैसी होगी ?

खून के छींटों से भरे 2001 के टूटते थके कदमों के बाद‚ न जाने 2002 के गर्भ में क्या छिपा है? पूरे विश्व की दृष्टि अब भारत पाकिस्तान पर है। तनाव सघन है पर शांति की उम्मीद कभी नहीं छूटती…युद्ध दोनों ही देशों के लिये घातक है। कहते हैं कि युद्ध एक देश को दस साल पीछे छोड़ जाता है। पर उम्मीद के दामन में हम अब भी शांति का थरथराता दिया छिपाये हैं।

– राजेन्द्र कृष्ण

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