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पंचकन्या - 7

पांचाल जाकर वह सब एक कुम्हार की कुटिया में ठहरते हैं जो कि एकचक्र के ब्राह्मण से भी जाति और आर्थिक स्तर पर निम्न श्रेणी का है। वह अपने पुत्रों को बड़े प्रभावशाली ढंग से पाल कर समाज की सबसे नीचे वाली सीढ़ी से होकर ही राज्य के राजसिंहासन तक पहुंचाना चाहती है। इस प्रक्रिया में वह मूलभूत आवश्यकताओं को गौरवपूर्ण उपलब्धि में बदल देने को कटिबद्ध है। देशनिकाला तथा वनप्रवास से उसके पुत्रों की आम जनता के साथ अंतरंगता को बढ़ावा मिलता है इससे उनके अन्दर वह भावना विकसित होती है कि बहुसंख्यक जनता और समाज की क्या क्या आवश्यकताएं होती हैं इससे वे सही मायनों में राजा होने के इस गुण को धारण कर लेते हैं जो कि उन राजाओं में नहीं होता जो अपने विषय व स्वार्थपूर्ति में अपने कर्तव्य भूल जाते हैं। कुन्ती की दूरदृष्टि ने यह जान लिया था कि इन पांचों भाईयों के बीच कोई भी दरार हस्तिनापुर प्राप्ति के लक्ष्य में बाधक बन सकती है। और एकचक्र में निवास के समय व्यास पहले ही बता चुके थे कि द्रोपदी के भाग्य में पांच पति हैं क्योंकि उसे शिव ने वरदान दिया था उसके पूर्व जन्म में उन्होंने उन्हें यह भी कहा कि आप लोग सीधे पांचाल की ओर जाएं और उसे अपनी पत्नी के रूप में स्वयंवर से जीत लाएं। ( आदिपर्व 168)

इसलिये वह यह क्रूर अनुमान लगाने का नाटक करती है कि उसे नहीं पता कि भीम और अर्जुन किस वस्तु के घर लाने की सूचना दे रहे हैं। आदि पर्व 19029 में हम पाते हैं कि युधिष्ठिर और दोनों माद्री पुत्र स्वयंवर की समाप्ति और द्रौपदी के जीते जाने के तुरन्त बाद ही चले जाते हैं। ये तीनों पहले ही अपनी मां के साथ होते हैं जब द्रौपदी को लाया जाता है। कुन्ती जानती थी कि यही एक अटूट कड़ी है जो इन पांचों भाइयों को एक साथ जोड़े रखेगी और अलग - अलग पत्नियां होती तो अलग - अलग दिशा में व्यस्त रखतीं। इस तरह एक लम्बे समय तक उनका जीवन उसके प्रभाव द्वारा संचालित हुआ और उसके ही चतुर्दिक घूमता रहा। जहां तक कि एकता का सवाल था वह केवल एक स्त्री द्वारा ही प्रतिस्थापित की जा सकती थी न कि पांच विभिन्न स्त्रियों द्वारा। यह ठीक वैसा ही था जैसे कि वह इस अर्थव वैदिक आदेश का ही जीवन में पालन कर रही हो

" तुम्हारा आसव एक हो

तुम्हारा भोजन भी एक सा हो

मैं तुम्हें एक बंधन में एक साथ बांधता हूँ

संगठित एकत्रित यज्ञ की पवित्र अग्नि के चारों ओर

जैसे कि रथ के एक पहिये की काड़ियां मध्यचक्र से जुड़ी होती हैं" ( 3306)

द्रौपदी वास्तव में यज्ञ की अग्नि से ही उत्पन्न हुई थी। अत: कुन्ती जानबूझ कर कहती है कि जो भी कुछ तुम घर लाये हो उसे आपस में बांट लो और उसका आनन्द लो हमेशा की तरह। बाद में अपनी 'गलती पता चलने पर' उसकी एकमात्र चिन्ता यही थी कि कुछ होना चाहिये कि उसका आदेश असत्य साबित न हो ( आदिपर्व 1934‚5)। फिर युधिष्ठिर ने द्रुपद से स्पष्टीकरण के सम्वाद में यही कहा कि यह कुन्ती का आदेश था हालांकि सारे भाईयों की इस आदेश में उत्सुकता भरी मौन स्वीकृति अवश्य थी सबके हृदय में द्रौपदी जो बसी थी (19312)। इस सम्पूर्ण महाकाव्य में पांचों भाइयों की कुन्ती की प्रति आज्ञाकारिता की यह घटना बहुत प्रभावशाली व सम्मानजनक श्रद्धांजली है जो कि अन्यत्र नहीं मिलती। गांधारी के गुणगान में अनेको स्तुतियों के बावजूद दुर्योधन की अनाज्ञाकारिता के सन्दर्भ में उसका मातृत्व असफल ही रहा इन सब सन्दर्भों में कुन्ती महाभारत में पात्रित सभी स्त्रियों में अग्रगण्य होकर उभरती है

" मेरी माता की इच्छा मेरी इच्छा

क्योंकि मैं समझता हूँ वह सही है…"

क्या यह नहीं कहा गया है कि

गुरु के प्रति आज्ञाकारिता सर्वश्रेष्ठ गुण है?

तो फिर

मां से बड़ा गुरु आखिर कौन हो सकता है?

मेरे लिये यही सर्वश्रेष्ठ धर्म है।" ( 19729‚ 19817)

यह उल्लेखनीय है कि यहां कुन्ती कितनी उत्सुक है कि उसकी युक्ति विफल न हो जाए। जैसे ही युधिष्ठिर अपना वाक्य समाप्त करते हैं वह तुरन्त व्यास से आग्रह करती है

धर्मबद्ध युधिष्ठिर जो भी कह रहे हैं

वह उचित है।

मुझे भय है कि मेरे शब्द व्यर्थ न हो जाएं

और अगर ऐसा हुआ तो क्या मैं

असत्य से कलंकित न हो जाऊंगी? (19818)

शायद वह अवचेतन मानसिकता में कहीं स्वयं को दोषी होने से बचा रही थी। कूटनीति से द्रोपदी को पांच पुरुषों की पत्नी बनाकरह्यइतने ही पुरुष कुन्ती के जीवन में आए थेहृ इस प्रभावशाली तरीके से उसने यह निश्चित कर लिया था कि उसकी पुत्रवधू उसे कभी दोषी इंगित न करे कि उसके पति के अतिरिक्त पांच पुरुषों से सम्बन्ध रहे हैं हमेशा की तरह कुन्ती ने यह साबित कर दिया कि उसके पास अपने तरीके हैं इस बार व्यास (अपने श्वसुर) की सहायता से। कुन्ती की अपने पुत्रों के सम्बंध में महत्वाकांक्षा वहां मुखर हुई जब उसने औपचारिक रूप से द्रौपदी को विवाह के अवसर पर आर्शिवचन कहे

" तुम कुरु राजवंश की महारानी बनो

अपने धर्मप्रिय पति के साथ

कुरुजंगल की राजधानी में।" ( 2099)

उनके भतीजे कृष्ण अपनी यदुवंशी सम्पदा और शक्ति के साथ पाण्डवों का साथ देने के लिये आगे आते हैं। कुन्ती की कूटनीति की दृढ़ता तब सिद्ध होती है जब कौरव पाण्डवों की एकता समाप्त करने के प्रयास में एक सुन्दर मोहक गणिका नियुक्त करते हैं उन्हें आकर्षित करने के लिये। तब कर्ण कहते हैं कि जैसा कि वे सभी एक अतीव सुन्दरी स्त्री द्रौपदी से विवाहित हैं तो यह प्रयास असफल होगा ही।

बाद में कुन्ती पीछे हट जाती है अपना यह गौरवमय स्थान द्रौपदी को सौंप कर। चौपड़ खेलने से पूर्व पाण्डवों का उससे न पूछा जाना तथा उसे भुला दिया जाना उसके लिये आश्चर्यजनक होता है जो कि विवाह होने तक उसके प्रभाव में रहने वाले पांचों भाइयों के सन्दर्भ में बहुत अजीब सी बात है। यह पहली घटना होती है जिससे सबक लेकर वह स्वयं को निर्णायक की भूमिका में से हटा लेती हैजो कि उन्हें विनाश की ओर ले जाती है।

इसके बाद वह तीन बार इस छाया से निकल कर निर्णायक रूप से हस्तक्षेप करती है। जब उसके पुत्रों को अज्ञातवास में भेजा जाता है तो वह हस्तिनापुर में ही रह जाती है धृतराष्ट्र को अपने पुत्रों के अधिकारों के हनन में हुए अन्याय के लिये एक लगातार मूक फटकार लगाती सी प्रतीत होती है। बाद में उद्योग पर्व में वह कृष्ण से कहती है जो कि शान्तिदूत बन कर आए होते हैं कि युधिष्ठर को एक क्षत्रिय की भांति अपने अधिकारों के लिये लड़ना ही होगा। वह उनकी  भर्त्सनाकरती है एक राजा होकर अपने कर्तव्य को उपेक्षित करने के लिये तथा यह मिथ्या विश्वास पालने के लिये कि शांति को ग्रहण करना ही उचित धर्म है? उन्हें प्रेरित करने के लिये वह एक युक्ति दोहराती है जो कि उसने वरनावत में वनवास के दौरान अपनाई थी।

" इससे अधिक अपमानजनक क्या हो सकता है

कि तुम्हारी मां मित्रहीन व अकेली हो

दूसरों का दिया भोजन खाने को विवश हो ?

शक्तिमान भुजाओं वाले

विनम्रता फिर विरोध उपहार

बल और विचारविमर्श के द्वारा

अपने पूर्वजों का राज्य फिर से प्राप्त करते हैं।

राजा के धर्म का पालन करो

अपना पारिवारिक सम्मान पुन: प्राप्त कर। ( 13232)

उन्हें फिर प्रेरित करने के लिये वह विदुला का उदाहरण देती है जो कि उसके पुत्र संजय को समझाती है जो कि हारने के बाद युद्ध में नहीं जाना चाहता ।

" तिन्दुक की लकड़ी की तरह भभको

न कि अन्दर ही अन्दर जलो और आगविहीन धुंआ उगलो।" ( 13314)

यह जुडवां कांटा उन्हें चुभा कर कुन्ती उन्हें अब प्राकृतिक प्रेरणा देती है उसकी पुत्रवधू का अपमान बिना शब्दों को तोड़े मरोड़े वह पांचों को फटकारती है जब तक कि उनका सुषुप्त पुरुषार्थ जाग नहीं जाता।

" पांचाल की राजकन्या सारे धर्मों को मानती है

तुम्हारी उपस्थिति में उन्होंने इसको अपमानित किया

कैसे तुम इस अपराध को क्षमा कर सकते हो?

राजपाट हमसे छिना मैं आहत नहीं हुई

चौपड़ में तुम हार गये मैं आहत नहीं हुई

मेरे पुत्रों को वनवास दिया मैं आहत नहीं हुई

किन्तु यह अपमान भरी सभा में द्रोपदी का रुदन

जैसा कि उन्होंने इसके साथ दुवर््यवहार किया

उससे अधिक पीड़ादायक मेरे लिये कुछ नहीं हो सकता।ह्य 13716‚18हृ

अपने पुत्रों को सुरक्षित रखने के लिये तो वह अपने विवेक के साथ कर्ण के समक्ष अपने प्रथम पुत्र होने की स्वीकारोक्ति का लज्जाजनक और स्वयं के लिये संत्रासदायक निर्णय तक ले लेती है जिसे की उसने लम्बे समय तक गोपनीय रखा होता है। जबकि वह यह नहीं जानती कि कृष्ण पहले ही यह राज कर्ण को बता कर कर्ण को मनाने में असफल हो चुके हैं इस बात का प्रलोभन देकर भी कि इस तरह तो द्रोपदी तुम्हारी भी पत्नी हुई।

" वृशिनी नारी कुरुवंश की वधू

प्रतीक्षारत थी

वह सूर्य की गर्मी में

मुरझाए कमल की माला की तरह

उदास हो गयी।

उसने कर्ण के वस्त्रों की छाया में आश्रय लिया।"( उद्योग पर्व 14429)

माना कि वह कर्ण द्वारा नकार दी गई पर इस असफलता के पीछे कुन्ती की सफलता छिपी थी। उसने उससे यह वचन ले लिया था कि वह किसी पाण्डव को नहीं मारेगा अर्जुन के सिवा। उसने कर्ण को अन्दर से कमज़ोर कर दिया था जबसे वह जान गया था कि वह अपनी मां के पुत्रों के साथ युद्धरत है जबकि वे लोग सोचते थे कि वह एक सारथी का पुत्र है जिसे कि द्रोपदी और अभिमन्यु के प्रति किये अपराध का दण्ड अवश्य दिया जाएगा।

 

कुन्ती के पास वह दुर्लभ क्षमता है जो हमें आश्चर्यचकित करती है कि कन्या के रूप में यह कितनी अलग है औरों से। जबकि उसने जो काम किया उसमें विजय हासिल की उसने सबको चकित किया वनवास के दौरान धृतराष्ट्र और गांधारी को भी उसने अपने अंतिम दिन उन लोगों के साथ बिताये जो कि उसके संघर्षों का कारण बने थे। इसकी प्रतिक्रिया में कुन्ती का अपने पुत्रों के क्रोध का उत्तर था कि हां उसने उन्हें प्रेरित किया कि वे लड़ें ताकि वे जुल्म का शिकार न हों और वह अपने पति के शासनकाल में खूब मन भर कर शासन का सुख ले चुकी है। उसकी कोई इच्छा नहीं कि वह अपने पुत्रों द्वारा विजित राज का उपभोग करे। बिना प्रयास के सहज ही उसने स्वयं को मातृत्व के बंधनों से परे कर लियाॐ

शांति से बैठ उसने मृत्यु स्वीकार कर ली कि जंगल की आग उसे समेट ले। यहां बहुत गहरा अभिप्राय है कि यह महाकाव्य उसे सिद्धि अर्थात पूर्णता का अवतार घोषित करता है।वह निश्चित रूप से स्त्रीत्व की पूर्णता सिद्धि की प्रतीक है और वह आधुनिक व्यवहार जगत में आजकल के सन्दर्भों में एक आदर्श स्त्री है एक अकेली मां के रूप में।

कुन्ती कन्या का एक परम उत्कृष्ट उदाहरण है हमारे पुराण में। एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व अपनी कामेच्छा पर यथोचित संयम के साथ उसने अपने हर सम्बन्ध के साथ एक से अधिक पुत्रों की कामना नहीं की और उसने पाण्डु की नि:स्सहायता का फायदा नहीं उठाया और पुरुषों के साथ शारीरिक संपर्क रख कर। उसने इस विपरीत परिस्थितियों और बैरी संसार में अपनी राह स्वयं बनाई। उसने अपने पुत्रों को पुर्नप्रतिस्थापित किया और अन्तत अपने आहत अहम को संतुष्ट किया। उसने अपना पूरा जीवन सामन्जस्य स्थापित करने में समर्पित कर दिया उसकी मानसिक शान्ति सारा उत्साह इसी में चुक गया।

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