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पंचकन्या - 9

द्रौपदी ने भीम को जिस चतुराई से किचका को नष्ट करने के लिये उकसाया वह बड़ा आकर्षक पाठ है यौन शक्ति की कला और कौशल का। वह अर्जुन की तरफ नहीं बढ़ी क्योंकि वह जानती थी कि वह युधिष्ठिर के परम शिष्य हैं जैसा की चौपड़ के खेल में भी देखा गया था। ऐसे भी भीम ही था जिसने उसके अत्याचार के लिये क्रोध गर्जना की थी।

अब वह उससे रात के अंधेरे में बाहर निकल कर ढूंढती है वह रसोई में सो रहा है वह उसे ऐसे जा लिपटती है जैसे कोई उत्तेजित स्त्री जैसे जंगली सारस की मादा अपने साथी के करीब जाकर सट जाती है जैसे तीन वर्षीय गाय अपने पहली ऋतु में बैल से अपनी देह रगड़ती है। वह भीम को चतुर्दिक गोमती के किनारे लगे एक बड़े शाल वृक्ष पर लिपटी लता की तरह अपने अंक में भर लेती है जैसे सिंहनी सोये हुए जंगल के राजा को घने जंगल में कस लेती है जैसे कि कोई उन्मत्त हथिनी एक बड़े हाथी का आलिंगन करती है।

भीम उसकी बांहों में जागते हैं दौपदी उसका परिचारन कर अंतिम आघात करती है उसे वीणा के गंधार स्वर में जो कि सरगम में तीसरे स्थान पर होता है उसके गुस्से को भड़काने के लिये वह अपने दुर्भाग्य का रोना रोती है कि कैसे वह एक राजकुमारी होकर आज विराट की राजकुमारी के लिये स्नानकक्ष में पानी भर कर ले जाती है और यह उल्लेख करना नहीं भूलती कि कैसे वह मूच्र्छित हो गई थी जब वह जंगली जनवरों से लड़ रहा था और अन्य स्त्रियों की चुभने वाली टिप्पणियों को बढ़ा चढ़ा कर बताती है। अंतत: अपने नारीत्व से भरे अनिवर्चनीय स्पर्श के साथ वह अपनी हथेली उसकी ओर बढ़ाती है जो कि रानी के लिये मक्खन मथ कर फट चुके हैं। उसकी वही प्रतिक्रिया होती है जिसके लिये द्रौपदी ने यह सब रचा और सोचा था पूर्ण सफल

" भेड़िये के समान कटि वाले

शत्रु का दमन करने वाले भीम ने

अपना चेहरा अपनी पत्नी के

कोमल मगर फटे हुए हाथों से ढक लिया

और उसके आँसू बह निकले" ( विराट पर्व‚ 2030)

अब किचका की मृत्यु निश्चित थी। जब किचका मृत्यु को प्राप्त हुआ तो उसके शव को छिपाने की जगह द्रौपदी ने निर्दयता से अकड़ कर शव उसके सम्बन्धी के सामने फेंक दिया जो कि उसके बदले की भावना को उजागर करता है। उन्होंने उसका अपहरण कर लिया और उसे फिर से भीम ने जलने से बचाया।

आरंभ में जब चौपड़ खेला जा रहा था और उसे दांव पर लगाने के लिये बुलवाया गया तब कायरता के साथ पति के आदेश का पालन करने की जगह यह यजनासनी सभी कुरुवंश के बुर्जुगों को धर्मसम्बन्धी चुनौती देकर सकते में डाल देती है। वह अपने पति का आदेश मानने की बजाय वह एक प्रश्न भेजती है वापस जिसका उत्तर कोई नहीं दे पाता युधिष्ठिर जो कि स्वयं पहले ही स्वयं को दांव में हार चुके हैं तो वे उसे कैसे दांव पर लगा सकते हैं?

वह बड़ी कुशाग्र बुद्धि थी निसन्देह अपने आप में पूर्ण एकरूपा वह कुरुवंश के बड़े और पूजनीय लोगों के पक्षपात पूर्ण अत्याचार के लिये झिड़कने से भी हिचकी नहीं। जब कर्ण उसे दासों के स्थान की ओर धकेलने का आदेश देते हैं तब वह अपने मूक बैठे पतियों की ओर देख रो पड़ती है। किन्तु उधर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती। तब अपने मस्तिष्क की त्वरा से वह प्रणाम की सामाजिक रीति के लिये रुक जाती है कुछ पलों की छूट के कारण खींचातानी के बाद अपने बंधे हाथ छुड़ा लेती है। उसकी आवाज़ में व्यंग्य भरा है। परिवार के बुर्जुग जिन्हें वह प्रणाम करती हुई जानबूझ कर ' कर्तव्य' शब्द का प्रयोग करती है जिसमें मूक सन्देश है विदुर के शान्त चेहरे की ओर देख वह जताती है कि अपना कर्तव्य निभाओ और राजवधू को इस अत्याचार से बचाओ यहां शब्दों का चयन देखिये

" एक कर्तव्य शेष रह गया है जिसे

मुझे अभी पूर्ण करना है जिसे मैं इस महान योद्धा

के खींचे जाने पर लगभग भूल गई थी।

मैं इतने असमंजस में थी।

श्रीमन्तों मैं आप सभी को झुककर प्रणाम करती हूं

सभी मेरे बुर्जुगों मेरे बड़ों मुझे क्षमा कर दीजियेगा

पहले मैं ऐसा न कर सकी।

यह मेरी भूल नहीं थी

सभा के भद्रजनों! ( सभा पर्व‚ 6730)

यहां 'महान योद्धा' जो कि अपनी ऋतुस्त्राविता अपनी भाभी को उसके बालों से पकड़ खींच रहा है जो कि आजकल एकवसना है। इसलिये वह परेशान हो अपना कर्तव्य भूल गई जबकि उसके बड़े बुर्जुग जो कि पूरी तरह से भुलक्कड़ हैं जबकि उन्हें एक दासी पुत्र ने याद भी दिलाया था। यह उसकी गलती नहीं है कि उसके साथ अत्याचार हुआ और निश्चय ही कुरुवंश के बड़े लोगों की अपेक्षा वह असमंजस में नहीं है जिन्हें भीष्म कहते हैं

"हमारे बुजुर्ग जो कि धर्म पारंगत थे

द्रोण और अन्य बैठे रहे आंखे नीची कर मृत पुरुषों की भांति

जैसे कि जीवन और सांस चले गये हों।" ( सभा पर्व‚ 6920)

यजनासनी सफल हुई अपने दास पतियों की स्वतन्त्रता फिर से जीतने में। कर्ण ने उसे विशेष श्रद्धा दी यह कह कर कि विश्व में कोई भी प्रसिद्ध व सुन्दर स्त्री इतनी दक्ष और निपुण नहीं हो सकती है जिसने एक नाव की तरह उसने अपने पतियों को दु:ख के समुद्र में डूबने से बचाया। (सभा 721)

वह आश्चर्यजनक सम्मान के साथ धृतराष्ट्र द्वारा दिया गया तीसरा वचन ठुकरा देती है कि अगर उसके पति अपने हथियारों के साथ स्वतन्त्र हैं तो उसे किसी अन्य वरदान या वचन की आवश्यकता नहीं। कोई भी इक्कीसवीं सदी की महिलामुक्ति विचारधारा वाली स्त्री स्वयं सिद्धा होने में द्रौपदी को मात नहीं दे सकती। क्या हम कल्पना भी कर सकते हैं कि किसी स्त्री को जबरन ले जाया जा रहा हो और उसके पति खामोश बैठे हों फिर जंगल में वह अपहृत हो और उसके पति अपहरणकर्ता को क्षमा कर पक्षपात करें फिर दरबार में उसके साथ अत्याचार हो और अपने ही पतियों द्वारा वह सचेत की जाए कि ' तमाशा मत करना'। फिर उसे जीवित जलाने के लिये ले जाया जाए फिर जब युद्ध की भयावह स्थिति सामने हो तो उसके पतियों द्वारा उसे आगे कर दिया जाए कि कृष्ण से शान्ति की प्रार्थना करे और अन्तत: उसे प्राप्त क्या हो अपने मृत सम्बन्धी और पुत्र ? और फिर भी वह मानसिक रूप से संतुलित रह सकती है?

एक स्पष्ट विरोधाभास देखा जा सकता है द्रौपदी और शैव्या हरिश्चन्द्र की पत्नी में उसके मुख से एक शब्द नहीं निकला था जब विश्वामित्र ने उसे उसके राज्य से बाहर निकाल दिया था और उसे एक छड़ी से उधेड़ डाला क्योंकि थकान की वजह से वह जल्दी नहीं चल पा रही थी ह्य( 729)। वह स्वयं हरिश्चन्द्र को कहती है कि अब मैंने अपना कर्तव्य आपको पुत्र देकर पूरा कर लिया है तो आप मुझे बेच कर विश्वामित्र को बकाया दे दें जो वे चाहते हैं। जिस ब्राह्मण को उसे बेचा जाता है वह उसे उसके बाल पकड़ कर खींच ले जाता है और वह मौन रहती है। यह निश्चय ही सती के अनूकूल व्यवहार है जो कि अन्तत अपने स्व को मिटा देती है और अपने पति के लिये ही वह जीती है।

दूसरी ओर कन्या का चरित्र अपनी ही चमक से दीप्तिमान होता है जो कि उसके पति और बच्चों से एकदम स्वतन्त्र होता है। वह अपने लिये आत्मसंतुष्टी ढूंढती है समाज और परिवार के मानदण्डों की परवाह किये बिना। इसलिये द्रौपदी ने तब तक विश्राम नहीं किया जब तक कि उसका बदला पूरा नहीं हुआ जिसके लिये उसके पिता ने उसके अवतरित होने का आव्हान किया था और जब तक कि उसने अपने ऊपर हुए अत्याचार के अपमान को रक्त से नहीं धो डाला। वनवास के पूरे तेरह साल उसने अपने पति और सखा कृष्ण को यह भूलने की अनुमति नहीं दी कि कैसे उस पर अत्याचार हुआ था और कैसे उन्हें धोखे से उनके राज्य से वंचित कर दिया गया। जब उसे पता चलता है कि उसके पति सहदेव को छोड़ कर सभी युद्ध की बजाय शान्ति चाहते हैं तो वह अपने सारे स्त्रियोचित गुण और आकर्षणों का सहारा लेती है और घटनाक्रम को अटल होकर युद्ध की ओर मोड़ देती है। अपनी पीड़ाओं का राग अलाप कर अपने सर्पिणी से काले केश खोल कर और आँसू भरे नेत्रों के साथ वह उन घटनाओं को बार बार याद दिलाती है जब भी कृष्ण शान्तिपूर्ण सन्धि के बारे में बात करने आते हैं। सुबकते हुए वह घोषित करती है कि अभिमन्यु के नेतृत्व में उसके पांच पुत्र और उसके वृद्ध पिता और भाई उसके लिये प्रतिशोध लेंगे अगर उसके पति नहीं लेते तोॐ कृष्ण का उत्तर वही होता है जो कि उसका लक्ष्य था ही

" जिनके तुम पक्षधर नहीं हो

उन्हें तुम मृत ही समझो!

हिम से ढके पर्वत खिसक सकते हैं

धरती हिल सकती है

स्वर्ग सौ टुकड़ों में बिखर सकता हैऌ

किन्तु मेरा वचन नहीं डिग सकता

तुम देखना तुम्हारे शत्रु मारे जाएंगे।" ( उद्योग पर्व 8245‚48)

महाकाव्य का घटनाचक्र पांच श्यामवर्णी व्यक्तियों तथा कुन्ती के द्वारा निर्धारित है उनमें से तीन कन्या चरित्र हैं जैसे गन्धकाली ( सत्यवती) कृष्ण द्वेपायन व्यास वासुदेव कृष्ण यजनासनी( द्रौपदी) अर्जुन और कुन्ती। पहले तीन यमुना के श्याम जल से जुड़े हैं जबकि सत्यवती कुन्ती और द्रौपदी एक दूसरे का प्रारूप हैं।

द्रौपदी ही इस महाकाव्य में एक ऐसा चरित्र है जो कि सती से कन्या बना है। इस महाकाव्य के दक्षिण भारतीय पाठ में यह वर्णित है कि अपने पिछले जन्म में नलायनी जो कि इन्द्रसेना के नाम से भी जानी गई के रूप में इसका विवाह मौदगल्य से हुआ जो कि चिड़चिड़े और कोढ़ पीड़ित ऋषि थे। वह अपने इन बुराभला कहने वाले पति के प्रति पूर्ण समर्पिता थी जब उसकी एक कोढ़ से झड़ी उंगली उनके खाने में गिर गई तो उसने उसे चुपचाप निकाला और वो बिना घृणा किये वही चावल खाती रही। इस बात से प्रसन्न होकर मौदगल्य ने उसे एक वरदान मांगने के लिये कहा इस पर उसने उनसे इच्छा जाहिर की कि वे उसे पाँच सुन्दर पुरुषों के रूप में प्रेम करें। जैसा कि वह कभी न संतुष्ट होने वाली स्त्री थी मौदगल्य बहुत जल्दी ही ऊब गये और फिर उन्होंने अपने आप पर आत्मनियंत्रण कर लिया। जब उसने पुन: अपनी इच्छा का प्रदर्शन किया और उनसे बार बार ऐसा प्रेम करने का आग्रह किया तो उन्होंने गुस्से में उसे श्राप दे डाला कि जा जब तू पुर्नजन्म लेगी तो तेरी इस वासना को पूरा करने के लिये पांच पति होंगे। उसके बाद उसने शिव की तपस्या की और उन्हें प्रसन्न किया और उनसे वरदान मांगा कि अगर अगले जन्म में अगर उसके पांच विवाह हों तो हर पति के साथ संर्सग के बाद उसकी कौमार्यावस्था उसे पुन: प्राप्त हो जाए। अत:अपने अपने नारीत्व की दृढ़ता के साथ जीवन भर अंधों की तरह अपने पति के उद्देश्यों को पूरा करने से मना कर दिया और सती नलायनी ने स्वयं को यजनासनी कन्या के स्वरूप में ढाल लिया। ब्रह्मवैवार्ता पुराण के अनुसार वह सीता की छाया का अवतार थी जिसने की रावण के हाथों शोषित होने के बाद वेदवती के रूप में जन्म लिया जो कि इन्द्र के स्वर्ग की लक्ष्मी बनी।

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