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थके हुए पंख
खिलखिलाते बच्चों‚ चहचहाते पंछियों‚ खिले हुए फूलों के समूह अकसर आकर्षित करते हैं। मुझे आज भी नहीं भूलता वह दृश्य — सांझ का समय‚ यमुना का किनारा‚ ताजमहल के प्रांगण से पंछियों के उस उनमुक्त बड़े से समूह का उड़ना‚ एक सामन्जस्य के साथ यमुना की लहरों को छूने पल भर को झुकना‚ फिर लहरा कर एकसाथ ऊपर आसमान छू आना। यह दृश्य भी भूलने जैसा नहीं था‚ यह भी एक खिलखिलाता‚ चहचहाता समूह था… पर उस चहचहाहट में एक पीड़ा भी थी‚ उस खिलखिलाहट में ज़माने भर का अनुभव था‚ बदलते हुए मानवीय मूल्यों के प्रति रोष था। इन पंछियों के पंख थक चुके हैं‚ उड़ानें सीमित हो चली हैं तो क्या…।
यह समूह था करीब बीस – बाईस बुजुर्गों का। जयपुर के स्टैच्यू सर्कल के गार्डन में एक समूह में दो बैंचों पर बैठे सफेद बालों और झुरिर्यों और अनुभव से सजे चेहरे वाले ये उम्रदराज स्त्री पुरुष खिलखिला रहे थे। अपने हमउम्रों के साथ का यह सुख उल्लास बन उनके चेहरे पर बिखरा था। यहां सब सबकी सुनते होंगे‚ सबके दु:ख लगभग एक से‚ सबकी बातें लगभग एक सी। मुझे बहुत अच्छा लगा था यह दृश्य देखना कार में से… क्योंकि वहां से होकर मैं जब गु.ज़र रही थी तो अपने पीछे छोड़ कर आई थी ऐसे ही दो उदास चेहरे… अपने जनकों के… जो बेटी और उसके बच्चों के साथ सप्ताह गुज़ारने के बाद फिर से उसी एकान्त को जीने का मजबूर थे।
हालांकि इस बार एक सन्तोष सा था‚ क्योंकि उन्होंने भी जुटा लिया था पास ही के पार्क में एक ऐसा ही समूह अपने हमउम्र लोगों का। मैं ने खिलखिलाते देखा था मम्मी को अपनी हमउम्र सहेलियों के साथ। पापा को टहलते देखा था रिटायर्ड लोगों के समूह के साथ राजनीति पर बहस करते – करते।
" मम्मी – मम्मी नानी बुला रही हैं‚ बहुत सारी नानी की फ्रेण्ड्स आई हैं आपसे मिलने‚ नानी कह रही हैं वो सब भी नानी हैं।" दुलार से भरे उन चेहरों को भूल नहीं पाती मैं। सबके हाथ में बच्चों के लिये चॉकलेट्स या कुछ छोटा मोटा उपहार था। मैं अभिभूत हो गयी थी।पर बाद में जाना उन में से हरेक की कहानी को तो मन रो पड़ा। विश्वास ही नहीं हुआ हरेक की कहानी मम्मी – पापा जैसी ही नहीं बल्कि उससे भी मार्मिक है।
" वो गुजराती आंटी थी न… बेटे बहू के साथ रहती तो है दब – पिस के। बहू पूरा खाना ही नहीं देती। वो अपने पति से शिकायत करती हैं तो वे चुप करा देते हैं — ' ठीक है न बुढ़ापे में कम ही खाना खाना चाहिये। बेटे को मत शिकायत करना‚ लड़ाई हो जायेगी।एक ही बेटा है‚ हम कहां जायेंगे? ' जबकि उनका भिलाई में मकान है‚ खुद इन्जीनियर थे। रिटायरमेन्ट के पैसे से बेटे को कार और मकान दिलवाया। बेटा बहुत अच्छा है‚ उसके मोह में यहीं रहते हैं। "
" और उन बंगाली आंटी के बेटा – बहू सब अच्छे हैं‚ पोती जान देती है उनपर। कोई पाबन्दी नहीं । पर हमसफर के न होने का दु:ख‚ दिन भर बेटे बहू के नौकरी पर रहने के कारण पोते – पोती को संभालना‚ नौकरों को देखना… उन्हें लगता है‚ खाने और आश्रय के बदले में उन्हें इस्तेमाल किया जा रहा है।"
" वो जैन साहब की पत्नी तो मुझसे कहती हैं —" बहनजी आप सबसे सुखी हो‚ बेटा बहू छोड़ गये तो क्या? आराम से दोनों पेन्शन लेते हो‚ फुल टाइम सर्वेन्ट रखते हो‚ जो जी चाहे खाओ‚ जो जी चाहे करो। बेटियां आती जाती रहती हैं। जान को कलेश तो नहीं है। कौनसा मंत्र है‚ हमें भी बता दो कि बेटा बहू अलग हो जायें तो हम भी आप दोनों की तरह चैन से रहें। पैसे की कमी नहीं‚ हम तो कहते हैं ले जाओ दो – दो लाख रूपये अलग हो जाओ तीनों बेटे। दिन भर झगड़ा कि सास – ससुर का खाना कौनसी बहू बनाये। इसको कुछ दे दो तो दूसरा लड़ने आजाये। रिटायरमेन्ट का पैसा और यह मकान है जो जी का जंजाल है।"
" वो दिख रहा है न बड़ा सा हवेलीनुमा मकान‚ एक रिटायर्ड आई ए एस का है। एक ही बेटा है जिसके लिये यह विशालकाय मकान बनवाया है। पर उसकी डॉक्टर पत्नी का यहां दम घुटता था‚ अब वह सरकारी क्वार्टर में अलग रहते हैं। यह भव्य बड़ा मकान सांय सांय करता है। बूढ़े कलेक्टर साहब सुबह सुबह गिरते पड़ते दूध लेने जाते हैं। पत्नी बीमार बिस्तर पर पड़ी रहती हैं। डर के मारे नौकर नहीं रखते। एक नौकरानी खाना पका जाती है‚ वही खा लेते हैं।"
हरेक की एक कहानी। घूम फिर कर वही जान के टुकड़ों द्वारा रुसवा किये जाने की दास्तानें। मन कच्चा कच्चा हो आया था — कैसा मोह फिर सन्तान का? किसके लिये एक एक पाई जोड़ कर घर बनाने की कवायद?
भारत की यह वर्तमान बुज़ुर्ग पीढ़ी‚ आज कैसी स्थिति में जी रही है? कहां गई वह बड़ों को सरपरस्त मानने की परम्परा? बूढ़े बरगदों की छाया को वरदान मानने के वो हमारे मूल्य? आज की परिस्थिति के लिये दोष किसका? क्या एकल परिवारों की नींव इसी बुज़ुर्ग पीढ़ी से आरम्भ नहीं हुई थी‚ चाहे नौकरियों के प्रयोजन ही से सही… एकांगी परिवार इसी पीढ़ी ने आरम्भ किये होंगे। मजबूरी से ही सही इसी पीढ़ी के माता – पिता पुश्तैनी घरों में अकेले छूटे होंगे। परम्परा की कड़ी तो टूटी होगी‚ इसी बुर्जुग पीढ़ी के समय से! पर तब मूल्य थे‚ सम्मान था‚ अपने बड़ों के प्रति ज़िम्मेदारी का अहसास था। मैं ने पापा के चारों भाइयों को हर माह दादाजी दादीजी को मनीऑर्डर करते देखा है‚ हर दिवाली पर‚ गर्मी की छुट्टी में हम सब वहां एकत्र होते थे।
पहले इक्का दुक्का कहानियां सुनाई देती थीं‚ बेटों द्वारा माता पिता से र्दुव्यवहार और अकेले छोड़ दिये जाने की। तब एक सामाजिक लिहाज़ हुआ करता था पर अब समाज के अन्य मूल्यों के परिवर्तित होते होते वह एकमात्र लिहाज़ भी छूट गया! अब तो बूढ़ों की हर घर में से जगह ही खत्म। दो बेडरूम का घर हो तो — एक पापा मम्मी का‚ एक बच्चों का। छि: कितने गन्दे लगते हैं ड्राईंगरूम में बैठे हुए दादाजी। तीन बेडरूम का घर तो एक पापा मम्मी का‚ एक बच्चों का‚ एक स्टडीरूम… दादी बाहर गैलरी में पड़ी रहें। बेटे लड़ें — ' मैं ने रख लिया छ: महीने‚ अब तुम रखो इन बुढ़ऊ को। अच्छा! मां तुम रख लो‚ पापा को मैं रखे लेता हूँ। बीमारी का खर्चा आधा – आधा।' घरों के साथ – साथ दिल भी संकरे हो गये हैं। माता – पिता बोझ।
अब तो सड़क पर मजदूरी करते‚ फल सब्जी बेचते‚ सामान ढोते‚ भीख मांगते‚ पॉलिश करते
वृद्ध जनों की संख्या भारत के शहरों में दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है। हम बुद्धीजीवी – सम्वेदनशील लोग छटपटाते हैं‚ पर हमारे घरों के बुज़ुर्ग भी एकाकी हैं‚ पीड़ित हैं — हम यह नहीं देख पाते। न हममें से कोई ज़रा सी फुरसत उनके लिये निकालता है। यह एक ऐसी समस्या है‚ जिस पर दो पल रुक कर सम्वेदना तो प्रकट की जा सकती है पर इसे बाद में आराम से नज़रअंदाज़ किया जा सकता है — ' यार! देश बड़ी बड़ी समस्याओं से जूझ रहा है‚ यह तो मामूली सी समस्या है। जिस देश की नई सुबह सड़क पर पत्थर ढोती है तो‚ इस ढलती हुई थकी शाम की परवाह कौन करे? '
स्वयं मैं भी तो उस वृद्ध जनों के खिलखिलाते समूह को देख कर‚ मम्मी से उनके हमउम्रों के दु:ख सुनकर प्रेरित हुई थी कि मैं ज़रूर 'कुछ' करुंगी इन सब के लिये। मैं ने तुरन्त ही अपने पति से कहा कि मैं एक क्लब बनाउंगी‚ जहां तमाम मनोरंजन होंगे‚ सत्संग – हवन होंगे‚ काउन्सलिंग होगी‚ मेडिकल चैकअप्स होंगे‚ स्वस्थ भोजन उपलब्ध कराने के लिये मैस होगी‚ पिकनिक्स – आउटिंग्स की व्यव्स्था। फंक्शन्स करेंगे जहां उनके बच्चों को बुलवाया जायेगा‚ सम्बन्ध सुधारने के सकारात्मक प्रयास होंगे। उस क्लब से समाज को लौटा कर बहुत कुछ दिया जायेगा। उन रिटायर्ड अनुभवी लोगों को अच्छी पुस्तकें लिखने को प्रेरित करेंगे। उनसे सामाजिक कार्य करवाएंगे कि वे समाज से जुड़ा महसूस करेंगे। और महज पेन्शनयाफ्ता बुजुर्गों के लिये ही क्लब ही नहीं होगा बल्कि उन साधनविहीन‚ आश्रयविहीन वृद्धों को साधनयुक्त वृद्धों द्वारा आश्रयस्थल मुहैय्या करवाया जायेगा। पैसे का क्या है‚ संस्थाओं‚ सरकारों‚ अमीर वृद्धों से जुटा लेंगे। मेहनत करनी होगी।
मेरा उत्साह को कम नहीं करना चाहते थे मेरे पति‚ पर उन्होंने पूछा – " बात तो अच्छी है‚ इरादा भी नेक है‚ पर यह सब कब और कहां से शुरु करोगी?"
" अभी नहीं। पहले अपने बच्चे बड़े हो जायें तब! "
बस! यहीं है कमज़ोर कड़ी‚ आजकल के परिवार बच्चों से केन्द्रित हैं‚ बच्चों का पालन‚ बच्चों की मरज़ी‚ बच्चों की मांगे‚ बच्चों की पढ़ाई‚ बच्चों का कैरियर‚ बच्चों की शादी … बच्चों के लिये अपना सर्वस्व झौंकते हैं हम अपने जनकों को उपेक्षित करके। और वे बच्चे हमें क्या लौटायेंगे? वही उपेक्षा !! वही निर्वासन !! जो हमने बच्चों के लिये अपने बुजुर्गों को दिया है।
क्या जिन पक्षियों ने हमें पहली उड़ान सिखाई‚ क्या हम उनके थके पंखों को अपना सहारा भी नहीं दे सकते?

– मनीषा कुलश्रेष्ठ

 


वरिष्ठ नागरिक
इमारतों का दायित्व नीवों के प्रति – सम्पादकीय

अतीत से (कहानियां)
बूढ़ी काकी – प्रेमचन्
खोल दो – सआदत हसन मन्टो

कहानी
आज़ादी – ममता कालिया
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पाषाणपिण्ड विनीता अग्रवाल
ठिठुरता बचपनरोहिणी कुमार भादानी
हंगेरियन कहानी
भिखारीज़िगमोन्द मोरित्स – अनुवाद: इंदु मज़लदान

संस्मरण लेख
थके हुए पंख मनीषा कुलश्रेष्ठ

कविता
आयुजया जादवानी
ठूंठ सुधा कुलश्रेष्ठ
उम्र मनीषा कुलश्रेष्ठ

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