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अनूदित हंगेरियन कहानी
भिखारी
                   
मैं घर में अकेला था। दरवाजे. पर दस्तक हुई। मैं ने उठकर दरवाज़ा खोला। एक सफेद बालों वाला वृद्ध बाहर खड़ा था।
" क्या आप मुझे कुछ खाने को दे सकते हैं, साहब? मैं एक बूढ़ा आदमी हूँ, पेशेवर इंजीनियर रहा हूँ — पढ़ा लिखा इंजीनियर।आज मेरे पास कुछ नहीं है बेहद भूखा हूँ।"
उसकी इस अवस्था ने मुझे हिला दिया। कोई पढ़ा – लिखा व्यक्ति इस स्थिति में कैसे आ सकता है कि एक दाना अनाज तक मांगने की नौबत आ जाये… मैं ने उसे रसोई के भीतर बुलाया और कुछ बचा खुचा खाना तलाशने लगा। कुछ पड़ा था एक थाल में, जिसे मेरे परिवार वाले घर से बाहर जाते वक्त छोड़ गये थेह्य एक किसी को कन्धा देने गया था, दूसरा मौज – मस्ती करने और तीसरा काम परहृ…
मैं ने एकाध स्लाइस डबलरोटी का भी ढूंढ निकाला और उसे बिठाया।
" देख रहे हैं जनाब, मैं परीक्षा पास इंजीनियर हूँ। सरकारी मुलाज़िम भी रहा हूँ, कुछ समय पहले एक पब्लिक – सर्विस में था, और आज यह हालत है।" दोनों हाथ फैलाये और मुस्कुराने लगा। पर उसकी आंखें, जैसे स्वाभाविक तौर पर, फटी – फटी सी ही रहीं।
अजीब आदमी था।
मानो रिश्तेदार के रूप में आया हो, या पुरानी जान –पहचान वाले की तरह उसकी आवाज़ में इस तरह का विश्वास – सा था, एक अपनापन सा… " आज यह हालत है," यूं अपनेपन के भाव से बोलता हुआ! अपनी तरफ मेरा ध्यान केन्द्रित करता हुआ, मानो वह मेरे लिये बहुत ज़रूरी हो, प्रारम्भिक जान – पहचान के बाद!
" क्या मैं बूढ़ा हूँ साहब?… बूढ़ा हूँ और नहीं भी हूँ। मेरे बाल सफ़ेद हैं लेकिन उम्र केवल 62 वर्ष है। उस पीढ़ी का आखिरी प्रतिनिधि हूँ जिसे जबरदस्ती सेना में भरती करके सीमा पर भेज दिया गया था, इटली के खिलाफ। मेरा परिवार था। दो प्यारे लड़के थे, दोनों युद्ध में मारे गये। इस पर भी मेरे दु:खों का अन्त नहीं हुआ। उसके बाद मुझे भी ले गये दुश्मन को खदेड़ने… सदियों से जी रहा हूँ ! … इस बीच कभी काफी पैसा भी आया और ग़रीबी भी। आज मेरे पास कुछ भी नहीं है।"
ज़ोर – ज़ोर से हंसने लगा और मुझे एकटक देखने लगा। लम्बी पूंछ जैसी उसकी सफेद मूंछें पीली – सी हो गयी थीं, मानो घनी गेहूं की बालें। लगता था पिघली चांदी से अभी – अभी तैयार की गयी है उसकी सफेद दाढ़ी जो एकदम चमकती हुई थी। बिलकुल वैसी थी जैसे मेरी पिता की।
हंसा। कोई हंसने की बात तो थी नहीं, उसकी आज की दयनीय अवस्था। ओफ़! हम इस मुसीबत की ज़िन्दगी को भी कैसे जी लेते हैं! हम कैसी कठपुतलियां हैं उसके हाथों की कि एक 'कई परीक्षाएं पास किया हुआ, साठ साल का बूढ़ा इंजीनियर, ' दर – दर भटक रहा है, एक मुट्ठी अनाज के लिये। कौन कह सकता है, कौन गारंटी कर सकता है कि कल तुम्हारे साथ भी ऐसा नहीं हो जायेगा, जब बुढ़ापे का प्रहार तुम पर होगा। तुम भी क्या तब यूं ही हर दरवाज़े पर एक रोटी के टुकड़े के लिये दस्तक नहीं दोगे ?…
" मेरे साथ ऐसा न हुआ होता साहब, मगर मेरी एक पत्नी थी, बहुत अच्छी औरत। अपने बच्चों को उसने बहुत अच्छे तरीके से पाला। दोनों बच्चे पढ़े – लिखे बनाये। वह स्वयं भी बड़े अच्छे घर की थी बेचारी। 104 एकड़ ज़मीन थी बाचका में। मेरे पास दो मशीनें थीं, एक छ: हॉर्सपावर की एक चार की यहीं पैश्त के पास उसके साथ रहता था, काम करता था। जीवन अच्छा चल रहा था। पर इसी समय एक आख़िरी वेश्या ने मेरा दिमाग इस कदर खराब कर दिया। पता नहीं क्या हुआ मुझे साहब कि अपने परिवार से ही नफरत होने लगी। अपने बच्चों से, अपनी बीवी से, अपनी आरामदेह ज़िन्दगी से। साहब मैं हंस रहा था जब, सब सामान मैं ने खिड़की से बाहर फेंका। बेचारी बीवी दिल फटने से मर गयी।
झुंझलाते हुए मैं ने सुना और बूढ़े को देखने लगा जो बड़े मज़े से चटखारे लेता खाने में व्यस्त था। उसके चेहरे पर दानवीय खुशी थी, दर्द भरी खुशी, कड़वाहट से भरी बेपरवाह शांति।
" मैं इसीलिये युद्ध के लिये भी गया, साहब कि अपने आपको इस मुसीबत से छुड़ा सकूं। उप – मेयर के तौर पर भी काम किया… मैं भागना चाहता था, मरना चाहता था, अपने दोनों लड़कों की तरह, क्योंकि मुझसे बरदाश्त नहीं होता था कि मेरी इतनी ज़्यादतियों के बावज़ूद भी मेरी पत्नी हमेशा मुझे बचाने की कोशिश करती थी। वह मुझसे अब भी उतना प्यार करती थी जितना पहले। साहब, लड़ाई के मैदान में मैं ने वह सब किया जिसे करने के लिये युवा लोग सदा उतावले रहते हैं, बेहद जम कर लड़ा।
" अब मैं एक अनाथालय में रहता हूँ, डॉक्टर साहब मेरी देखभाल करते हैं। जांच – पड़ताल करते हैं, दवाई देते हैं, पर क्या वे मुझे मेरा घर वापस दे सकते हैं, ' आलोम गली नम्बर 7'। या मेरी दोनों मशीनें लौटा कर ला सकते हैं? जब मैं युद्ध – बंदी के रूप में रिहा होकर लौटा तो मेरा सब सामान जो मेरे घर में था, कर्ज़ा चुकाने के लिये छीन लिया गया। पर था ही क्या! मशीन जो सन 17 में खरीदी थी, सन 18 में जिस पर काम किया था, और जिन्हें मैं ने जला दिया था! अब मेरे खराब दिल के लिये दवाइयां देते हैं मुझे! मेरा पुराना दिल वापस दिला सकते हैं साहब, और उसके साथ मेरी अच्छी बीवी, मेरे दो बच्चे, मेरी इच्छाएं, मेरी वास्तविक खुशी जो मुझे उनके साथ रहते समय मिलती थी।
विचार मग्न उसने प्लेट को पौंछा और एक एक कण कांटे से उठा कर सहजता से बोला:
" यह कोई वापस नहीं दिला सकता। पर ताज्जुब है कभी – कभी मैं बिलकुल पागल नहीं रहता, जब सब मुझे याद आ जाता है और तब मैं बस भागता रहता हूँ , भागता रहता हूँ।" मैं शांति से उसे अपनी अंतरात्मा के उद्वेग को शांत करने का मौका देता रहा।
" यह बताइए, अगर आपको यह ज़िन्दगी दोबारा जीने को मिल जाये तो क्या आप फिर यूं ही अपनी बीवी, अपनी खुशियों को छोड़ देंगे, जैसे पहले…?"
बूढ़ा आगे की ओर झुका, विवेकपूर्ण तरीके से, पत्थर बना बोला…" साहब … अगर फिर से मुझे वैसा ही क्रोध आये… वैसी ही भयानक अनुभूति हो… तो साहब… फिर दोबारा …फिर दोबारा … क्योंकि ज़रूरी था…"
हम्म। युद्ध और भीड़ से ही पागल नहीं होता आदमी ! … आदमियों की ज़िन्दगी में भी झकझोर देने वाले तूफान आते हैं क्या? क्या ऐसा हो सकता है कि आदमी अपनी सब कीमती चीज़ों को इकठ्ठा कर उसकी होली जला दे ? और हंसे अपनी जलायी हुई आग की लपटों को देखकर।
" क्या ऐसे पकड़े हुए थी आपको, वह दूसरी औरत? निकल नहीं पा रहे थे क्या उसके चंगुल से?"
बूढ़ा ताकता रहा। मेरे प्रश्न का जवाब नहीं देना चाहता था। आदमी कभी – कभी छोटे से शर्मनाक काम को ही सही सिद्ध करने के लिये बड़े से बड़ा जुर्म कर डालता है, पर अपने आपसे कोई प्रश्न नहीं करता। फिर भी बोला
" देखिये साहब, मैं किसी को दोष नहीं देता। मैं उससे प्यार करता था, खूबसूरत थी। मैं उसे अच्छी समझता था, दिल से अच्छी। दिल से अच्छी साहब, क्योंकि मैं ने अपनी प्यारी पत्नी से यही सीखा था और यही विश्वास करता था कि जिसे प्यार करता हूँ वह गारंटी से मुझे भी प्यार करेगी दिल से। दिल तो भगवान होता है न, साहब। मैं भी उसमें विश्वास रखता था और इसी विश्वास से आश्वस्त था कि वह भी मुझे उतना ही चाहती है… और मेरे साथ आयेगी…"
" और? "
" और साहब, डेढ़ साल तक मेरी आंखों में आंखें डाल कर बातें करती रही, जैसे एक परवाना शमा से चिपका रहता है। और फिर यूं छोड़ दिया मुझे, छोड़ क्या दिया ! बूढ़ा हो गया था और निर्धन भी। हा – हा उसे और जवान और अमीर मिल गये।"
" और तुमने अपना घर, अपनी ज़िन्दगी सब इस वजह से बरबाद कर डाली? "
बूढ़े ने आंखें मींचते, दुश्मन की तरह मेरी ओर देखा।
" गुस्से के मारे! मैं बेहद गुस्से में था साहब, यह सोचकर कि यह ज़िन्दगी केवल एक बार मिलती है। मैं धोखे में था। सोचता था, मुझे दोबारा भी जीने को मिलेगी……"
इसके साथ ही उसने अपनी मूंछे खींची और खाने को कांटे से तोड़ता गया। अब मेरी समझ में आया कि क्या वह गहरी नफरत है जो हर समय उसे तड़पाती है। जबसे यहां मौजूद है, वही ज़हर इसके अन्दर से निकल रहा है।

मूलकथा – ज़िगमोन्द मोरित्स
अनुवाद: इन्दु मज़लदान

 


वरिष्ठ नागरिक
इमारतों का दायित्व नीवों के प्रति – सम्पादकीय

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