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इमारतों का दायित्व नीवों के प्रति

' वरिष्ठ नागरिक' विशेषांक को हिन्दीनेस्ट पर लाने का विचार कई दिनों से मन में था। पर एक चिंगारी की ज़रूरत थी, फिर पिछले दिनों निगाह से गुज़रे कई दृश्य, कुछ घटनाएं, कुछ लोगों की जगबीतियां और आपबीतियां सामने आईं और एक इस विशेषांक की नींव पड़ ही गई।
जिनके लिये यह विशेषांक समर्पित है उन्हें क्या कहूँ? खूब घनेरी छाया देते वटवृक्ष? ज्ञान व अनुभवों की खानें? अकेले क्षरित होते पर्वत या स्वयं हमारा भविष्य?
लगभग हरे अच्छे – बुरे, प्रतिष्ठित – नौसीखिये, नये – पुराने लेखकों ने इस विषय पर अपने अपने तरीके से लिखा है। कितनी – कितनी अच्छी, राह दिखाने वाली मार्मिक कहानियां इस विषय पर लिखी गईं। लेकिन अगर इस विषय पर मुझे कोई श्रेष्ठ कहानी चुनने का मौका दे तो मुझे बचपन में पढ़ी गई प्रेमचन्द की कहानी ' बूढ़ी काकी' सर्वश्रेष्ठ लगेगी। यह कहानी ' 1918 में उर्दू में एक उर्दू पत्रिका में छपी थी, फिर हिन्दी में 1921 में छपी थी। इस कहानी में बूढ़ी काकी की परवशता, उनका मनोविज्ञान, उनके बस से बाहर उनकी स्वादेन्द्रीय, बुढ़ापे में बच्चों का सा व्यवहार सभी कुछ बहुत बारीकी और सहजता से वर्णित किया गया है, कि वह कहानी मर्म को छूकर गुज़रती है। प्रेमचन्द की इस कहानी को हम इस अंक में शामिल कर रहे हैं। हालांकि बरसों पहले पढ़ी गयी इस कहानी को खोज निकालने में मैं ने जाने कितनी लाइब्रेरियों की खाक नहीं छानी होगी, जाने कितने मित्रों के बच्चों से अपने स्कूल की लाइब्रेरी में ढूंढने को प्रेरित किया होगा। लेकिन सफलता मिल ही गई और यह मार्मिक कहानी मैं अतीत के पन्नों से आपके लिये निकाल लायी।
इस कहानी के आरम्भ में लिखा गया एक वाक्य ' बुढा.पा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है ' तो सूक्ति ही बन गया है। यह मार्मिक कहानी तब उतनी सामयिक हो न हो आज बहुत सामयिक है, आज जब कि हमारे समाज को ' वृद्धाश्रमों ' की आवश्यकता होने लगी है, घर के सजे धजे ड्राईंगरूमों में इन बूढ़ी घनेरी छायादार वृक्षों के लिये जगह कम पड़ जाती है, और जिन जड़ों से हम निकले हैं उन्हीं जड़ों को उखाड़ कर हम ' वृद्धाश्रमों ' के संकुचित दायरों में लगा कर सदा के लिये भूल जाते हैं।
छोटे होते घरों के साथ हमारी सोच भी छोटी हो गई है, दिल संकुचित हो गये हैं। हमारे समाज को वृद्धाश्रमों की आवश्यकता पड़े, यह हमारी संस्कृति के भविष्य पर एक प्रश्न चिन्ह है। वरिष्ठ नागरिकों के लिये क्लबों, संस्थाओं का सदैव स्वागत है, यहां तक कि बेसहारा वृद्धों के वृद्धाश्रमों का होना उचित है लेकिन अपनी बुज़ुर्गों के प्रति ज़िम्मेदारी को टालने के लिये वृद्धाश्रमों का इस्तेमाल हमारी संस्कृति के खिलाफ है।
आज हमारे समाज में बुज़ुर्गों की जो अवस्था है वह अतीत में कभी नहीं थी, बुज़ुगों के साथ होने वाले अपराधों की संख्या में बढ़ोत्तरी, एकाकी बुज़ुर्गों की संख्या में बढ़ोत्तरी को तो बताती है, साथ ही इस बात की ओर भी ध्यान
आकर्षित करती है कि अब बुज़ुर्ग अपने बच्चों के जीवन में कोई खास स्थान नहीं रखते।
अपना जीवन स्वाह कर देने वाले इन जनकों को साथ रखने या उनके साथ रहने की भावना उनके बच्चों में अब क्षय होती जा रही है।बचपन में जिन माता – पिता के बिना रहने की कल्पना जो बच्चा नहीं कर सकता, उनकी कमी से असहाय महसूस करता है, उन्हीं माता – पिता की असहाय अवस्था में उन्हें मज़े से अकेला छोड़ कर चला जाता है। सुविधा हुई तो लौट कर देख लिया, नहीं फुर्सत मिली तो पड़े हैं अपने बुजुर्ग असहाय दूसरों के भरोसे।
इस अंक में ऐसे ही विषयों को विभिन्न कहानियों तथा लेखों, कविताओं, संस्मरणों के माध्यम से उजागर किया गया है।साथ ही इस अंक में एक उपेक्षित पीढ़ी को उचित स्थान देने का प्रयास गया है, वे इस समाज की नींव हैं, जिस पर सुदृढ़ बन हम खड़े हैं नई इमारतें बन कर। क्या हम इमारतों का कोई दायित्व नहीं अपनी नींवों के प्रति?

– मनीषा कुलश्रेष्ठ
 


वरिष्ठ नागरिक
इमारतों का दायित्व नीवों के प्रति – सम्पादकीय

अतीत से (कहानियां)
बूढ़ी काकी – प्रेमचन्द
खोल दो – सआदत हसन मन्टो

कहानी
आज़ादी – ममता कालिया
उल्का मनीषा कुलश्रेष्ठ
पाषाणपिण्ड विनीता अग्रवाल
ठिठुरता बचपनरोहिणी कुमार भादानी
हंगेरियन कहानी
भिखारीज़िगमोन्द मोरित्स – अनुवाद: इंदु मज़लदान

संस्मरण लेख
थके हुए पंख मनीषा कुलश्रेष्ठ

कविता
आयुजया जादवानी
ठूंठ सुधा कुलश्रेष्ठ
उम्र मनीषा कुलश्रेष्ठ

पुराने अंकों से
बाँधो न नाव इस ठाँव‚ बन्धु !उर्मिला शिरीष – कहानी
हिन्दी समाज पर मर्सियाफज़ल इमाम मल्लिक – संस्मरण
सात सौ मील दूर से एक पाती छोटी बहन कोसंजय कुमार गुप्त – कविता
पिता जया जादवानी – कविता
प्रेतकामनामनीषा कुलश्रेष्ठ – कहानी
त्रियाचरित्र अंकुश मौनी – कहानी
सूखे पत्तों का शोरजया जादवानी – कहानी
बड़ों की बानगीपूर्णिमा बर्मन – दृष्टिकोण
एक दीपावली पापा के बिना…अंशु – संस्मरण


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