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एक कविता के बनने की कहानी सा कुछ (टेसू राजा बीच बाजार)

टेसू राजा बीच बाजार, खड़े हुए ले रहे अनार।

इस अनार में कितने दाने ?
जितने हो कंबल में खाने।

कितने हैं कंबल में खाने ?
भेड़ भला क्‍यूं लगी बताने।
एक झूंड में भेड़ें कितनी ?
एक पेड़ पर पत्ती जितनी।

एक पेड़ पर कितने पत्ते?
जितने गोपी के घर लत्ते।

गोपी के घर लत्ते कितने ?
कलकत्ते में कुत्ते जितने।

बीस लाख तेईस हजार, दाने वाला एक अनार।
टेसू राजा कहें पुकार, लाओ मुझको दे दो चार।

(कविता राष्‍ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद द्वारा प्रकाशित रिमझिम कक्षा 2 से साभार)


टेसू राजा जब अड़ जाएं तो अच्छे अच्छो के नाक में दम कर दें, फिर उनके सामने किसी ऐरे गैरे की तो बिसात ही क्या । आपने अगर ''ब्लु अंब्रेला'' फिल्‍म देखी हो तो आपको याद होगा कि उसमें बच्चों की टोली के साथ टेसू गांव के हर घर व हर प्रमुख व्‍यक्ति के सामने अड़ जाता है और उनसे खाने के लिए दही बड़ा यानी कुछ न कुछ मांगता है। अब यह टेसू इतना जिद्दी है कि कुछ न कुछ लिए बगैर सामने से टलता नहीं, फिर भले ही उस फिल्‍म में वह गांव का सबसे कंजूस मक्‍खीचूस लाला खत्री ही क्‍यों न हो। आखिर उसकी मदद के लिए गांव के सबसे तेज तर्रार बच्चों की टोली जो होती है।
ऐसे ही टेसू राजा एक दिन बाजार किसी काम से गए और वहां एक ठेले पर सजे सुन्‍दर ताजे बड़े बड़े दाने वाले अनारों पर उनका दिल आ गया। सो उन्होंलने उन अनारों को लेने का मन बना लिया। अब टेसू राजा कोई आम इंसान होते तो अनार छांटते, उन्हें तुलवाते, भाव-ताव करते, फिर घर लाकर खुद खाते, घर वालों को खिलाते और मन होता तो पड़ोसियों को भी खिलाते और आखिर में उनींदे हो भरे पेट आराम से धूप सेंकते। लेकिन ऐसा हो जाता तो वो टेसू राजा ही क्‍यूं कहलाते।
सौ अनारों को लेने के ख्‍याल से ही खुश हो वे उन्हें निहारने लगे। ताजा अनारों को निहारते निहारते उनके दिमाग में एक सवाल कुलबुलाया कि इस अनार में दाने कितने होंगे? अब एक बार कोई सवाल खड़ा हो जाये तो उसे बिठाये बिना उन्हें चैन कहां और फिर टेसू राजा बिना अनार के दानों की संख्‍या जाने कैसे अनार खरीद लेते। क्याह पता जितने चाहिए दाने उससे कम निकले या कहीं दाने ज्‍यादा निकल पड़े तो। अगर दाने कम निकले तो नाक ही कट जायेगी ना और ज्‍यादा निकल गये तो उन बचे हुए दानों की सार संभाल कौन करेगा। सो अनार खरीदने से पहले किसी को भी पहले यह तो पता होना ही चाहिए कि आखिर उसमें दाने कितने हैं। इससे बिना कैसे कोई उन अनारों को खरीदने का निर्णय ले सकता है भला।
अब वैसे तो किसी अनार के दाने गिनने का सीधा साधा तरीका तो यह है कि उसे काटो, दाने निकालो और एक एक करके गिन लो लेकिन यह तरीका टेसू राजा को दो वजहों से नापसंद है। पहला, इससे उन्हेंछ उन तमाम मास्टलरों की याद आ जाती है जो उनसे स्‍कूल में दिनों में ही नहीं, महीनों तक रोज रोज गिनती बुलवाते और लिखवाते रहते थे, लेकिन गिनवाते कभी नहीं थे। फिर जांच करने के बहाने वे टेढ़े मेढ़े सवाल पूछते, जिन्हेंन वे कभी सिखाते नहीं थे। जैसे बताओ, 45 बड़ा होगा या 54। अब कोई उनसे पूछे कि भला क्याह फर्क पड़ता है कि बोर्ड या घटिया कागज से बनी वर्णमाला व गिनती की किताब से नकल मारते वक्तक पहले 4 या 5 में से 4 लिखो या 5 । लेकिन इस बात पर मास्‍टर साहब को बच्चोंह पर अपनी छड़ी और हाथ चलाने का मौका मिल जाता। मास्‍टर व स्‍कूल के इन कारनामों की वजह से ही उन्हेंन गिनती और गणित से चार तो क्यान चालीस कोस दूर रहने में ही अपनी भलाई नजर आती थी। और दूसरा, टेसू राजा को तो सीधी अंगूली से घी निकालना हो तब भी अंगूली टेढ़ी करने की आदत जो पड़ी हुई है। तो वे इस सीधे साधे बताये जाने वाले तरीके का बारे में सोचे ही क्‍यों। सो वे अपने सदियों पुराने पुरखे अरस्‍तू की तरह घोड़े के दांत गिनने के बजाय कल्पना और तर्क के घोड़े दौड़ाकर इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश में जुट जाते हैं। अब घोड़े तो घोड़े होते है, उन्हें टकाटक दौड़ने की धुन तो लगी ही रहती है। अब इससे क्या फर्क पड़ता है कि वे असली जिंदगी में दौड़ रहे है। या कल्पना में, सो एक बार दौड़ना शुरू करने के बाद वे आसानी से व जल्द रुकने का नाम नहीं लेते।
अब ताजादम अनारों को देखते ही टेसू राजा के मुंह में लार टपकने लगी होगी सो तुरंत उन्होंने दाने व खाने की तुक मिला दी। लेकिन खाने की तुक या याद आते ही उन्हें अपने घर पर रखा कंबल याद आ गया जिसमें इतने खाने थे कि टेसू राजा कई बार उन्हें गिनने की कोशिश कर करके हार चुके थे और वे खाने थे कि कभी ठीक से गिनने में ही नहीं आते थे। वैसे भी उन्हें इस बात में बड़ी मुश्किल होती थी कि एक ही शब्द के इतने सारे मतलब होते ही क्यों हैं। अब किस किस मतलब को याद रखा जाए और फिर यह कैसे पता किया जाए कि किस जगह पर किस मतलब की गोटी फिट बैठेगी। मास्टर जी तो शब्दों के मतलब बताकर व उनकी नकल करवा कर छुट्टी पा जाते, दिमाग पर बोझ तो उन्हें ही झेलना पड़ता न, लेकिन यहां तो खाने की वजह से उनका पीछा दानों को गिनने से छूट रहा होता है, सो वे अपने पहने सवाल का जवाब कुछ इस तरह गढ़ लेते हैं कि जितने हो कंबल में खाने।
लेकिन इतना सारा सोचते सोचते उनके दिमाग में तब्बक तब्बक करते घोड़ों की चाल और तेज हो जाती है और एक नया सवाल कुलबुलाने लगता है कि कितने हैं कंबल में खाने। अब जिस कंबल के खाने वे पहले ही कभी ठीक से नहीं गिन पाए तो अभी तो उन्हें गिनने के लिए घर जाने की जहमत उठाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। कंबल की याद आते ही टेसू राजा के दिमाग में रोएंदार कंबल की गर्माहट और उसका मुलायपना जाग जाता है और रोएंदार कंबल की गर्माहट के ख्याल से ही उन्हें बड़े बड़े रोएं वाली भेड़ याद आ जाती है। उन्हें लगता है कि आखिर कंबल भी बना तो किसी न किसी भेड़ की ऊन से ही होगा न, तो किसी भेड़ से ही क्यों न पूछ लिया जाए। अब भेड़ को क्याक पड़ी है कि वह यह बताए कि उसकी ऊन से बने कंबल में कितने खाने हैं। उसके बदन से उतरी ऊन से तो साल दर साल न जाने कितनी ही कंबलें बन चुकी होंगी और वो भी अलग अलग खानों से सजी डिजाइनों वाली। वह किस किस कंबल का हिसाब रखे और किस किस को बताती फिरे। सो टेसू राजा के हर सवाल के जवाब में वह ब्यां ब्यां करती रहती है। जिससे टेसू राजा को अपने सवाल का जवाब कुछ इस तरह बुन लेते हैं कि भेड़ भला क्यों लगी बताने।
अब भेड़ ऐसा जानवर है जो आमतौर पर अकेला नहीं झुंड में रहता है तो भेड़ की याद अकेली तो आती नहीं उसके साथ ही भेड़ों के झुंड का याद आना लाजमी हो जाता है। सो भेड़ों के झुंड टेसू राजा की आंखों के सामने खरामा खरामा टहलने लगते हैं। भेड़ों के झुंडों के आगे अब कंबल के खानों की क्या हैसियत । क्या तो कंबल और कितने उसके खाने। कंबल के खानों को गिनने की समस्या से निजात पाने के लिए टेसू राजा के दिमाग में नया सवाल पैदा हो जाता है कि एक झुंड में भेड़ें कितनी?
गिनने का भला इतना ही शौक होता तो शुरू में अनार के दाने ही न गिन लेते। सो टेसू राजा भेड़ों के झुंड में उनकी संख्या का पता लगाने का कोई जुगाड़ बिठाने की सोच ही रहे होते हैं कि भूख के मारे भेड़ों के झुंड पेड़ पौधों के पत्तों पर टूट पड़ते हैं। उनके तो पेट में दौड़ते चूहे पता नहीं कहां मर खप जाते हैं लेकिन भेड़ों की इस दावत के नजारे से टेसू राजा को अपने सवाल का जवाब मिल जाता है जिसमें तुक भी होती है और गिनने से बचने का बहाना भी, कि एक पेड़ के पत्ते कितने?
लेकिन टेसू राजा की कल्पना और तर्क के अनथक दौड़ते घाड़े अभी थके तो नहीं लेकिन अब वे एक मुश्किल में जरूर फंस चुके हैं। ये जो 'पत्ते' होता है ना, इसकी तुक मिलाना थोड़ा टेढ़ा काम होता है। इसे तो अकेले बोलना ही कोई कम टेढ़ा काम नहीं। कभी आपने कोशिश की है क्या? नहीं तो अभी करके देखिए तब न जानेंगे कि टेसू राजा को स्कूलों में किन किन मुश्किलों से दो चार होना पड़ता था। वहां मास्टर पीछे पड़े रहते थे कि 'सरक'को 'सड़क' बोलो या 'हेर' को 'सेर' बोलो। अरे उनके घर गांव में सब सदियों से यही बोलते आए थे। अब मास्टर और स्कूल के कह देने से थोड़े ही सरक, सड़क और हेर, शेर हो जाएगा।
ऐसी ही दिमाग को कचूमर निकाल देने वाली बातों को सोचते सोचते टेसू राजा को पेड़ के पत्ते से मिलती जुलती तुक की तलाश में अपने परिचित धोबी का घर याद आ जाता है जिसका नाम गोपी होता है। जिसके घर के अंदर बाहर ऊपर नीचे इधर उधर, हर तरफ पड़े कपड़ों के ढेरों को देखकर हमेशा ही टेसू राजा को इस बात पर अचरज होता रहा है कि एक तो यह गोपी धोबी इस बात को कैसे याद रख पाता है कि कौनसे कपड़े किसके यहां से आये हैं और कौनसे किसके यहां पर जाने हैं। दूसरा यह अपने घर में पड़े इन कपड़ों लत्तों को आखिर गिनता कैसे होगा। तो उन्हें गिनने से बचने का एक नायाब तरीका मिल जाता है कि वे पेड़ के पत्तों को गोपी धोबी के घर पड़े लत्तों के बराबर ठहरा दें यानी गोपी के घर लत्ते जितने, अब किसी किसी मुसीबत से पीछा छुड़ाने का सबसे आसान तरीका तो यही होता है न कि किसी दूसरी मुसीबत को अपने सर मढ़ लिया जाए और टेसू राजा तो उसमें उस्ताद हैं ही।
इतनी देर हो गई लेकिन अभी तक टेसू राजा को अनार के दानों की संख्या का पता नहीं चल पाया है। यहां पर तो ठीक से 'त्ते' को अकेले बोलना बड़ा ही मुश्किल काम है लेकिन लत्ते बोलने में मजा लेते लेते उन्हें जल्द ही कुत्तों की याद आ जाती है, जिसकी तुक भी लत्ते से ठीक से मिलती है और कुत्तों को याद करते ही उन्हें शहर कलकत्ता भी याद आ जाता है जिसके नाम के अंदर ही कुत्ता एक आध मात्रा हटाकर बैठा रहता है। शायद इसी वजह से कलकत्ते ने कुछ वक्त पहले अपना नाम ही बदलकर कोलकत्ता कर लिया है। खैर, बहुत कोशिश करने के बाद भी गिनती टली नहीं तो टेसू राजा ने सोचा कि क्यों न इससे पीछा छुड़ाने के लिए कलकत्ते के कुत्तों को ही गिन कर अनार के दानों की संख्या की समस्या को ही जड़ मूल से खत्म कर दिया जाए। अब जिनसे कंबल के खाने ही नहीं गिने जाते, वे जब कलकत्ते जैसे शहर के कुत्तों को गिनने का मंसूबा ठान लें तो आप अंजाम की कल्पना ही कर सकते हैं। ना ना कुत्तों की नहीं टेसू राजा के अंजाम की।
अब कलकत्ते के कुत्ते गिनना कोई आसान काम है क्या? पहले तो यह गिनों कि कलकत्ते में गलियां कितनी है? फिर हर गली में कुत्ते कितने हैं? और सभी गलियों में कुल मिलाकर कुत्ते कितने हैं? अब कुत्ते कोई इतने सीधे तो हैं नहीं कि वे हर गली में गिनती पूरी होने का इंतजार करते हुए चुपचाप अपनी अपनी गली में बैठे रहें, उनकी तो हर अनजान राहगीर या गाड़ी-घोड़ों के पीछे पड़ने की आदत जो ठहरी। अब यह कैसे पता करें कि फलां गली में से कितने कुत्ते तो पहले ही गिन लिए गए हैं। कितने पहली बार गिने जा रहे हैं और कितने अगली गली में खुद को दोबारा तिबारा... गिनवाने के लिए पहुंचने के लिए अपनी पूंछ ताने तैयार बैठे हैं। इस पूरे गड़बड़झाले की कल्पना से ही टेसू राजा का दिमाग फटने को होता है और वे अपना सिर कस के दबाने लगते हैं। इस फटने और दबाने की कश्मकश में उनके दिमाग की बत्ती रोशन हो उठती है और उसकी रोशनी में उन्हें 'बीस लाख तेईस हजार' नाम संख्या चमकती दिखाई पड़ जाती है, जिसकी तुक भी फट से बैठ जाती है।
अब इस संख्या को जांचने की जिम्मदारी उनकी नहीं है, आप चाहें तो यह काम बाखुशी कर सकते हैं। टेसू राजा तो बड़ी मुश्किल से गिनने से पीछा छुड़ाते छुड़ाते यहां तक आ पहुंचे हैं। लेकिन अगर आप इस संख्या की सच्चाई की जांच गिनकर करना ही चाहते हैं तो एक बार फिर से सोच लें क्योंकि जांच करने की कुछ मुश्किलों से जूझते टेसू राजा का हाल तो आप अब तक ऊपर देख ही चुके हैं। फिर उनका कहना यह भी है कि कलकत्ता के कुत्ते अड़ोस पड़ोस के शहरों में भी और वहां के कुत्ते कलकत्ता में अपने रिश्तेदारों के यहां आते जाते होंगे कि नहीं। तो यह एक संख्या है जिसे गिनकर सही या गलत साबित नहीं किया जा सकता। अब जब टेसू राजा ने बिना गिने अपनी कल्पना और तर्क के घोड़े दौड़ा दौड़ाकर इतनी मुश्किल से अनार के दानों की संख्या का पता लगा ही लिया है तो आप व हमें गिनने की भला जरूरत ही क्या है। हम और आप को इंतजार नहीं करना चाहिए कि वे आखिरकार अनार खरीदें और हम सभी को भी खिलाएं और ठेले वाला भी उनसे पीछा छुड़ाकर अपने बचे हुए अनारों के लिए दूसरे ग्राहकों की तलाश करे। ऐसे दो चार ग्राहक उसे और मिल जाए तो हो गया उसका दिन तमाम और बिक लिए उसके अनार।
आखिरकार, अनार के दानों की संख्या का पता लगते ही उनके गले से खुशी भरी पुकार फूट पड़ती है कि मुझे बीस लाख तेईस हजार दानों वाले चार अनार दे दो। अब आप ही बताइए टेसू राजा को गिनने का ही शौक होता तो यह कविता भला बनती ही कैसे। वैसे तो हमें यह भी नहीं पता कि अनार खरीदने के बाद उन्हें कभी यह संख्या दोबारा याद आई होगी भी या नही। अगर आपको भी बिना गिने गिनने का तरीका सीखना हो और उसके साथ साथ कविता का मजा लेना हो तो आप टेसू राजा के साथ गली गली घूमो फिरो, नहीं तो जाकर बैठे रहो किसी मेज कुर्सी में फंसकर और उतारते रहो बोर्ड से गिनती या वर्णमाला, हमारी बला से।

- रविकांत

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