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स्त्री शेखर की अभिव्यक्ति

दिन और रात कब पूरे होते हैं? कोई वासर इन्हे पूरा करता है या ये वासर को पूरा करते है।यह पूर्णता किसी एकल की नहीं है यह साझा प्रकृति ने किया ताकि मै मै हो सके तुम तुम हो सको ।इस पूर्णता के ताने बाने में हम पूरे भी है अधूरे भी है। इस शाश्रवता का परिहास उड़ाता पितृसत्ता वही व्यवस्था है जहां ना केवल पुरुष रहता है अपितु स्त्री और मनुष्य भी रहते है।शेखर एक जीवनी,नए शेखर की जीवनी और "अज्ञेय और मैं" की आलोचना में शेखर(पितृ वध) तीनों कृतियों में पुरुष ही दृष्टिगोचर होता है किन्तु यह शाब्दिक भाव मात्र है ये कृतियां अपनी संपूर्णता और गहनता में एक व्यक्ति विशेष की अंत दृष्टि है।एक संपूर्ण पेड़ तथा उसके पुष्प मात्र होने में जितना द्वैत होता है ठीक वैसे ही उक्त कृतियां भी मात्र शाब्दिक परिवेश में पुरुषमय है किन्तु व्यक्तिवाद की प्रखरता ही इनका मूल भाव है।जब मेरा इन तीन तरह के संवेगो से एकाकार हुआ जबकि तीनों एक ही भाव का विस्तारण और सम्प्रेषण है सो एक स्त्री शेखर की अभिव्यक्ति का आविर्भाव होना मौलिक और सहज जान पड़ा।एक सुगमता में रवमय प्रवाह संप्रेषित और उन्मेशित दोनों हुआ। एक पेड़ तथा उसके मात्र पुष्प में एक पेड़ की व्यक्तिगत निजता का अद्भुत समावेश हो एक स्त्री शेखर की अभिव्यक्ति आकारवान हो गई।

अपने जिए याकि जिए जा चुके को दोहराना एक आध्यात्मिक संस्पर्श की अदभुत प्रक्रिया है।यह अन्तर्द्वंद से इतर एक निज मंथन ही है जिसमे विष और अमृत दोनों ही उपार्जित होते है किंतु मै यू विस्मयविमुढ़ नहीं होती अगर ऎशा ही हुआ होता। कोतुक और विस्मय विष अमृत और उस तीसरे तत्व के कारणों से ही है जो है तो विष किन्तु उसका प्रभाव मुझ पर अमतृ सा हुआ। यह तीसरा तत्व अन्नतर बिना विराम मेरे साथ बना रहा,

क्या अब भी मुझे घेरे हुए है? शुरुवात पेड़ से होती है व्यक्ति से शुरू हो पहुंचती है पुष्प तक मेरे स्त्री होने पर केन्द्रित किन्तु यह अवसान नहीं है। मनुष्य बनने और बने रहने की अदम्य उत्कंठा में एक पुरातन बाह्य और भीतरी संघर्ष की आतुरता तीसरे अयाम में इस स्त्री शेखर को प्रविष्ट करती है। अपनी अभिव्यक्ति के प्रारंभ से पहले स्पष्टीकरण की उक्ति ना देते हुए अपने सहज बोधगम्य अनुभूति से मैं बड़ी ही स्पश्टता से यह कहना चाहती हूं ,स्त्री के साथ ही होता है यह मैं नहीं कहना चाहती हूं बस प्रतिशत: यह स्त्रियों के साथ आधिक्य में होता है यही मैं संप्रेषित करना चाहती हूं। हंडिया के हर एक चावल को मै यहां परोसना नहीं चाहती मै मात्र चावल का एक दाना प्रस्तुत करती हूं मर्मज्ञ जान ही जायेगे की चावल पका है या अब भी कसर बाकी है।

नैतिकता अनैतिकता, संस्कार कुसंस्कार, इज्ज़त और चरित्र के बीच की रेखाएं आपस में घुल मिल जाती है यह सत्य केवल पुरुष का क्यों होता है?मुझ जैसी मध्यम वर्गी शिक्षित और आत्मनिर्भर (थोथे गर्व से सिकत शिक्षा, रोमिले भ्रम सी आत्मनिर्भरता) के लिए यह अनदेखा याकि उन्नीदे स्वप्न सा ही है।मुझ जैसे के लिए कभी कोई रेखा धूमिल नहीं होती है उसे मिटा देने का ख्याल मेरे भीतर जन्नमता ही नहीं है।यह मेरी क्लिवता नहीं है। यहां मेरा क्षरण नहीं है। यह संपूर्ण और सारी मनुष्यता का क्षरण है।क्यों मै इन रेखाओं को मिटाने की इक्छा से रिक्त हूं क्या यह मेरा पलायन है मेरा स्त्रीवादी रुदन है।क्या मै उस आदिम स्त्री का विकृत और भिरू प्रतिरूप हूं। वहीं प्रतिरूप जो मात्र दोहराव से धूमिल और अस्पशट बस प्रतिरूप ही रह गया जो अपने मूल से हर प्रकार की महीनता में बिल्कुल ही पृथक है।यह दूसरी स्त्री उस आदिम स्त्री से विभक्त और विकृत दोनों ही है।
अज्ञेय के शब्द है "यहां मिट्टी भी नहीं जिसे काटा जा सके"
मै अज्ञेय की तरह शब्द और भाषा की ज्ञाता नहीं हू किन्तु यह भी सत्य है कि जीवन के जिस तल पर मै उतर चली आई वहां कुछ भी ऎशा नहीं जो मुझ से परे था।दूषित कीचड़ यहां भी है मिट्टी नहीं जिसे काटा जा सके किन्तु उन पर कमल स्वत: ही आ खिले हैं। पीड़ा का अनमोल ढूढ़ लेना ही जीवन है। यह सत्य है यही चिरनतक है यही मुक्त और मोक्षदा है।

"अभिमान से बड़ा दर्द है दर्द से भी बड़ा एक विश्वाहै" तो क्या विश्वाश ने ही उद्धृत किया अनमोल, विश्वाश ही कमाल बन प्रगट हुए।
वस्तुत मेरे स्वत हेतु अमृत विष से पृथक वो तीसरा तत्व है जिसे अब मै पीड़ा की संज्ञा दे सकती हूं। संज्ञा देना उस गहन बोध का परितोष मात्र है जो स्मृति में उल्टे कदम चलने के क्रम में दृष्टिगोचर हो प्रकाश की प्रतीति करता है।जब साहस चुकता है आगे कदम बढ़ाने को तो एक अस्थिरता और शिथिलता अनायश ही घेरे लेती है।जब आगे बढ़ना दुर्मेध था तो पीछे मुड़ कर देख लेना ज्यादा सहज और सरल हो गया।किसी गणितीय सूत्र को हल करने को बचपन का याद किया पहाड़ा पठना पड़ता है कुछ कुछ वैसे ही ठहर कर स्मृति में यात्रा कर पुनः आगे स्याह अंधकार में विवेकवान भय के साथ मै पुनः चलायमान हो गई।मै क्यों अब रेखाओं के धूमिल होने की कामना नहीं करती , क्यो इन्हे मिटा नहीं देना चाहती।अपनी बाल सुलभता में मैने ऎसा कुछ किया भी था,जिस तरह कटोरे में चांद के बिम्ब को देख बच्चा उसे चांद जान मुस्काता है वहीं मुस्कान मेरे चेहरे पर भी थोड़ी देर को उभरी थी। थोड़े ही समय अंतराल में मैने सर उठा उपर ताका था यथार्थ के पटल पर वहीं चांद था जो दिखता है रोज थोड़ा घटता या बढ़ता है उसकी टपकती चांदनी का भास भी होता है किन्तु फिर भी उसे स्पर्श नहीं किया जा सकता। कष्ट और अपमान सभी को झेलने होते है सो संताप पीड़ा ताप सी होती है पका देती है इस ताप ने ख्ट्टेपन का विलय मिठास में कर दिया। इस मिठास में एक गरिमा, अदम्य साहस और अटूट विश्वास है। मैने ही इन रेखाओं के धूमिल होने की कामना नहीं की, मैं इन्हे नहीं मिटाना चाहती क्योंकि मैंने स्वयं को इन सीमाओं से दूर याकि परे कर लिया है।मैंने नहीं रचा यह थोथा और संकीर्ण संसार जबकि मेरे पास मेरा एक निस्सिमआकाश है मेरा मौलिक संसार है।अवसाद अपने चरम पर फुटित हुआ तो एक अथक भाव जो क्रोध, ग्लानि,घृणा और खींझ का एक विश्लेषय घोल था उसी की उग्रता ने स्वयं के विकृत और कुरूप रूप का भास कराया इसलिए मैंने उस आदिम स्त्री को अपनी स्मृति में खोजा और पाया। समग्र प्रकृति में कोई स्त्री है कोई पुरुष है अपनी विशिष्टता में दोनों ही विशेष भी है तो उतने प्रांजल भी है।भेद जिसकी ओर से है उसे ही मिटाना होगा।मैने कोई भेद नहीं गढा,कोई रेखाएं नहीं खीची, मैने घृणा नहीं किया,जबकि मेरे पास भी प्रकृति प्रदत्त दर्प है जिसे हर कोई अपने अस्तित्व में ही पता है वह हर एक का अभिन्न अंग है।भेद जिसकी ओर से है उसे ही मिटाना होगा मै क्यों मिटाने का बीड़ा उठाऊ।मेरी प्रतिबद्धता केवल मात्र मेरे स्वयं के लिए है किसी पुरुष,किस समाज याकि किसी व्यवस्था के लिए नहीं है।मेरी स्वतंत्रता विवेक से सीक्त है मैं यह जानती ओर मानती हूं कि स्वतंत्रता की परिभाषा मै से नहीं अपितु मम और ममेतर दोनों से पूरी होती है।अज्ञेय के शब्द "दासता क्या है?अप्रिय तथ्य का ज्ञान नहीं, अस्त्य का ज्ञान भी नहीं, दासता है सत्य और असत्य की जिज्ञासा को शांत करने में असमर्थ होना,वह बंधन वह मनाही जिसके कारण हमारा ज्ञान मांगने का अधिकार छिन जाता है।"इस स्त्री शेखर ने दासता से मुक्ति पाई है अपने दम पर नहीं अपितु उस आदिम स्त्री से लेकर हर एक स्त्री के बल पर जिनमे से कुछ लड़ती रही कुछ मुक सहती रही कुछ दासता में ही काल को अर्पित हो गई।मैंने समानता का पढ़ सिखा है मेरी समानता का निकष दूसरों की समानता ही है।

"नए शेखर की जीवनी"में मैने एक पुरुष या कवि से ज्यादा एक निष्कासित व्यक्ति को वहां पाया।एक निष्कासित व्यक्ति होना कैसा होता है।टालस्टाय के उकेरे कैदी जो निर्वासित कर साइबेरिया भेज दिए जाते है। निर्वासित हो देश से निकला जाना एक ही बार का लंबा निष्कासन है जबकि जीवन अनगिनत छोटे बड़े निष्कासनों का योग है।

"नए शेखर की जीवनी का ख़तम होना,एक जीवन से मुक्त होना है" कितना स्पश्ट है नया शेखर भी पुराने को दोहराता है ताकि वह नया जीवन पा सके।नए शेखर की जीवनी वर्तमान और बीते वर्तमान की तारीखों पर पग धरता हुआ सफ़र तय करता है। यह जीवन स्मपुटो का पुंचित संकलन जिसमे कितने ही निष्कासनों का इतिहास दर्ज है। क्यों कहता है शेखर " लेकिन उन्हें कुछ याद नहीं आएगा और इस तरह शेखर सुनी आंखो के साथ अकेला होता जाएगा।क्यों वह सबकुछ विस्मृत ना कर सका। वह पुनः दोहराता है" बेघर का अंत एक दुस्वप्न है तो बेघर न होना एक स्वप्न। आकाश से कहीं अधिक निविड़ की उत्कंडा उसे भी है।

एक स्त्री शेखर के किए निष्कासित होना क्या है निष्कासित व्यक्ति होना कैसा होता है। निरंतर सूपे से फटकते हुए एक ढ़ेर जिसका मै हिस्सा हूं मेरी समझ मुताबिक सो उसी ढ़ेर से अलग कर एक अनुउपयोगी ढ़ेर में एक उछाल के साथ फेक दिया जाना। निष्कासन बाह्य और आंतरिक दोनों तरह का है।निष्कासन की पीड़ा भौतिक और स्थूल है तो उतनी ही गहरी और अतिंद्रिय । मेरे लिए जीवन के हर महत्वूर्ण पड़ाव पर एक और निष्कासन बाट जोहता रहा।यह ठीक वैसा ही था जैसे अपनी बसी बसाई भूमि से बिना वजह याकि वजह तैयार कर खदेड़ दिया जाना।इस निष्कासन में खदेड़े जाने में क्या सबकुछ समेटा जा सकता है सब बांध कर साथ ले जाया जा सकता है।क्या क्या नहीं पीछे छूटा रह गया अनात्म से आत्म तक में मेरा थोड़ा मै और मेरा होना भी छूटता रहा है।इस तरह टूटने बिखरने के बीच, बाधने समेटने के मध्य इस निष्कासन में मेरा जीवन चलायमान रहा है। मेरे लिए और बड़ा होना एक और बड़ा निष्कासन है। मनुष्य से निष्कासित हो स्त्री होना,असुंदर, अधम,मूर्ख,बाहरी इस प्रकार निष्कासनों की एक लंबी सूची है किन्तु सबसे महान निष्कासन मेरी आत्मा को निष्कासित कर मुझे केवल देह घोषित कर देना है।इस अनवरत अविराम निष्कासन श्रृंखला में हर निष्कासन के साथ एक चेहरा या भाव गुंधा रह गया है। मै जिसे भूलना नहीं चाहती और उन्हें याद भी नहीं करना चाहती हूं। स्मृति और विस्मृत का यह खेल भी रोचक है स्वयं को उलझाएं रखने को। मैं अंततः मनुष्य हूं अपने दोनो मै के साथ इसलिए निष्कासन मुझे सालता है।इतनी बार के निष्कासन के बाद मै जानती हूं पुनः निष्काषन ही होगा,मुझे फिर उजाड़ा जायेगा जब उनका मनोरथ उनकी कामना पूरी हो जाएगी।

"नदी का सुख जल नहीं यात्रा है और जल कभी लौटता नहीं यह उसके अस्तित्व का वैभव है" नए शेखर की जीवनी, नदी और जल की तारतम्यता मे उनकी निजी तटस्थता कितनी प्रगाढ़ होती है।

जीवन विस्तारित होता है यह विस्तीर्ण अपने को फैलाता हुआ एक रिक्त एक शून्य पैदा करता है जिसकी भरपाई गहनता से करनी पड़ती है।इसलिए मेरे स्वत: हेतु निष्कासित होना निघरा होना नहीं है।

मै स्त्री शेखर बारम्बार निष्कासन के बाद भी दूसरों को निष्कासित ना कर सकी।क्या मैंने स्वयं को प्रेम किया इसलिए मै दूसरों को प्रेम कर सकी।प्रेम अदम्य साहस, अनंत प्रतीक्षा और गौरवमयी आशा नहीं तो भला क्या है। मै स्त्री शेखर नदी नहीं हूं। मै मात्र चलती हूं। मै चलती हूं इसलिए मै जीवित हूं मै सुखी हूं।मेरा सुख मात्र चलने में निहित है।

"अज्ञेय और मै"के शेखर में स्त्री शेखर की अभिव्यक्ति की यात्रा अपने अन्तिम पड़ाव पर आ पहुंची है।यह अंत किन्तु एक नए आरंभ का उद् घोषक ही होगा क्योंकि हर कुछ के बाद भी मै स्वयं को जीवन के कर्षण से मुक्त नहीं कर सकती।"अज्ञेय और मै" "पगलाए प्रेम के लम्हे मे नवजात प्रेमी हर लड़की मे अपनी प्रेमिका तलाशता है उसी तरह यह नवजात कथाकार हर कथा में अपने किरदार खोजता है।उस किताब से भागते उचटते हुए गुजर जाता है जहां उसका आख्यान अपनी परछाई नहीं देख पाता है।"

किन्तु क्या हर प्रेम अपनी नियति या भाग्य के साथ जन्म नहीं लेता,वह नियति जो प्रेमियों की नियति से एतर होती है यदि नहीं तो क्यों अधूरी प्रेम कहानियां पूर्णत पूर्ण होती है जबकि पूरी हो चुकी प्रेम कहानियों से प्रेम वाष्प बन उड़ जाता है।
"वह नहीं कहेगा अबकी बार लौटूंगा तो वृहत्तर हो लौटूंगा।वह आरंभ से ही खुद को वृहत्तर माने बैठा है।"
लेखक की आलोचना से मै किसी सीमा तक खुद को सहमत पाती हूं।शेखर एक जीवनी की भूमिका ने मेरे सामने एक एब्सर्ड पैदा कर दिया था।एक ऎसा एब्सर्ड जो मेरे द्वारा ना तो नकारा जा सकता था नहीं ही स्वीकारा जा सकता था। इसका कारण यह विचित्र अंतर्विरोध है।अज्ञेय पहले लिखते है "आत्मघटित ही आत्मनुभूति नहीं होती इसलिए मुझे मानना पड़ेगा कि इलियट के कथानुसार मै बहुत बड़ा आर्टिस्ट हो सकता हूं" और पुनः वे लिखते है …..
" तथापि मेरी अनुभूति और मेरी वेदना शेखर को अभिसिंचित कर रही है।शेखर मे मेरापन कुछ अधिक है इलियट का आदर्श मुझसे निभ नहीं सका है।"
अज्ञेय अपनी आलोचना से अनभिज्ञ नहीं थे शेखर एक जीवनी के तीसरे खंड की घोषणा करके भी प्रकाशित नहीं करा। मै स्वयं भी शेखर एक जीवनी पढ़ते हुए कितनी ही बार को अटक जाती थी कुछ खटकता भी रहता था। मूलतः मै भी अज्ञेय,शेखर और जीवनी में तारतम्य की खोज कर रही थी।शेखर एक जीवनी मे आत्म श्रुति और आत्म मुग्धता अपने एक्स्ट्रीम याकि चरम पर है।

अंतस मे यह आत्म मुग्धता सभी के भीतर होती है यह वही अहंता है जिसके साथ हम जन्मते है। "अज्ञेय और मै" को पढ पुनः मुझे लेखक की आलोचना मे भी आत्म श्रुति का भास होता है जब वे अज्ञेय को सिरे से नकारते है और प्रश्न करते है "क्या अज्ञेय दर्शन और गल्प के संभोग को अपनी कथा मे साथ नहीं पाते।"
मै स्वत यह स्वीकारती हूं कि शेखर एक जीवनी व्यथित करती है इसलिए अस्वीकृति की मुखरता को शब्द भी मिलते है किन्तु यह भी वैचित्र्य है कि आखिरकार शेखर से नफरत नहीं होती है। अज्ञेय का दर्शन ग्लप पर भारी पड़ता है।इस विराट मे सारे मदभेद आपे तिरोहित हो जाते है।

पुनः स्त्री शेखर की अभिव्यक्ति पर लौटती हूं, मै स्वयं अपने स्त्रीत्व की आत्म श्रुति और मुग्धता में मै खुद को और स्वछंद तथा उन्मुक्त पाती हूं। जो पलायन जान पड़ता है वह मेरे लिए लड़ने योग्य नहीं है।स्व अस्मिता हेतु अहंकार भी उर्वरक का काम करता है एक खेल भावना जो बेहतर प्रदर्शन को प्रेरित करती है।प्रेमी हर जगह अपनी प्रेमिका को तलाशता है लेखक ठीक वैसे ही कथा को देख लेता है किन्तु दांते जैसा कवि अपनी प्रेमिका जिसे वो एकतरफा प्रेम करता है कि याद मे"डिवाइन कॉमेडी" रचता है तो वह प्रेम करता नहीं प्रेम ही हो जाता है। जब मै स्त्री शेखर की अभिव्यक्ति कलमबद्ध कर रही हूं तो मै स्वयं ही इसमें आत्म श्रुति का पुट पाती हूं।

कृतित्व और कृतिकार के बीच यह मुग्धता आसक्ति उसके ईमानदार बने रहने के संघर्ष की भूमि तैयार करती है। अपनी इस अभिव्यक्ति मै एकल नहीं अपितु यह आदिम स्त्री से लेकर मुझ तक की हर स्त्री का संकलित सम्प्रेषण ही तो है ना केवल स्त्री बल्कि पुरुष और वो मनुष्य जो स्त्री या पुरुष नहीं होते सब का स्वर सम्मिलित है।सब अपनी भूमिका मे कीचड़,क्षरण,उर्वरक,पतझड़,और बसंत का एक विशाल वलय है तो इस वलय की धुरी मै हूं। मैंने स्वयं अपना दर्शन पाया है। मै किसी वायवीयता का उल्लेख नहीं कर रही हूं शब्दों मे यदि कल्पित का आभास होता है तो आग्रह करती हूं कि अपने चश्मों को जरा साफ कर देखे,चश्मे को उतारना मेरे लिए भी उतना ही दुरूह है सो मात्र साफ करने का आग्रह करती हूं। मै वही हूं जो इस व्यवस्था मे सुबह से दोपहर,दोपहर से शाम,शाम से रात करती हूं।संसार का कोई देश हो किसी भी स्तर का जीवन हो यदि कोई मनुष्य बने रहना चाहता है तो उसे भी मेरी तरह इस सार्वभौमिक संघर्ष और यातना से गुजरते रहना पड़ेगा।मेरा भीतरी संसार बहुत इतर है बाह्य संसार से किन्तु यह अवांछनीय बाह्य दिक मेरे मनस्तत्व को आवेष्ठित करता है इसलिए किसी हाल मे इसका उत्सरग नहीं किया जा सकता है। अवांछनीय इसलिए की यह सदा प्रतिकूल ही रहता है तो मुझे अपनी अनुकूलता जीने की सहजता अपने भीतरी एकांत से मिलती है।स्त्री के कृत को पितृस्तातमक्ता ने संकीर्ण रख छोड़ा है उसका आकलन उसकी आलोचना सब कुछ स्त्रीवादीता पर ही शुरू होता है और वही खत्म भी हो जाता है। इन्हे स्त्री सदा लामबन्द ही नजर आती है।जो स्त्री और पुरुष के मध्य सहभागिता होनी चाहिए जिस तरह प्रकृति मे हर दो के बीच होती है वो इनके मध्य में ना हो इनके भीतर होती है जहां यह एक दूसरे पर प्रभाव मात्र डालते है। यह प्रभाव अद्वैत बना सकने मे अक्षम ही रहेगा और यह मूलत: दोनों ओर से है कहीं थोड़ा ज्यादा है तो कहीं थोड़ा कम।

मै अपनी अभव्यक्ति में जीवन को संबोधित करती हूं किसी सुंदर चित्र सा तुम्हारा चेहरा है जहां तरह तरह के रंगो की परते अपने गहरे हल्के शैड मै चमकीले हो जाते है।यह चित्र मैंने नहीं बनाया, रंग, आकृतियां मेरी नहीं थी,था तो मेरा केवल चित्रफलक।मैंने स्याह को स्याह ना रहने दिया और ना सफेद को सफेद इसलिए यह घुलमिल गए ।मेरी यह मुक्ति वैयक्तिक ना रह सकी क्योंकि यह मुझ तक सीमित नहीं है।मैंने मुक्ति देना भी सीख लिया है।
"But by midnight he fought and this time he knew that the fight was useless."The old man and sea, Hemingway Ernest.
मै नदी नहीं हूं मै चलती हूं इसलिए जीवित हूं।
 


-अर्चना शर्मा

 

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