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संसार का पहला प्रेमविवाह

ह कोई नयी खोज नहीं कि संसार का पहला प्रेमविवाह भारत में हुआ। यह विवाह हुआ हिमवान् के राजनगर ओषधिप्रस्थ में, पार्वती का शिव के साथ। हिमवान् तो चाहते थे, पार्वती का विवाह विष्णु से हो।बात आगे भी बढ गई थी, किन्तु पार्वती नहीं चाहती थी। वह अपनी सखियों के साथ चुपचाप भाग निकलने में सफल हुई।

पार्वती संसार की पहली किशोरी है,जिसने कठोर संयम का व्रत धारण करने वाले ऐसे ब्रह्मचारी से प्रेम करने का दु:साहस कर डाला,जो स्वभाव और प्रकृति से न केवल असाधारण है, अपितु वह प्रेम की भाषा भी नहीं जानता।

शिव केवल तपस्या की भाषा जानते हैं, इसलिये पार्वती शिव के प्रति अपने प्रेम को तपस्या में बदल लेती है। वह कभी धुआँ पीकर, कभी सूखे पत्ते खाकर, कभी बिलकुल निराहार तपस्या करती है। यह एकतरफा प्रेम है, जिसके बारे में शिव कुछ नहीं जानते। वे जानना भी नहीं चाहते, क्योंकि वे संन्यासी हैं, योगी हैं, काम का दहन कर चुके हैं,और अखंड ध्यान की उस अवस्था में हैं,जहाँ कोई विचार,कोई क्रिया, कोई रूप प्रवेश कर ही नहीं सकता।

किन्तु प्रेम की तपस्या का बल कितना अद्भुत, अपराजेय कि पार्वती वहाँ प्रवेश कर जाती है। योगीराज शिव की समाधि में इतनी बड़ी सेंध। ध्यान भंग हुआ। तापसी कन्या के पवित्र सौन्दर्य पर शिव मुग्ध हो उठे। पार्वती के प्रणय-निवेदन के आगे प्रलयंकारी शिव लाचार और बेबस।

पार्वती की तपस्या के आगे खरीदे हुए दास बनकर खड़े हैं शिव। विवाह की बात को लेकर मौन,एक-दूसरे की आँखों के महासमुद्र में डूबते-उतराते जाने कहाँ अदृश्य। पार्वती त्रिलोकसुंदरी, ऊँचे कुल में पली-बढी रमणी राजकन्या और उधर चिताभस्म रमाये हुए बूढे बैल पर घूमते-फिरते बैरागी शिव। इधर शुभ और सौभाग्य के आभरणों से अलंकृत पार्वती। उधर सर्प,नरमुंड, रक्तरंजित गजचर्म से लदे हुए शिव। इधर लास्य,उधर ताण्डव। इधर मंदिर की मंगल- ध्वनि, उधर श्मशान में गूँजता हाहाकार।

मंगल और अमंगल, कोमलता और कठोरता,जीवन और मृत्यु, राग और विराग, रति और निर्वेद का यह अनूठा सामञ्जस्य ही सच्चा प्रेम है। इसीलिये तो देखने वालों को इधर श्रद्धा दिखाई देती है,उधर विश्वास के अतिरिक्त कुछ नहीं। यदि सच्ची पुकार हो,सच्चा समर्पण हो,तो एक न एक दिन प्रेम पाषाण को भी जलधारा बनने के लिये विवश कर देता है।

शिव जैसा साधु पार्वती जैसी सुकुमारी के प्रेमपाश में पड़ चुका हो,तो प्रेम की महिमा बढ जाती है। फिर जगत मिथ्या नहीं लगता। निबिड़ अंधकार में भी जीवन का पुण्य स्वर्ग की सीढियाँ चढने लगता है। आत्मसिद्धि के बाद समाधि से उठ बैठे शिव ने जिस तपस्या से तीनों लोकों को साध लिया,उसी तपस्या से पार्वती ने शिव को साधा। शिव तपस्या के सौन्दर्य पर रीझ उठे। यह सौन्दर्य निश्छल था, निष्कपट था, इसीलिये अलौकिक था।

शिव के विराट स्वरूप में डूबकर पार्वती ने संसार की नींव रखी। प्रेम, तपस्या के प्रतिफल के रूप में चरितार्थ हुआ। श्मशान का वैराग्य प्रेम के सुंदर कानन में पहुँचकर वसंत का उत्सव बन गया। कैलास-पर्वत की बर्फ पिघलकर नये जीवन में ढल गई। शिव और पार्वती की जोड़ी संसार की सबसे बेमेल जोड़ी कही जा सकती है, किन्तु यही जोड़ी प्रेम और समर्पण की बेजोड़ उदाहरण बन गई।

अंततः ओषधिप्रस्थ में दोनों का विवाह हुआ। विधिपूर्वक सब लोकाचार भी हुए। वैराग्य का शृंगार होते पहली बार देखा गया। हिमवान् और मैनाक ने कन्यादान किया। तैंतीस करोड़ देवता इस विलक्षण विवाह के साक्षी बने ।हिमालय की बेटी बिदा हुई।

सुरभित अलंकारों से सजी हुई गौरी और प्रेम के कुतूहल से भरे हुए शिव रोमांच की तरंगों को उछालते हुए गंधमादन पर्वत पर पहुँचे और रमणीय एकान्त में कहीं खो गये।

- मुरलीधर चाँदनीवाला

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