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हम डरते क्यों हैं

डर अथवा भय एसी चीज़ है जिसके लाभ तो अवश्य हैं पर हानि भी कम नहीं हैं। यदि मनुष्य के मन में भय न हो तो वह आग में हाथ डाल कर अपने को जला लेता। शाथ ही
वह बुरा से बुरा काम करने में भी नहीं हिचकिचाता। पर अक्सर हम देखते हैं कि इसी डर के कारण बहुत से लोग ठीक काम भी नहीं कर पाते। उन्हें सदा यही डर लगा रहता है कि कोई उनके काम को बुरा न कह दे। षदि देखा जाए तो हर काम के बारे में हमेशा दो राय रहती हैं। कुछ लोग उसे ठीक समझते हैं और कुछ गलत। फिर गलत और सही का फैसला कैसे हो? रूढ़िवादी लोग अपने पुरूखों की बनाई परिपाटी पर ही चलने को कहते हैं। पर यदि वैसा किया जए तो कभी प्रगति हो ही नहीं सकती। कहा भी गया है कि
“लीक लीक गाड़ी चलें लीकहिं चलों कपूत।
बिना लीक ये तीन चलें शायर सिंह सपूत।।”

तो सपूत अपने आप ही राह बनाता है और प्रगति करता है। तब फिर ठीक और गलत का फैसला कैसे हो? यह तो हर एक को अपने मन से ही पूछना पड़ेगा। तभी तो किसी ने कहा है कि

मन साफ तेरा है या नहीं तू पूछ ले जी से।
फिर जो कुछ भी करना है कर वह खुशी से।।

अधिकतर लोग किसी न किसी से डरते ही रहते हैं। कुछ मृत्यु तथा बीमारियों से डरते हैं तो कुछ लोग उन लोगों को देख कर जिन पर मुसीबत आई हुई हो डरने लगते हैं कि कहीं वैसी ही मुसीबत उन्हें न घेर ले। यहां हमे यह सोचना चाहिये कि कुछ भी तो हमारे हाथ मे नहीं है। हर मनुष्य यही चाहता है कि वह बिना किसी कठिनाई के सुरक्षित तथा सुखद जीवन जिये। पर उसे यह नहीं मालुम कि भविष्य मे उसके भाग्य में क्या लिखा हुआ है। जब भूचाल आते हैं या अन्य प्रकार की प्राकृतिक आपदाएं आती हैं तो हम देखते हैं कि कुछ लोग तो चमक्कारिक रूप से बच जाते हैं और कुछ उसमे नष्ट हो जाते हैं। हमे आश्चर्य होता है कि कैसे कुछ बच्चे उस मलबे मे से कई दिन बाद भी जीवित निकल आते हैं? इतने दिनों तक किस प्रकार वे बिना खाने या पानी के ज़िन्दा रहे? उन्हें बचाने वाली कौन सी शक्ति थी? यदि हम सोच लें कि बही शक्ति हमारे साथ भी है तब हमे क्यों डरना चाहिये?

यहां मैं एक किस्सा सुनाना चाहूंगा।एक बार एक आदमी ने एक यमदूत को जाते हुए देखा और उससे पूछा कि वह कहां जा रहा है? यमदूत ने उत्तर दिया कि वह बनारस से सौ आदमियों की जान लेने जा रहा है। पर देखा गया किा बनारस में एक हाज़ार लोगों की मृत्यु हो गई। यमदूत जब लौट रहा था तो वह आदमी उसे फिर मिल गया और उसने पूछा कि वह तो केवल सौ आदमियों की जान लेने गया था तो फिर वहां एक हज़ार लोग कैसे मर गये? इस पर यमदूत बोला कि उसने तो सौ ही जानें ली थीं। बाकी और तो डर के मारे मर गये।
इसी प्रकार का एक और किस्सा मैंने पढ़ा था कि एक बार पहाड़ों मे कुछ लोग एक धर्मशाला में ठहरे हुए थे। उस रात वहां एक बड़ा भयानक तूफान आया। बड़े ज़ोर की आंधी थी और सारे पेड़ ऐसे हिल रहे थे मानो वे जड़ से उखड़ कर उड़ जाएंगे। ज़ोर ज़ोर से ब्जिली गद.गड़ा रही थी। एकदम प्रलय का दृष्य था। सब लोग बुरी तरह सहमे हुए थे और हर तरह के विचार उनके मन मे आ रहे थे। उन्हें यह भी पता नही था कि वह अगले दिन की सुबह देख भी पाएंगे या यही तूफानी रात्रि उनकी अंतिम रात होगी। इसी प्रकार के विचारों मे उनमे से एक ने देखा कि गिनती मे वे लोग तेरह हैं। अरे तेरह की संख्या तो बहुत ही अशुभ मानी जाती है। अवश्य हम लोगों मे से एक जना पापी है। उस एक के कारण हम सब क्यों मरें?

बात भी ठीक थी। इस कारण सब की समझ मे आ गई। पर यह कैसे पता चले कि वह पापी कौन है? वैसे तो सबन हीे छोटे मोटे पाप तो किये थे पर काई भी यह नहीं समझता था कि ऐसा फल उसके पाप के कारण हो सकता है। इस भयावनी रात में मरने वाला तो कोई बहुत ही बड़ा पापी होगा।उस धर्मशाला के पास एक बहुत लम्बा और ऊंचा पेड़ था और बिजली सब से पहले ऊंचे पेडों पर ही गिरती है। अतः उन लोगों ने सलाह कर के यह तय किया कि सब लोग एक एक करके उस पेड़ के नीचे नियत समय के लिये खड़े हों। जिसको मरना होगा वही मरेगा। उस एक के लिये हम सब क्यों मरें? पर सब से पहले कौन जाए? हर काई डरा हुआ था कि कहीं उसी के पाप के कारण तो यह सब नहीं हो रहा है। अंत में तय हुआ कि तेरह पर्चियें बनाई जाएं। हर आदमी उनमे से एक उठा ले और फिर अपने अपने नम्बर से जा कर खड़े हों।

यह तय हो जाने पर सब अपने अपने नम्बर से जाने लगे और बारह लोग बिना किसी दुर्घटना के वपिस आ गये। वे बड़े खाुश थे कि उनके पाप के कारण यह सब नहीं हो रहा था। अब तेरहवें आदमी का नम्बर आ गया और सब लोगों को पूरा विश्वास था कि यही वह पापी है जिसके कारण उन सब की जानें खतरे मे थीं।और वह भी बेहद डरा हुआ था कि उसका ही अम्त समय आ गया है। जैसे ही वह वहां जाकर खड़ा हुआ बड़े ज़ोर की बिजली कड़की और उसी समय धर्मशाला की छत भरभरा कर गिर पड़ी। उसके नीचे के सब आदमी उसमे दब कर मर गये। तो क्या वे सब पापी थे? यही सब देख कर तो लगता है कि मारने और बचाने वाली शक्ति कोई दूसरी ही है जो हम सब की देख भाल करती है। मनुष्य तो उस शक्ति के हाथ में कठपुतली मात्र ही है। यदि हमें इस पर पक्का विश्वास हो जाये तो हमारे सारे डर और चिंताएं दूर हो जाएंगी।

इसी प्रकार का एक और किस्सा शाह सुलेमान के समय का मैंने पढ़ा था। बहुत दिनो की बात है एक बार एक आदमी ईरान मे घूमता हुआ चला जा रहा था। उसने देखा कि यमदूत उसका पीछा कर रहा है। उसे देखते ही उस आदमी के तो होश उड़ गये। उसने सोचा कि वह यमदूत उसे पकड़ने के लिय हीे आ रहा है। उससे बचने के लिये वह तेज़ी से भागा और बादशाह के दरबार में पहुंच गया। वहां उसने बादशाह से प्रार्थना की “जहांपनाह आज यमदूत मेरे पीछे पड़ा हुआ है। यदि आपकी मेहरबानी हो जाए तो आप अपने हवाई तख्त पर मुझे हिन्दुदतान पहुंचा दीजिये जिससे मैं बच जाऊं।” बादशाह ने उसकी बात मान ली और उसे हिन्दुस्तान पहुंचवा दिया गया।

उधर यमदूत शाम को बादशाह के दरबार में पहुंचा तो बादशाह ने उससे पूछा कि क्यों वह उस आदमी के पीछे पड़ा था? क्या उसका आखिरी समय आ गया था? यमदूत ने जवाब दिया कि “मैं उसके पीछे तो नहीं पड़ा था। मैं बड़ा हैरान था कि अल्लाह ताला ने तो उसकी जान हिन्दुस्तान से लाने का हुक्म दिया था और वह यहां ईरान मे घूम रहा है। कैसे मैं उसे हिन्दुस्तान से ला सकूंगा? पर उससे ज़्यादा हैरानी तो मुझे तब हुई जब मैंने देखा कि मेरे हिन्दुस्तान पहुंचने पर वह मुझे वहां भी मिल गया।”

भगवान की माया ही अजब है। तभी तो तुलसीदास ने कहा है —

तुलसी जस भवतव्यता तैसी मिले सहाय।
आप न आवे ताहि पै ताहि तहां ले जाय।।

और तुलसीदास ने यह भी कहा है —

हानि लाभ जीवन मरन यश अपयश सब विधि हाथ।

हमे यह पता लगाना है कि हमारे मन में डर कहां से पैदा होता है? और उसको जड़ से उखाड़ने के लिये क्या किया जाना चाहिये? मेरे विचार से कुछ तो हम अपने पूर्व जन्मों से लेकर आते हैं और वह हमारे साथ जन्म से ही जुड़े रहते हैं। उसके बाद जब बच्चा मां के पेट में होता है तो माता के विचार भी उस पर असर डालते हैं। पैदा होने के बाद उस पर माता और पिता दोनो का असर पड़ता है। फिर जिस वातावरण में उसे पाला जाता है वह प्रभाव डालते हैं। जब वह बराबर यह सुनता रहता है कि यह मत करो वह मत करा तो वह उनसे बचने की कोशिश करता है। वैसे तो यह सलाह उसके भले के लिये ही दी जती हे जिससे वह अपना बचाव कर सके पर कभी कभी वह उसे भीरू भी बना देती है जिसके काफी दुश्परिणाम भी हो सकते हैं।

यहां मैं कुछ अपने अनुभव सुनाना चाहूंगा कि मुझ में किस प्रकार मेरी मां ने हिम्मत शूरता तथा वीरता के भाव कूट कूट कर भर दिये थे और यह उसी का नतीजा है कि मुझे बहुत कम डर लगता है। यदि मुझे चोट लग जाती और मैं रोने ल्गता तब वे सहानुभूति दिखलाने के बजाय कहतीं “बस इतने पर ही रोने लगे। राणा सांगा के तो एक सौ अस्सी घाव थे और वह फिर भी न्हीं रोए।” फिर मेरे चुप हो जाने पर मेरा उपचार करती और राणा सांगा तथा भारत के इतिहास के अन्य वीरों की कहानियां सुनातीं। मैं उन्हे बड़े चाव से सुनता था और मेरा दर्द पता नहीं कहां भाग जाता था। उनकी सुनाई कहस्नियें मेरे मन मे सदा के लिये अंकित हो गईं। आज भी वे मुझे हर विपत्ति का बहादुरी से सामना ज्रने के लिये प्रेरित करती हैं। मैं समझता हूं कि हर माता पिता को यह आदर्श ध्यान में रखना चाहिये। बच्चों को डराने के बजाए वे उन्हें सतर्क रहना तो सिखाएं पर डरना नहीं। अपने सतर्क रहने पर भी दुर्घटनाएं हो सकती हैं जिनका उन्हें बहादुरी से सामना करना है।

मेरी मां की ईश्वर में आस्था भी मेरे अंदर पूरी तरह समाई हुई है। मुझे बच्चों के द्वारा मंदिर मे की गई प्रार्थना बहुत अच्छी लगी थी और वह बराबर मेरे मन में गूंजती रहती है —

सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे हाथों मे
है जीत तुम्हारे हाथों मे अरू हार तुम्हारे हाथो में
मुझ मे तुम में भेद यही है मैं नर हूं तुम नारायण हो
मैं हूं संसार के हाथों में संसार तुम्हारे हाथो में
सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे हाथों में


आर्य भूषण
 


जिम्मेदारी
हम डरते क्यों हैं
छोटी छोटी बातें

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