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पर्यावरण संरक्षण का उल्लेखनीय प्रयास

 

 

 उत्तराखंड  (विमेन्स फीचर सर्विस) : पैंतालिस वर्षीय ज्योत्स्ना सिटलिंग ने दुनिया में अपने सौंदर्य के लिए विख्यात उत्तराखंड के

पर्यावरण संरक्षण के लिए जो उल्लेखनीय प्रयास किए हैं, उनका आकलन किसी पुरस्कार से नहीं किया जाना चाहिए। ऐसा इसलिए, क्योंकि  कभी-कभी किसी शख्स का कृतित्व उसे पुरस्कृत किए जाने वाले पुरस्कार से भी अधिक महत्व रखता है। यह ज्योत्सना की पहल का ही नतीजा है कि उत्ताराखंड में चमोली स्थित वैली ऑफ फ्लावर्स, नेशनल पार्क को वर्ल्ड हेरिटेज साइट (विश्व विरासत स्थल) में शुमार किया जा चुका है। इसके अलावा उन्होंने 'नंदा देवी बॉयोस्फीयर रिजर्व' के संरक्षण के लिए सराहनीय कार्य किया है। यही नहीं सन् 1939 के बाद से पर्वतरोहियों और सैलानियों ने इस हिमालयी क्षेत्र में इस्तेमाल करने के बाद बेकार हो चुके जिन पदार्थों को फेंका था, वह जहाँ-तहाँ कूड़े के ढेरों में तब्दील हो चुका था। इस गंदगी ने जहां स्थानीय पर्यावरण को प्रदूषित करना शुरू कर दिया, वहीं इसने इस क्षेत्र के प्राकृतिक सौंदर्य

 को दागदार भी बनाना शुरू कर दिया।

      

ज्योत्सना की उपलब्धियों के मद्देनजर भारत सरकार ने उन्हें इस साल के प्रतिश्ठित इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार से सम्मानित किया है। गौरतलब है कि पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में यह देश का सबसे बड़ा पुरस्कार माना जाता है। ज्योत्स्ना भारतीय वन सेवा (इंडियन फॉरेस्ट सर्विस) की पश्चिम बंगाल कैडर (1987 बैच) की अधिकारी हैं। उत्ताराखंड आने से पूर्व वह कलिम्पोंग में नियुक्त थीं। ज्योत्सना के अनुसार वह बचपन से ही प्रकृति-प्रेमी रही हैं। यही वजह है कि मैंने भारतीय वन सेवा का चयन किया। पर्वत, झरने और खूबसूरत वादियां मुझे शुरू से ही आकर्षित करती रही हैं। वकौल ज्योत्सना, सन् 2001 में मैं नंदा देवी नेशनल पार्क की निदेशक बनकर उत्तराखंड आयी। 

ज्योत्सना के अनुसार नंदा देवी पार्क का प्रभार संभालने के बाद मुझे कुछ बातें नागवार लगीं, क्योंकि इन्हीं के चलते यह नेशनल पार्क पर्यावरण संबंधी संकट में फंस चुका था। पार्क में और इसके इर्द-गिर्द प्लास्टिक और पर्यावरण के लिए नुकसानदेह कूड़े का ढेर लग चुका था। असल में गंदगी के इस ढेर का एकमात्र कारण वे तीर्थयात्री गण थो, जो बीते तीन दशकों से यहाँ स्थित एक धार्मिक स्थल में जाया करते थे। र्प्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले उपर्युक्त कारकों को दूर करना जरूरी था। कारण, नंदा देवी बॉयोस्फीयर रिजर्व के निकट विलक्षण फूलों की घाटी का 19 किमी का बफर जोन स्थित है। नंदा देवी बॉयोस्फीयर रिर्जव का यह ट्रैक रूट गोविंदघाट से हेमकुंड साहब तक फैला है। इसी रूट से होकर प्रतिवर्श लाखों तीर्थ यात्री गुजरते हैं। मुझे यह कहते हुए दुख हो रहा है कि इन तीर्थयात्रियों का व्यवहार र्प्यावरण के प्रति मैत्रीपूर्ण नहीं रहा है। तभी तो इस खूबसूरत क्षेत्र के आसपास कई टन कूड़ा एकत्र हो चुका था, जो यहां के सौंदर्यमय माहौल को बंदरंग

कर रहा था। यह कूड़ा प्लास्टिक बैग्स, बोतलों, रेन कोट्स, विभिन्न तरह के पैकेटों और नॉन डिग्रेडेबल वेस्ट मैटीरियल के रूप् में था। 

 

ज्योत्सना के अनुसार मुझे अन्दर से यह प्रेरणा मिली कि इस खूबसूरत क्षेत्र को बदरंग करने के प्रयासों पर अब विराम लगना चाहिए और कुछ ऐसा किया जाना चाहिए ताकि इस क्षेत्र में पसरी गंदगी दूर हो सके। मैं इन सब बातों पर चिंतन-मनन कर रही थी। इसी दौरान मुझे अंतर्मन से यह प्रेरणा मिली कि पर्यावरण संरक्षण और इस क्षेत्र में व्याप्त गंदगी को दूर करने के प्रयासों में स्थानीय लोगों को भी साझीदार बनाना चाहिए। हालांकि मेरे दिमाग में यह तर्क उठ रहे थे कि इस तरह के श्रमसाध्य व नानग्लैमरस कार्य में षामिल होने के लिए लोगों को प्रेरित करना भी एक समस्या है। फिर भी हमने इन चिंताओं को दरकिनार कर इस काम को शुरू करने का फैसला लिया। शुरुआती दौर में ज्योत्सना ने एक पर्यावरण विकास समिति (इको-डेवलपमेंट कमेटी) का गठन किया। इस समिति में स्थानीय लोगों और कूड़े का संग्रह करने

वाले श्रमिकों को शुमार किया गया। इन श्रमिकों को प्रतिमाह 1000 रुपये वेतन देने का प्रावधान किया गया। इसके अलावा इन श्रमिकों को प्रति गार्बेज बैग (कूड़े का बैग) पांच रुपये कमीशन देने का भी फैसला किया गया। 

बहरहाल, लगातार 14 माह तक काम करने के बाद ज्योत्सना की टीम ने इस खूबसूरत क्षेत्र से 44 टन से अधिक कूड़ा-करकट एकत्र किया। इसी तरह खच्चरों द्वारा फैलाई गई कई टन गंदगी भी बटोरी गयी। इसकी वजह यह थी कि इस क्षेत्र से तीर्थ यात्रा के दौरान प्रतिदिन 500 खच्चर इधर से उधर आते-जाते हैं। यहाँ एकत्र की गई गंदगी को घोड़ों पर लादकर गोविंदघाट ले जाया गया। यहाँ से इसे रिसाइकिलिंग के लिए दिल्ली भेज दिया गया।  हम लोग इस गंदगी को दूर करने के लिए कोई आसान रास्ता, जैसे कूड़े को जला देना या इसे जमीन के अंदर दफन कर देना आदि नहीं अपना सकते थे। ऐसा इसलिए, क्योंकि कूड़े की मात्रा बहुत ज्यादा थी। इसके लिए रीसाइकिलिंग से बेहतर अन्य कोई सुरक्षित जरिया नहीं था।

साफ-सफाई के बाद अन्य समस्याएं भी थीं, जिनका समाधान ज्योत्स्ना और उनकी टीम को करना था। इस क्षेत्र के 76 परिवारों ने लगभग 400 झोपड़ियों बनवा रखी थीं, जहां से ये लोग अपना छोटा-मोटा कारोबार किया करते थे। ज्योत्स्ना कहती हैं कि मुझे महसूस हुआ कि पर्यावरण के लिहाज से इन्हें भी हटाया जाना चाहिए, पर यह कार्य आसान नहीं था। इसके लिए मैंने 76 परिवारों के समक्ष प्रस्ताव रखा कि प्रत्येक परिवार को एक-एक पक्की दुकान बनवाकर दी जाएगी, पर इसके लिए आपको इन 400 झोपड़ियों को नष्ट करना होगा। अंतत: सभी 76 परिवारों ने मेरे इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। यही नहीं नंदा देवी बॉयोस्फीयर रिजर्व और वैली ऑफ फ्लावर्स नेशनल पार्क के इर्द-गिर्द रहने वाले स्थानीय लोगों की समस्याओं को दूर करने और उनमें पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए भी ज्योत्सना ने प्रयास किए। इन पार्कों के सौंदर्य संरक्षण में ज्योत्सना ने स्थानीय लोगों का सहयोग लिया। गौरतलब है कि वैली ऑफ फ्लावर्स

नेशनल पार्क हिमालय के ऊपरी भाग में 3200 से 6675 मीटर की ऊँचाई पर 87.5 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है। यहाँ पर फूलों की

हजारों किस्में हैं। वैली ऑफ फ्लावर्स की गणना दुनिया के दिलकश स्थलों में की जाती है। यह ज्योत्सना के प्रयासों का ही फल था कि वैली ऑफ फ्लावर्स को वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में शामिल कराने के संदर्भ में विभाग की ओर से एक प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र संघ भेजा गया। इसे कालांतर में स्वीकार कर लिया गया। 14 जुलाई, 2005 को संयुक्त राष्ट्र की ओर से वैली ऑफ फ्लावर्स नेशनल पार्क को वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा प्रदान कर दिया गया।                  (साभार : विमेन्स फीचर सर्विस)


नीता लाल

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