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भारत : गर्भाय किराए के लिए

पुणे, (विमेन्स फीचर सर्विस)  -  'सरोगेसी' ब्द उन महिलाओं से सम्बध्द है जो चिकित्सकीय जटिलताओं के कारण स्वयं वच्चा धारण करने में असमर्थ हैं। तथापि, स्वस्थ व  कामकाजी विवाहित  महिलाओं की बती संख्या किराए के मातृत्व के बारे में पूछताछ कर रही हैं। तथापि, मां बनने की इच्छुक लेकिन बच्चा- धारण के महीनों के दौरान वृतिक रोकने बंद करने के इच्छुक नहीं हैं, ऐसी वृतिक-प्रेमी महिलाओं ने बाहर से काम कराने के विचार को एक नया मोड दे दिया है।  

डा. सुनीता तेन्दुलवाडकर, आई. वी. एफ. ;इन-विट्रो फर्टीलाइजेन प्रमुख, रूबी हाल क्लीनिक, पुणे की सलाहकार व इन्डोस्कोपिस्ट कहती है, ' हाल ही में हम से वृतिक -महिलाओं नेजो अपने वृतिक को निर्बाध रूप से चलाने के लिए किराए पर गर्भाशय लेना चाहती हैं, पूछताछ की है।  उन में से एक 32 र्षीय सिंगापुर की है। दूसरी दक्षिण भारत की व आई. टी. उद्योग में कार्य करती है।  

डा. तेन्दुलवाडकर ही अकेली इस अप्रसांगिक को नोट करने वाली नहीं है। 'पिछले कुछ महीनों में, हम  से चार जानकारियां, जो चिकित्सकीय नहीं हैं, ली गई हैं। दो वृतिक-महिलाए  हैं, जो अपने काम में बाधा नहीं पहुंचाना चाहती। तथापि, हम कभी भी 'सरोगेसी' को गैर- चिकित्सकीय कारणों के लिए नहीं अपनाने देते तथा केवल चिकित्सकीय कारणों से प्रेरित वास्तविक अवस्थाओं में  'सरोगेसी' की स्वीकृति देते हैं', आकांक्षा इनफर्टीलिटी व आई. वी. एफ. क्लीनिक, आणंद, गुजरात की डा. नयना पटेल कहती हैं। चिकित्सक समाज की आम राय यही प्रतीत होती है। 'हम इन महिलाओं को 'सरोगेसी' का सहारा लेने की राय नहीं देते क्यों कि आयुर्विज्ञान की दृष्टी से वे गर्भ धारण कर सकती हैं और च्चे को जन्म दे सकती हैं। हम उनको यह भी बताते हैं कि गर्भावस्था के दौरान मां और च्चे में अटूट सम्बन्ध स्थापित हो जाता है', डा. तेन्दुलवाडकर कहती हैं। 

लेकिन, एक 'सरोगेट' मां कैसे चयनित होती है और इसका चयन करते समय उसका स्वास्थ्य - उम्र - सामाजिक जांच-बिन्दु क्या हैं ? प्राथमिक रूप से दो तरीके हैं: एक, जहां डा. की सहायता से 'सरोगेट' मां  चयनित की जाती है; और दूसरा, जब भावी मां-बाप अखवार में विज्ञापन देते हैं।  'सरोगेट' मां का निर्णय हो जाने के बाद - वह 18 साल से अधिक उम्र की हो - चिकित्सक उसका पूर्ण चिकित्सकीय जांच करते हैं कि कहीं उसको कोई पुरानी बीमारी न हो। उसकी एच. आई. वी. ए. आई. डी. एस. की जांच भी की जाती है। 

इस उभरती प्रवृति से बहुत से सामाजिक मुद्दे उठते हैं : क्या महिलाएं बच्चे पैदा करने की चुनौती से बच रही हैं ? क्या यह घर व वृतिक का सन्तुलन बनाये रखने का दबाव के कारण है ? क्या कामकाजी महिलाओं पर आदमियों की भांति ब्यवहार करने के लिए आदमियों के ससार में दबाव डाला जाता है ? क्या लोग यह सोचते हैं कि उपभोक्तावाद के युग में किसी भी चीज को खरीदा जा सकता है

जहां इन मुद्दों पर बातचीत व बाद-बिवाद चल रहा है, भारत 'सरोगेसी' के लिए एक प्रसिध्द गन्तब्य बन रहा है - जिसका एक कारण दे सकने-योग्य ब्यय हो सकता है। भारत में, 'सरोगेट' गर्भ का कुल ब्यय रु. 2,25,000- लगभग यूएस $ 5,000-) - जो कि विदेशों में लागत से लगभग यू एस $  35,000- कम है। बेहतरीन चिकित्सा व 'सरोगेट' माताओं  की सहज उपलब्धि के कारण नि:सन्तान विदेशिों की बडी संख्या 'सरोगेट' च्चों के लिए भारत आ रही हैं ।  

जहां वृतिक-जागरूक महिलाओं व वास्तव में, नि:संतान युगलों के 'सरोगेसी' का आश्रय लेने के अपने कारण हैं, वे महिलाएं, जो अपने गर्भाशय को आई. वी. एफ चिकित्सा से दूसरे का च्चा धारण करने के लिए किराए पर देती हैं आम तौर पर धन के लोभ में देती हैं । आई. वी. एफ. तकनीक के अनुसार जैविक मां के अण्डे को पिता के शुक्राणु  के साथ परख-नली में भ्रूण प्रजनित  किया जाता है। इस भ्रूण को 'सरोगेट' मां के गर्भाशय में योनि-मार्ग से पहुंचाया जाता है। 

आनंद की पुश्पा जगदी पाण्डया को लें जो दूसरी बार 'सरोगेट' बनी है। पुष्पा, जिसके अपने दो बच्चे हैं, को अपना गर्भाशय किराए पर देने के लिए रु.1.5 लाख मिले हैं। 'यह मुख्य रूप से मकान खरीदने के लिए और अपने च्चों के भविश्य के लिए मैंने यह निर्णय किया। वास्तव में, बच्चे को देना बहुत कठिन है......आपको बच्चे से लगाव हो जाता है......लेकिन मैं यह भी जानती हूं कि उस युगल को बच्चे की बहुत आवश्यकता थी और वे अच्छी तरह इसकी परवरि करेंगे। तथापि, यह आखिरी बार मैं कर रही हूं', पाण्डया जिसको उसके पति व परिवार का पूर्ण सहयोग मिला, कहती है।  

यह रुचिकर है कि पिछले दो साल से आनंद से ही छ महिलाएं 'सरोगेट' मां बन चुकी हैं। 'वे ('सरोगेट' मांएं) पहले-पहल आर्थिक लाभ के लिए यह करती थीं लेकिन जब वे बांझ युगलों के सम्पर्क में आती हैं, उनका मुख्य उदेश्य बांझ युगलों के चेहरों पर खुशी लाना होता है। प्रारम्भ में, महिलाओं को 'सरोगेट' मां बनने के लिए विश्वास दिलाने में बडी कठिनाई आती थी लेकिन अब...... यह विचार स्वीकार्य होते जा रहा है', डा. पटेल कहती हैं। तथापि, उनका विश्वास है कि रिशतेदार अच्छे 'सरोगेट' मांएं सिध्द होती हैं लेकिन उनको इस विचार से पूर्ण सहमति होनी चाहिए। 

संयोग से, महिलाओं की बती संख्या अपने ब्यावसायिक जीवन को वच्चा-धारण के लिए गर्भाशय किराए पर लेकर प्राथमिकता दे रही हैं, 'सरोगेसी' भारत के स्वास्थ्य उद्योग के खजाने को बढाएंगे - जिसका 2012 तक 2.3 बिलियन डालर होने का अनुमान है।

 

गगनदीप कौर (सौजन्य : विमेन्स फीचर सर्विस)

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