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बच्चों की सेवा में हाजिर है 'चाइल्डलाइन'

नई दिल्ली, 9 दिसम्बर(आईएएनएस)। अधिकारों की रक्षा के मामले में जरूरतमंदों की सूची लंबी है और ऐसे में बच्चों की बारी और भी देर से आती है। उपेक्षा के शिकार इन मासूमों की सुनवाई के लिए ही 'चाइल्डलाइन इंडिया' नामक संस्था ने युनिसेफ, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय और महिला एवं बाल कल्याण विभाग के साथ मिलकर भारत की पहली 'चाइल्डलाइन' सेवा शुरू की। इस सेवा के तहत फोनलाइन नंबर 1098 पर बच्चों की किसी भी समस्या से निपटने के लिए सहायता मौजूद है।

 बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए 1996 में शुरू की गई इस फोनलाइन पर बच्चे और उनकी सहायता का इच्छुक कोई भी व्यक्ति दिन या रात किसी भी समय फोन कर सकता है। इस अनूठी फोनलाइन के जरिए बच्चों को हर मुमकिन सहायता देने वाले संस्था के कार्यकर्ताओं के लिए उन तक पहुंचने वाली हर कॉल का महत्व है।

संस्था से जुड़े उस्मान अली ने आईएएनएस को बताया, ''हमें कई तरह के फोन आते हैं। पिटाई का शिकार कोई बच्चा अगर हमसे मदद चाहता है तो हम फौरन अपने प्रतिनिधि को वहां भेजते हैं। जिसके संरक्षण में बच्चा हो उसे समझाने से अगर बात न बने तो 'बाल कल्याण समिति' की सहायता से हम उसे संस्था के साथ रहने की अनुमति दिलावाते हैं।''

अब तक इस संस्था ने 40 लाख से ज्यादा फोन कॉल दर्ज किए हैं। फोन करने वाले ज्यादातर बच्चे 11 से 15 वर्ष के हैं और 55 फीसदी बच्चों ने भावनात्मक संबल और सलाह पाने के लिए फोन किए। संस्था के आंकड़े यह भी बताते हैं कि 66 फीसदी फोन कॉल किशोरों की रहीं। इस मायने में बच्चों की सेवा में हाजिर यह फोनलाइन उनके सुख-दुख की साथी है।

महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की एक रपट के अनुसार 2006-07 में बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए कुल 27674.58 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया लेकिन इस बजट का मात्र 0.034 फीसदी हिस्सा ही बच्चों के अधिकारों के लिए सुरक्षित था। यह दर्शाता है कि भारत में बाल अधिकारों को खास तवाो नहीं दी जाती है लेकिन फोनलाइन 1098 बच्चों के इस हक का सम्मान करने की कोशिश में लगी है।

9 दिसम्बर 2007

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

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