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हर कौम पुकारेगी हमारे हैं हुसैन...

इंसान को बेदार तो हो लेने दो।

हर कौम पुकारेगी हमारे हैं हुसैन॥

जोश मलिहाबादी की इन पंक्तियों से बयां होती इमाम हुसैन की शहादत के प्रति आस्था और विश्वास को फैलाने के जज्बे के साथ आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष मौलाना कल्बे सादिक और आल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना मिर्जा मोहम्मद अतहर सहित शिया समुदाय के तमाम धर्मगुरु देश और विदेश में मजलिसें पढ़ने चले गए हैं। पिछले सालों में मोहर्रम के दौरान लखनऊ  के शिया धर्मगुरुओं का विदेशों में मजलिस पढ़ने का सिलसिला बढ़ता ही गया है।

 

मौलाना कल्बे सादिक के पुत्र कल्बे हुसैन ने बताया कि उनके वालिद पाकिस्तान, आस्ट्रेलिया, कनाडा, स्विटजरलैंड, हालैंड और इंग्लैंड में मजलिसें पढ़ेंगे। इसी प्रकार मौलाना मिर्जा मोहम्मद अतहर आशूरे के दिन तक (कल से शुरू हो रहे मोहर्रम से दसवां दिन) मुंबई में मजलिसें पढ़ने के बाद अमेरिका चले जाएंगे।

 

इनके अलावा मौलाना मिर्जा मोहम्मद अशफाक, मौलाना यासूफ अब्बास, मौलाना मुमताज अली, मौलाना जहीर अहमद इतिखार, मौलाना जाहिद अहमद भी पाकिस्तान, खाड़ी के देश एवं अमेरिका सहित दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मजलिसों को खिताब करेंगे।

 

तन्जीमुल मुकातिब के मौलाना सफी हैदर, मौलाना हैदर मेंहदी और मंजर सादक भी मोहर्रम के दौरान लखनऊ  से बाहर ही रहेंगे। गौरतलब है कि तन्जीमुल मुकातिब शिया समुदाय का एक बड़ा प्रतिष्ठित मदरसा है जिसकी शाखाएं पूरे देश में फैली हैं।

 

इतनी संख्या में शिया धर्मगुरुओं की राजधानी के बाहर होने के बावजूद लखनऊ  में मोहर्रम की मजलिसों में शिरकत करने वालों को कोई मायूसी नहीं होती। राजधानी लखनऊ  में मुख्य रूप से आल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य और इमाम-ए-जुमा मौलाना कल्बे जव्वाद द्वारा गुफरामांब इमामबाड़े, मौलाना आगा रूही द्वारा शिया कालेज और अफजल महल एवं मौलाना हमीदुल हसन द्वारा नाजमिया मदरसे में संबोधित की जाने वाली मजलिसों में भारी संख्या में लोग शिरकत करते हैं। इसके अलावा इमामबाड़ा सआदत अली खां, सिब्तैनाबाद का इमामबाड़ा सहित कई अन्य स्थानों पर भी आयोजित होने वाली मजलिसों में लोगों की खासी भागेदारी होती है।

 

करबला के शहीदों की शहादत को याद करने वाले मोहर्रम के मौके पर लखनऊ में मजलिसों के आयोजन के मूलत: तीन स्वरूप हैं। परंपरागत रूप से मोहर्रम शाही अंदाज में मनाया जाता है, जिसमें शहनाई, ब्रास बैंड और अन्य गाजे-बाजे के सामान प्रयोग में लाए जाते हैं।

 

इस अंदाज में मोहर्रम का आयोजन तब शुरू हुआ था जब अवध में नवाबी हुकूमत थी। बाद में जमींदारी और ताल्लुकेदारी वाले दौर में वक्फ अथवा ट्रस्ट का गठन कर इनके तत्वाधान में भी मजलिसें आयोजित होने लगीं। लोकतांत्रिक व्यवस्था का दौर आया तो लोगों ने चंदा जुटाकर भी मजलिसें आयोजित करना शुरू कर दिया।

 

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

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