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तोता बाला ठाकुर की आत्मकथा
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क्षेमेन्द्र ठाकुर -
उस रात्रि तुम्हारे लिए बनाऊँगी
सरसों के तेल में हिलसा और आलू-पोस्ता
पहनूँगी बालारून सारी कुसुम्भ किनारी की
जवाकुसुम के अलंकार, पारिजात के कंकन
तुम्हें मनुहार के खिलाऊँगी लूचियाँ और मालपुआ
चुम्बन लेने की लीला करूँगी किंतु लूँगी नहीं
दे दूँगी अपनी शंख कंकनों से भरी बाँह तुम्हारे हाथ में
मसक देना तुम
तोड़ देना कंकन लोहे के वलय छोड़कर
शंख सिंदूर के सब कंकन
ऐसे प्रणय कलह में कर दूँगी अर्धरात्रि
फिर फिर, जब तुम सो जाओगे तुष्ट
बाहर केवल रोते होंगे चकवे
बाहर केवल प्यासा होगा चातक
तब क्षेमेन्द्र ठाकुर
निकालूँगी वह चाक़ू जो दिया था मुझे
ऋषभ ब्रह्मो ने
जहाँ से चलती है तुम्हारी नाड़ी
जहाँ बसे है तुम्हारे प्राण
वहाँ कंठ पर प्रहार करूँगी
तुम्हारे रक्त के लथपथ मैं
मुझे पहचान नहीं पाएगा ऋषभ ब्रह्मो
समझेगा उसकी इष्टदेवी छिन्नमस्ता है
ऐसे क्षेमेन्द्र ठाकुर मैं तुम्हारी हत्या करूँगी
क्योंकि मैं करती हूँ तुमसे प्रेम
क्योंकि मेरे हृदय को खा चुका है ऋषभ ब्रह्मो।

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