मुखपृष्ठ कहानी कविता | कार्टून कार्यशाला कैशोर्य चित्र-लेख |  दृष्टिकोण नृत्य निबन्ध देस-परदेस परिवार | फीचर | बच्चों की दुनिया भक्ति-काल धर्म रसोई लेखक व्यक्तित्व व्यंग्य विविधा |   संस्मरण | साक्षात्कार | सृजन डायरी | स्वास्थ्य | साहित्य कोष |

 

 Home | Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | FeedbackContact | Share this Page!

 

आत्मा की हत्या                                 मनोवैज्ञानिक लेख
 

हानियाँ बाहर आ रही हैं। कंक्रीट की दीवारें पारदर्शी हो रही हैं। किवाड़ें झीने चिलमन में बदल रही हैं। मन की गुफाएँ रहस्यों का वमन कर रही हैं । नई सदी में भारत तेजी से बदला है। बदलाव ने हमें साहसी भी बनाया है और ढीठ भी। साहस हमें चतुर्दिक फैला रहा है और ढीठपन अपनी कामनाओं-वासनाओं में निसंकोच लिप्त होने में मदद कर रहा है। सबकी परवाह करने के चक्कर में अपने-आप की निर्मम उपेक्षा करने वाला समाज अब सबकी कीमत पर अपनी परवाह करने के स्वस्थ और बीमार दोनों तरह के उदाहरण पेश कर रहा है। अपने मन की व्यथा को मन में ही रखने की कवि रहीम की सलाह अब हमें नहीं भा रही। अब हम व्यथा-भार से मुक्त होने के लिए कभी मनोचिकित्सक के परामर्श कक्ष में जा रहे हैं तो कभी कैमरे के सामने खुलकर कह रहे हैं। ये बदलाव हमें एक तरफ ‘जैसे थे’ उससे अलग दिखा रहे हैं तो दूसरी तरफ ‘कैसे थे’ और ‘कैसे हैं’ इससे भी वाकिफ करा रहे हैं। अमूमन व्यक्ति और समाज दोनों अपने बारे में भ्रम के नीम अंधेरे में रहना चाहते हैं। बदलाव हमें अपनी करनी से मुखातिब करे रहे हैं।

परिवार केन्द्रित समाज के कौटुम्बिक व्यभिचार की कहानियाँ भी बाहर आ रही हैं। यौन अपराधों से पीड़ित बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था ‘राही’ के एक वेब पेज पर प्रकाशित है कि कम से 53 प्रतिशत बच्चों के साथ यौन अपराध होते हैं और इनमें से 72 प्रतिशत चुपचाप सहते हैं। अधिकांश ‘अपराधी’ जाने-पहचाने और अपने लोग होते हैं। 64 प्रतिशत कार शिकार की उम्र 10-18 वर्ष के बीच होती है और कोई विचलित हो सकता यह जानकार कि 32 प्रतिशत ‘ शिकार ’ की उम्र 2-10 वर्ष के बीच होती है। बेचारे बच्चे! ‘राही’ की रपट है कि कौटुम्बिक व्यभिचार के शिकार 87 प्रतिशत बच्चों के साथ यह सब बार-बार होता है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 2004 में 505, 2005 में 750, 2006 में 431, 2007 में 405 और 2011 में 267 कौटुम्बिक बलात्कार हुए। इन आंकड़ों को पानी में डूबकर बहते हिमखंड के दृश्य हिस्से की तरह देखना चाहिए क्योंकि कम से कम 72 प्रतिशत शिकार, जो बीतता है उसे चुपचाप झेलने को विवश होते हैं। तो कहानियाँ बाहर आ रही हैं - मुम्बई से, दिल्ली केरल से चेन्नई से और बिहार से या यूँ कहिए पूरे देश से। हम एक हैं अच्छाइयों में न सही बुराइयों में ही सही।

क्या है यह कौटुम्बिक व्यभिचार। इसके लिए अंग्रेजी में एक शब्द है- इनसेस्ट। यह लैटिन के इनसेस्टस से बना है, जिसका मतलब होता है – अशुद्ध, अपवित्र। अंग्रेजी में जब इस शब्द का प्रयोग होने लगा तो इसका अर्थ अपवित्र भी था और कौटुम्बिक व्यभिचार भी। किंतु कालांतर में इसका प्रयोग एक ही अर्थ होने लगा। सभ्यता के इतिहास मेँ भाषा अपेक्षाकृत नयी चीज है। हमने पहले करना सीखा, उसके बाद कहना । तात्पर्य यह कि इनसेस्ट शब्द के निर्माण और चलन से पुराना है कौटुम्बिक यौन सम्बन्धों का इतिहास। हिन्दु पौराणिक कथाओं के अनुसार ब्रह्मा ने सृष्टि को रचा। अब नारी के बिना सृष्टि तो रची नहीं जा सकती थी सो उन्होंने नारी को रचा फिर उसके साथ मिलकर सृष्टि की रचना की। आधुनिक दृष्टिकोण से सोचें तो ब्रह्मा उस नारी के पिता हुए और इस तरह यह सृष्टि ‘इनसेस्ट’ से बनी। पर क्या यह ‘इनसेस्ट’ था ? मुझे लगता है नहीं। क्योंकि पहले सृष्टि तब तो परिवार और रिश्ते और तब तो उनके व्याकारण। इसलिए सृष्टि-निर्माण के मिथकीय संदर्भों को आधुनिक संबंधों के हिसाब से देखना उचित नहीं। धर्म कोई भी हो इनके मिथक अदिम तत्त्वों से ही बने होते हैं।

परिवार के सदस्यों और निकट सम्बन्धियों के साथ यौन सम्बन्ध को कौटुम्बिक व्यभिचार कहते हैं क्योंकि इनके बीच विवाह और यौन सम्बन्ध निषिद्ध होते हैं। परिवार और निकट सम्बन्धियों के साथ होने वाले यौन सम्बन्ध हर देश काल में व्यभिचार नहीं कहे गए । पुरातन मिस्र में शाही वंश की शुद्धता बनाए रखने के लिए भाई-बहन और बाप-बेटी तक में वैवाहिक संबंधों का प्रचलन था। सूचनाओं के अनुसार तूतनखामन अपने पिता और उनकी चचेरी बहन का बेटा था और राजा बनने के बाद उसने अपनी सौतेली बहन से शादी की थी। चीन में एक कुलनाम वालों के बीच विवाह मना था मगर अलग कुलनाम वालों के साथ नहीं। प्राचीन ग्रीस में स्पर्टा के राजा लियोनिडस ने अपने सौतेले भाई की बेटी से शादी की थी। उन दिनों ग्रीक नियम सौतेले भाई बहनों (अलग-अलग माँ से उत्पन्न) के बीच विवाह की अनुमति देते थे। मगर स्पेन में ऐसे सम्बन्ध दैवी और मानवीय नियमों के विरुद्ध माने जाते थे। कालांतर में वहां राजकीय आदेश के द्वारा ऐसे संबंधों को अवैध करार दिया गया। मध्यकालीन यूरोप में राजनीतिक कारणों से चचेरे भाई बहनों के बीच में विवाह की सूचना मिलती है।
कुछ अपवादों को छोड़ दें तो लगभग हर देश काल में कौटुम्बिक यौन सम्बन्ध निषिद्ध माने गए हैं। कोई भी धार्मिक विष्वास ऐसे संबंधों को स्वीकृति नहीं देता। यहूदी धर्म ग्रंथ तोरा में निषेधों का विस्तार से जिक्र है। मगर यहां औरत और मर्द के लिए छूट की सीमा अलग-अलग है। इसाई धर्म भी ऐसे सम्बन्धों को वैध नहीं मानता। कुरान में मुमानियत की पूरी फेहस्ति है। यहां माँ , सौतेली माँ , दूध पिलाकर पालने वाली माँ , बुआ, मौसी, बहन, सौतेली बहन, बेटी, भतीजी और सौतेली बेटी के साथ यौन सम्बन्ध मना है। हिन्दु धर्म कुछ ज्यादा ही शुद्धतावादी है। यहाँ तो एक गोत्र के दो इंसान विवाह नहीं कर सकते। समगोत्री विवाह को ‘इनसेस्ट’ माना जाता है। कुछ अपवाद भी हैं। जैसे तमिलनाडु में मामा-भांजी की शादी मान्य थी और केरल में परिवार की संपत्ति बचाने के लिए चचेरे भाई-बहन में शादी हो जाती थी। हालाँकि वहाँ भी ये रिवाज उठते जा रहे हैं।
बेस्ट सेलर किताब ‘ट्रुथ हील्स: व्हाट यू हाइड कैन हर्ट यू’ की लेखिका और मनोवैज्ञानिक मुद्दों की स्तंभकार न्यूयॉर्क निवासिनी डेबोरा किंग से लेकर हरियाणा के करोरा गाँव की विधि स्नातक सीमा तक खुलकर बोल रही हैं। डेबोरा अपनी किताब में कहती हैं कि मेरे पिता ने मेरे साथ कई बार यौन सम्बन्ध बनाए थे और सीमा कहती हैं कि समगोत्री विवाह पर फैसले देने वाली खाप पंचायतें यह नहीं देखतीं कि अधिकांश घरों में कौटुम्बिक व्यभिचार हो रहा है। सीमा ने एक टीवी चैनल पर 2010 में प्राइम टाइम पर जारी बहस में यह कहा था। गौरतलब है कि सीमा के भाई को समगोत्री विवाह के लिए खाप पंचायत में सजा सुनायी थी। अगस्त 2010 में माज्जर जिले के बाहादुरगढ़ इलाके में एक गर्भवती लड़की की लाश मिली थी। तहकीकात से पता लगा कि अपने बहनोई के साथ उसके यौन-सम्बन्ध थे। यह बात बहन को नागवार गुजरी और उसने माता-पिता से इस बात की षिकायत की थी। क्या हुआ होगा इसका सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है। जुलाई 2010 में सोनीपत में दो लड़कियों की हत्या हुई। एक की उम्र थी 12 वर्ष और दूसरी की 14 वर्ष। वजह? वे अपने चचेरे भाई के साथ पकड़ी गयी थीं। चचेरा भाई ज़िंदा और आजाद रहा और इन्हें चाचाओं और दादी ने निपटा दिया।

ये घटनाएँ ग्रामीण भारत के सामाजिक-परिवारिक जीवन की पोशीदा कहानियों की तरफ संकेत करती हैं । कुछ लोग कहते हैं कि सब में यह जब ज्यादा हो रहा है क्योंकि ग्रामीण समाज अपेक्षाकृत बंद होते हैं। और जब क्रूर कामनाएँ आत्मीयता और भरोसे के पर्दे में बाहर आती हैं तो कभी बहू, कभी बहन तो कभी भतीजी और बेटी को शिकार बनाती हैं। भाभियों और सालियों के लिए ‘एक हद तक’ सामाजिक स्वीकृति भी है मगर शिकार बेटी जैसी बहुएँ भी होती हैं और कोई कुछ नहीं बोलता। क्योंकि घर का मालिक परिवार का आलाकमान होता है। बाप पर निर्भर बेटा खामोश सहता रहता है और माताएँ कहती हैं - चुप रहो। डेबोरा किंग इसीलिए कहती हैं कि ‘इनसेस्ट’ ‘सेक्स’ नहीं ‘पावर’ का इजहार है।

शायद यही वजह है कि गाँव के बुजुर्ग कहते थे जवान लड़का और लड़की का साथ आग और फूस का साथ है। ताकीद की जाती थी कि जवान बेटे के कमरे में न तो माँ सोए और न ही बहन। बहनों को भाइयों और भाभियों को देवरों के भरोसे घर में अकेले छोड़ने रिवाज न था। मासिक धर्म से निवृत्त होकर स्त्रियाँ जब बाल धोकर नहाती हैं तो हवा में उड़ते खुष्क बालों की छाँव में बेहद ताजा नजर आती हैं। कैसी भी देखने में हो वह स्त्री, मगर एक अजीब-सी ताजगी होती है। ऐसी ताजगी जिसके आकर्षण से कुछ भी हो सकता है। बुजुर्ग महिलाएँ मना करती थीं जवान बहू-बेटियों को कि मर्दों के सामने इस तरह बाल खोलकर न जाएँ । यह सावधानी बताती है कि खतरे रहे होंगे हर देश, काल में।

कौटुम्बिक व्यभिचार की व्यापकता को देखते हुए गाँव और शहर विभाजन बेमानी लगता है। डेबोरा किंग गाँव में नहीं रहती थीं। 1960 के दषक के प्रसिद्ध अमेरिकी बैंड ‘द मामाज एंड पापाज’ के गायक जॉन फिलिप पर उनकी पुत्री मैकेन्जी ने ‘इनसेस्ट’ का आरोप लगाया है। फिलिफ अपने फूले हुए इगो और नशीली दवाओं के कारण अपने को ईश्वर से कम नहीं समझते थे। और ईष्वर के लिए क्या अपना क्या पराया? कुछ सालों पहले अखबारों के एक ख़बर आई थी कि मुंबई का एक व्यवसायी एक तांत्रिक की सलाह पर 9 सालों तक अपनी बेटी का बलात्कार करता रहा। उस लड़की का साहस तब जागा जब यही उसकी छोटी बहन के साथ भी होने लगा। इस घटना से प्रेरित होकर अमृतसर की एक लड़की ने शिकायत की कि उसका पिता विगत 8 सालों से उसके साथ दुराचार कर रहा है। गौरतलब है कि अधिकांश ऐसे दुखद प्रसंग माताओं की जानकारी में घटित होते हैं। शायद वे आर्थिक, सामाजिक और शारीरिक निर्भरता तथा परिवार की ‘इज़्ज़त’ की खातिर चुप रहती हैं। तो ‘इनसेस्ट’ की वजह है परिवार में शक्ति केन्द्र का होना। शक्ति का प्रदर्शन बड़े भाइयों और कभी-कभी बड़ी बहनों के द्वारा भी किया जाता है।

व्यस्कों द्वारा बच्चों के साथ किया गया दुराचार ‘बाल यौन शोषण’ के नाम से जाना जाता है। बाल यौन शोषण जटिल समस्या है। क्योंकि अधिकांश शिकारी करीबी लोग होते हैं। 1999 में बीबीसी की एक रिपोर्ट में दिल्ली स्थित संगठन राही को सर्वेक्षण के हवाले से कहा गया है कि सर्वे में शरीक होने वाले 76 प्रतिशत लोग बाल यौन शोषण के शिकार पाए गए और इनमें से 40 प्रतिशत ‘इनसेस्ट’ के शिकार थे। एक अमेरिकी शोध के अनुसार बच्चों के 46 प्रतिशत बलात्कारी परिवार के सदस्य होते हैं। अधिकांश मामलों में अपराधी पिता, सौतेले पिता, चाचा आदि होते हैं। परिवार के दायरे में बाल यौन शोषण की तीन आम वजहें देखी गयी हैं - माँ बाप में तलाक या दूरी, माँ या बाप में से किसी एक की दबंगई और पारंपरिक रूप से माँ द्वारा निभाए जाने वाले दायित्व बेटी को सौंपना। इन सबके पीछे नशाखोरी भी एक खास वजह होती है। शराब और अन्य नशीले पदार्थों की वजह से हमें नैतिक बनाने वाला सुपर इगो अप्रभावी हो जाता है। यानी नशे में धुत्त होने के बाद हम वही नहीं रह जाते, जो वास्तव में होते हैं। इस स्थिति में वर्जना-विहीन व्यवहार होने की संभावना बढ़ जाती है। कौटुम्बिक व्यभिचार की बहुत सारी घटनाएं नषे में घटित होती हैं। विधवा विवाह की समस्या पर केन्द्रित राजकपूर की फिल्म ‘प्रेम रोग’ का वह दृष्य याद करें जिसमें नशे और और बारिश के सुरूर में एक जमींदार अपने छोटे भाई की विधवा पत्नी का बलात्कार करता है।

दो सहोदरों के बीच होने वाले यौन सम्बन्ध अगर सहमति से न हों तो यौन शोषण के दायरे में आते हैं। ऐसे सम्बन्ध बाज दफा सहमति से भी होते हैं। ऐसे संबंधों की मूल वजह माँ -बाप की अनुपस्थिति होती है। यह अनुपस्थिति वास्तविक भी हो सकती है और भावनात्मक अनुपलब्धता के कारण भी। मस्ती, मशहूरियत और दौलत के पीछे भागने वाले माँ -बाप की तटस्थता कम अपराधी नहीं। आज परिवार एकल होते जा रहे हैं और नशाखोरी और बिस्तरपरस्ती जीवन की अपरिहार्य शैली बनती जा रही हैं। काम और ‘काम’ की बाध्यता के आगे विवष होते जा रहे हैं माँ -बाप और घर के बाकी कमरों में तनहाई तेल की तरह पसरती जा रही है। क्या पता कब कौन कहाँ फिसल जाए।

1991 में केनेथ एडम्स ने ‘इनसेस्ट’ के अलग रूप को प्रस्तावित किया – कोवर्ट इनसेस्ट यानी प्रच्छन्न कौटुम्बिक व्यभिचार। कोवर्ट इनसेस्ट में माँ या बाप और बच्चे के बीच यौन सम्बन्ध तो नहीं होते मगर लगाव का व्याकरण वही होता है। बच्चे का प्यार सहज और व्यस्क का यौनिक। प्रकट ‘इनसेस्ट’ की तरह यह सम्बन्ध भी एकतरफा होता है और इसकी वजह माँ -बाप के बीच दूरी या दो में से एक की अनुपस्थिति होती है। पार्टनर की बेरुखी, अनुपलब्धता या अनुपस्थिति के कारण अकेला पार्टनर बच्चे में सरोगेट पार्टनर (स्थानापन्न साथी) ढूंढने लगता है। ‘इनसेस्ट’ के इस प्रारूप के दुष्प्रभाव भी प्रकट इनसेस्ट की ही तरह होते हैं।
सवाल उठता है कि ऐसा क्यों होता है। अपने पिता द्वारा पीड़ित डेबोरा किंग का अनुभव कहता है कि मामला शक्ति और नियंत्रण का है। अन्य मनोवैज्ञानिक भी महसूस करते हैं कि पैरेन्टल इनसेस्ट शक्ति प्रदर्षन, नियंत्रण-प्रवृति और स्वार्थ का यौनिक संस्करण होता है। कुछ सालों पूर्व ताइवान से एक महत्वपूर्ण अध्ययन प्रकाशित हुआ था । इस अध्ययन के अनुसार व्यभिचारी पिता अपेक्षाकृत कम बहिर्मुखी होते हैं और उनके सोचने के तरीके में लचीलापन नहीं होता। वे बातों का भावार्थ ग्रहण नहीं कर पाते और सोचते भी कुछ ऐसे ही हैं। यानी न तो वे भाषा के मुहावरों के प्रति सजग होते हैं और न ही संबंधों के भावार्थ के प्रति। उनकी संज्ञानात्मक व कार्यकारी क्षमता भी कम होती है। इन सबका परिणाम यह होता है कि वे बेहद लापरवाह, आत्मकेन्द्रित और असंवेदनशील पिता होते हैं। शायद यही कारण है कि बेटी को एक मादा समझ बैठते हैं। यह शोध यह संकेत भी देता है कि कौटुम्बिक व्यभिचारी व्यक्ति लक्षणों के स्तर पर बलात्कारियों से अलग होते हैं।

कौटुम्बिक व्यभिचार को समझने के क्रम में जब फ्रायड के पास जाते हैं तो पता चलता है कि उनके यहाँ तो न्युरोसिस की समझ ही शुरू होती है इडिपस कॉम्प्लेक्स से। इडिपस एक मिथकीय चरित्र है जो अनजाने में अपनी माँ से विवाह करता है और बच्चे भी पैदा करता है। इसी मिथ के आधार पर फ्रायड इडिपस कॉम्प्लेक्स की अवधारणा प्रस्तावित करते हैं और कहते हैं कि मनोलैंगिक विकास की लैंगिक अवस्था (3 से 6 वर्ष की उम्र) में बेटे का माँ के प्रति और बेटी का बाप के प्रति आकर्षण होता है। इसे इडिपस कॉम्प्लेक्स कहते हैं। अगर इस ग्रंथि का सही विघटन होता है तो व्यक्ति अच्छे मनोस्वास्थ्य के साथ विकसित होता है और अगर दमन हुआ तो न्युरोसिस, समलैंगिकता और बाल-आसक्ति (पीडोफिलिया) के रूप में विकसित होता है। फ्रायड एक स्थान पर यह भी कहते हैं हिस्टीरिया की मूल वजह बचपन के दुखद यौन अनुभव होते हैं। मुझे अपनी एक मरीज याद आ रही है। वह 17 वर्ष की थी। उसे दौरे पड़ते थे। दौरे के वक्त उसकी आँखें उलट जाती थीं, शरीर अकड़ जाता था दाँत भिंच जाते थे और बाद में हाथ-पाँव पटकने लगती थी। उसे बहुत सारे न्युरोलाजिस्ट देख चुके थे और उनके अनुसार यह दौरा नकली था । मगर वे सब उसे मिर्गी की दवा खाने की सलाह दे चुके थे। मैंने परिजनों के सामने सामान्य बातें पूछने के बाद अकेले में उसका इन्टरव्यू शुरू किया। जब मैंने उससे पूछा कि अपने पिता के बारे में कुछ बताओ तो वह रो पड़ी और क्षोभ के साथ उसने बताया कि उसके पिता ने उसके साथ तीन बार बलात्कार किया है। मैंने सांत्वना देकर सत्र खत्म किया और उसे तीन दिन बाद आने को कहा। अगली बार जब आयी तो माता-पिता भी साथ थे। आते ही माँ ने कहा कि इसका दिमाग खराब हो गया है। अपने बाप पर आरोप लगा रही है। कहती है कि आपको भी बता चुकी है। ऐसा कहीं हो सकता है! अब हम उसे आपसे अकेले में बात नहीं करने देंगे। घर को बदनाम करके रख देगी। जब मैंने कहा कि इसकी मानसिक पीड़ा तो मन की गाँठें खोलने से ही दूर होंगी तो पिता खफा हो गए और कहा कि इसका इलाज हम कहीं और काराएंगे । वे उसे लेकर चले गए। जाते-जाते उसने मुड़कर मुझे देखा था। उसकी क्षोभ और डर से भरी आँखें मुझे आज भी याद हैं। फ्रायड ने ठीक कहा था। बचपन के दुखद यौन अनुभव के कारण इस लड़की को दौरे पड़ रहे थे।

आधुनिक मनोविश्लेषक कौटुम्बिक व्यभिचार को पीड़ित व्यक्ति की स्वतंत्र अस्मिता का अतिक्रमण मानते हैं। व्यभिचार की यातना का सिलसिला उसे बेचारगी और क्षोभ से भर देती है। उसमें यह भाव आ जाता है कि अगर जीना है तो यह सब सहना है। उसका आत्मविश्वास खत्म हो जाता है और व्यभिचारी पर उसकी निर्भरता बढ़ती जाती है। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक लियोनार्ड शेनगोल्ड के अनुसार यह ‘आत्मा की हत्या’ है। क्लाउड स्टील इनसेस्ट की प्रक्रिया को समझाते हुए कहते हैं कि पिता-पुत्री के इनसेस्ट में सहजीविता (सिमबायोसिस) के तत्त्व होते हैं। पत्नी द्वारा उपेक्षित व्यक्ति अपनी पुत्री को भी अपनी ही तरह वंचित समझ लेता है। धीरे-धीरे इस भाव में यौनिक तत्त्व आ जाते हैं। स्टील के अनुसार माता-पुत्र इनसेस्ट में दो बातें होती हैं। पहली तो यह कि सहजीविता में यौनिक तत्व आ जाते हैं और दूसरी यह कि बच्चे का अलगाव और स्वतंत्र व्यक्तित्व का विकास बाधित हो जाता है।

फिनलैंड के मनोवैज्ञानिक वेस्टरमार्क ने 1891 में कहा था कि जो लोग एक साथ बड़े होते हैं वे एक-दूसरे के लिए आकर्षक नहीं रहते। इस अवधारणा के इर्द-गिर्द बहुत सारे शोध हुए हैं जो इस बात की ओर इशारा करते हैं कि जैविक जगत में ‘एन्टी इनसेस्ट’ व्यवस्था होती है अंतः प्रजनन (इनब्रीडिंग) को रोकने के लिए। यह व्यवस्था पौधों में भी होती है, जानवरों में भी और मनुष्यों में भी। जीव विज्ञान के अनुसार अंतः प्रजनन से होने वाली संतानों में जन्मजात विकलांगता तथा जेनेटिक बीमारियांयाँ अधिक होती हैं। शोध बताते हैं कि इनसेस्ट से पैदा हुई संतानों में बाल मृत्यु दर लगभग 30 प्रतिशत होती है। शायद यही कारण है कि प्रकृति ने इनसेस्ट को रोकने की व्यवस्था की है। सभी स्तनधारी जानवर अगर अन्य साथी उपलब्ध हो तो अंतः प्रजनन से बचना चाहते हैं। एक अध्ययन में देखा गया कि नर चूहे अपनी बहनों के साथ मजबूरी में ही यौन सम्बन्ध बनाते हैं। यानी ‘इनसेस्ट’ प्राकृतिक नहीं है।

इनसेस्ट न प्रकृति है न संस्कृति। यह सिर्फ विकृति है और इसके प्रभाव दूरगामी होते हैं। यह पीड़ित में अपराध-बोध, आत्महीनता और क्रूरता पैदा करती है। पीड़ित व्यक्ति मनोशारीरिक (सायकोसोमैटिक) रोग, नशाखोरी और अवसाद से ग्रस्त हो सकते हैं और इनमें आत्महत्या की दर भी ज्यादा होती है।

सवाल उठता है कि क्या किया जाए। परिवार नष्ट हो रहे हैं। एकल परिवार के सदस्य भी अपनी फिक्र में अकेले होते जा रहे हैं और दुनिया छोटी होती जा रही है। हर बुराई की पाठशाला हमारी पहुँच के अंदर है। इंटरनेट पर इनसेस्ट की जायकेदार कहानियां भरी पड़ी हैं और हमारे नीति-नियामक महानुभावों को अपने ही पतन के इंतजाम से फुर्सत नहीं। उनकी अनदेखी के अंधेरे में मीडिया उत्तेजना परोस रहा है। किसी अलगनी पर एक पैंटी अंडरवियर की तरफ खिसकती है तो कहीं एक कुत्ता दो बच्चों के एकांत की पहरेदारी करता नजर आता है। मुझे कोई 30 साल पहले का एक वीडियो याद आता है जिसमें एक पूर्ण पुरूष (शा यद रेमो फर्नाडिस) बेबी-बेबी कहके एक गाना गाते हैं और एक लड़की स्कूल ड्रेस में आती है। विज्ञान कहता है कि मानव मस्तिष्क 25 के पहले पूर्ण विकसित नहीं होता। क्या ये बात हमारे तथाकथित संस्कृतिकर्मियों को नहीं पता? क्या करें हम कि सदी का महानायक अपनी लोलितागीरी टाइप करतूत से हमें ‘निःशब्द ’ कर देता है।

किया क्या जाए? परिवार ही रास्ता है। अच्छी पेरेंटिंग, समझदार और समर्पित लालन-पालन ही समाधान है। अगर हम मानसिक रूप से स्वस्थ बच्चे बनायेंगे तो कल वे सही माँ -बाप बनेंगे। श्रृंखला दुर्घटनाओं और दुर्भाग्य की ही नहीं सत्प्रयासों की भी होती है। आमीन!

- डा. विनय कुमार

Hindinest is a website for creative minds, who prefer to express their views to Hindi speaking masses of India.

 

 

 

मुखपृष्ठ  |  कहानी कविता | कार्टून कार्यशाला कैशोर्य चित्र-लेख |  दृष्टिकोण नृत्य निबन्ध देस-परदेस परिवार | बच्चों की दुनियाभक्ति-काल डायरी | धर्म रसोई लेखक व्यक्तित्व व्यंग्य विविधा |  संस्मरण | साक्षात्कार | सृजन साहित्य कोष |
 

(c) HindiNest.com 1999-2021 All Rights Reserved.
Privacy Policy | Disclaimer
Contact : hindinest@gmail.com