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कविताएं
लेडी लाज़ारस - सिल्विया प्लाथ
अनुवाद : मनीषा कुलश्रेष्ठ


हर दस साल में
एक बार मैंने फिर किया
मैं कर सकी
सरेराह मिले किसी तिलिस्म की तरह
मेरी त्वचा चमक रही थी
जैसे हो कोई चमकीला नाज़ी लैम्पशेड *
मेरा दाहिना पैर जैसे पेपरवेट
मेरा चेहरा बिन नुकूश सा-सा
जैसे हो कोई महीन ज्यू – लिनन

इसे पेपर-नैपकिन की तरह छील दो
ओ मेरे दुशमन – ए – जाँ
क्या मैं डरती हूँ !

नाक, आंखों के गड्ढे, बत्तीसी
खट्टी सांस
एक दिन में ही चुक जाएंगे
जल्दी ही लील लेगी कब्र की गहरी गुफ़ा
मांस-मज्जा तक
जैसे लीलता है घर मुझे
मैं एक मुस्कुराती हुई युवती
मैं अभी केवल तीस की हूँ
और बिल्ली की तरह
मुझे नौ मौतें मरना होगा
यह तीसरी बार है

क्या बकवास है !
यूं हर दशक में ज़ाया होना
उफ़! ये लाखों तंतु ...
मूंगफली की तरह चूर-चूर करता
भीड़ का यह समुद्र
जिसमें मैं बहती हूँ

इन्हें खोल लेने दो मेरे हाथ-पैर
जैसे कोई स्ट्रिप-टीज़
महानुभावों और प्यारी महिलाओं
ये मेरे हाथ हैं
मेरे घुटने
हो सकता है मैं कंकाल दिख रही होऊँ
कोई बात नहीं मैं वही,
ठीक वैसी ही औरत हूं
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कविता - विपस्सना वहिब गौतम

गंगा  । 1 2 3 4 5 6 7 । - संजय

 

मार्च 2021
महिला दिवस

कहानियां

न किन्नी न.... - सूर्यबाला
मौसी आतीं तो घर रोशनी और रौनक से भर जाता। हम छज्जे-छज्जे चहकते फिरते, सबसे कहते, हमारी मौसी आ रही हैं। बिजनौर वाली मौसी। हमारे मौसा जी शक्कर की मिल में मैनेजर हैं। उनके पास मिल की जीप है, उनके घर में बहुत सारे नौकर हैं, दो कुत्ते हैं और एक खरगोश भी, उनके दो बच्चे हैं-गगन और रोजी। गगन के पास बंदूक है- चिड़िया मारने की। रोजी के पास बुलबुल तरंग है। मास्टर आते हैं, उसे सिखाने को।
मौसी खूब चिट्टी हैं, मां जैसी धूमिल-धूमिल-सी नहीं और खूब हंसती-खिलखिलाती चुस्त-दुरूस्त सी रहती हैं, मां जैसी सुस्त-सुस्त-सी नहीं।
  
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जद जाणूंगी नेह - हरिप्रकाश राठी

सोलमेट्स - डॉ नाज़िया नईम

उपन्यास - अंश

शर्मिष्ठा
-  अणुशक्ति


बीती
किसी यात्रा में

रंगों में खुलती एक आह : आर्टेमिज़िया  - मनीषा कुलश्रॆष्ठ 


 

" हिन्दीनेस्ट के बैनर तले हम ‘कहानी’ पर तीन दिन की (9 – 10- 11 अप्रेल 2021) वर्कशॉप करने जा रहे हैं। जैसा कि पहले भी घोषणा में लिखा था कि कहानी के हर स्वरूप पर विशेषज्ञों की एक टीम हमारे साथ होगी।"
- साहित्यिक कथा लेखन
- ऑडियो माध्यम
- रेडियो कहानी
- फिल्म पटकथा
- नाट्य कथा
- ग्राफ़िक उपन्यास और कहानी
अब इसके लिये स्थानीय रजिस्ट्रेशन जयपुर से आमंत्रित हैं, रजिस्ट्रेशन लिंक नीचे दिये  बैनर पर है जल्दी ही हम कार्यक्रम के विवरण के साथ उपस्थित होंगे। प्रतिभागी और विशेषज्ञ नीचे दिये ई मेल पते और फोन नंबर पर संपर्क कर सकते हैं।

- 9911252907
 hindinest@gmail.com 
-संपादक हिंदीनेस्ट

 

विविध

लवलीन के पत्र  - किताब ‘‘इस पते पर कुछ चिट्ठियाँ ’’ - संपादक माधव राठौड़ से

प्रिय सत्यनारायण जी,

मन स्थिति शान्त है। जीवन भी हो जाएगा -

उम्मीद है कि कम से कम सतह पर कोई असमान्य विचलन नहीं दिखाई पड़ता। जिसके आप पिछली बार शिकार हुए थे। अपने आप को बेहद व्यस्त और कड़ी दिनचर्या में बांध लिया है। सब कुछ अन्तरंग हो -सब्लिमेट होकर सृजनात्मक स्तर पर ऊर्जा दे यही इच्छा है। कितनी अजीब बात है हम खुश होते हैं - सुखी होकर लिखते हैं। दुखी होते हैं तो मुक्ति पाने के लिये सब कुछ उतार फेंकने के लिये लिखते हैं। लम्बी कहानी लिख रही हूँ। अभी टुकड़ों में है। जम कर बैठूँगी एक दिन, तो खींच दूंगी। आत्म निर्भरता किस हद तक आत्म निर्भरता है, व्यक्ति का स्वायत्त होना कब कहाँ कैसे शुरू होता है। कैसे एक कॉम्पलेक्स से मुक्ति जब जीवन रीति के रूप में उतर जाती है - सायास अपने आप से लड़कर तब एक चित्त काम्पलेम्सिटी की शिकार नहीं हो जाती ? आपका क्या ख्याल है ?

सब सुलझता हुआ उलझता जा रहा है। अजीब है - इस प्रक्रिया में मन पोसरा हो मुलायम नहीं होता - भारी बोझिल - उदास कर जाता है। आज कल अभ्यास कर रही हूँ, चुप्पी का अभ्यास। बहुत समय पहले पढ़ा हुआ एक सुभाषित याद आता है ‘‘वाचोगुप्ति’’ वचन का समय। शब्दों को, कथनी को व्यर्थ ही न उगले तो आधी समस्याऐं सुलझ सकती हैं। आपके चुप रहने की गम्भीरता समझ में आने लगी है। धिक्कार है - आदि कथनों का मतलब भी।
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रस और आग की जुगलबंदी  - रोहिणी अग्रवाल
 

लेख

एक थी माया - गरिमा श्रीवास्तव

आत्मा की हत्या  - डा. विनय कुमार

भारत में राष्ट्रवाद - रविन्द्र नाथ टैगोर, हिंदी अनुवाद- डॉ.परितोष मालवीय

 


 

 

 

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