तीन कविताएं

मात्र एक उत्सव

प्रेम

पीले पत्तों का सैलाब

प्रिज़्म

स्मृति कोष

उर्वरता

प्रकृति अपनी–अपनी

पलाश के जंगल

नये साल की पहली किरण

नदी

रोक लो प्रेम को तिकोना होने से

दंश

तोता

जोगिया – पल

छवि

छलाव

गुज़रना उस हरे–भरे मोड़ से

खोई हुई आग की तलाश

कल फिर गांव से गुज़रेगी रेल

मानसून

सादा दिल औरत के जटिल सपने

कठपुतली जो चिड़िया होना चाहती थी

साधना कक्ष

आज का विचार

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आज का शब्द

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