दो छोटी रूमानी कविताएं

कच्चा आंगन

क्यों नहीं जन्मे हम एक शलभ की तरह

एकान्त

एकरसता

एक मार्मिक छोर : एक हार

एक पोट्रेट

एक धागा हताशा का

नव वर्ष

एक दिन प्रकृति के संग भी

बिखरे पुष्प की गंध

एक छोटी सी उड़ान

एक औरत के गुनाह

एक औरत के यकीन

एक औरत की पुकार

उसकी प्रकृति है मां होना

पारदर्शी

उल्लास की विलुप्त नदी

इसी ज़मीन का मौसम

इस पल

इतना भी क्या कम है?

हरे भरे मन की थाह

क्या आज भी ?

और फिर

आज का विचार

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आज का शब्द

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