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डायरी के पन्नों से : ‘लहर' और प्रकाश जैन 

हेमंत शेष

गर प्रकाश जैन होते तो 28 अगस्त को 93 साल के हो जाते! अजमेर शहर, मासिक पत्रिका  लहरऔर इसके सम्पादक प्रकाश जैन तीनों, कोई अलग अलग तीन शब्द नहीं- पर्याय थे | ‘लहरका हिंदी की श्रेष्ठतर और गंभीर साहित्यिक पत्रिकाओं में तब जो स्थान था उसे कोई पुराना साहित्यिक नहीं भूल सकता क्यों कि तब लहरमें छपने का अर्थ बस एक ही था : समकालीन साहित्य में लेखक के तौर पर स्थापित हो जाना |

यह महज़ एक पत्रिका नहीं मिशन था- प्रकाश जी के जीवन का मिशन, एक ऐसा कठिन यज्ञ, जिसे वह और उनकी सहयोगी मनमोहिनी, हर तरह के संकट और बाधाओं से जूझते हुए हर महीने पूरा किया करते थे|

जो लोग राजस्थान की साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास से परिचित हैं वे यह याद कर लेंगे कि लहरनाम की पत्रिका सबसे पहले मार्च १९४८ में जोधपुर से जगदीश ललवानी और लक्ष्मीमल्ल सिंघवी ने निकाली थी| राजस्थान की पत्रकारिता के इतिहास पर महत्वपूर्ण शोध करने वाले डॉ. महेंद्र मधुप  के अनुसार- इसने राजस्थान की बिखरी हुई साहित्यिक गतिविधियों, रचनाकारों एवं विचारकों को एक मंच पर एकत्रित करने का साहसिक प्रयास किया |” बाद  में  प्रकाशजी ने इसी नाम से जुलाई १९५७ में अजमेर से 'लहर ' का संपादन-प्रकाशन शुरू किया महेंद्र मधुप का कहना ठीक है कि उस जोधपुर लहर और अजमेर लहर में, नाम के सिवा कोई और बात 'कौमन' न थी!

बहरहाल बात अगर लहरकी चली है तो क्यों न महेंद्र मधुप के शब्द ही याद कर लिए जाएं- “ ‘लहरके प्रकाशन से अजमेर भी लखनऊ, वाराणसी, दिल्ली, और कलकत्ता की तरह हिन्दी की साहित्यिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया| शुद्ध श्रमजीवी साहित्यिक पत्रिकाओं एवं १९५७ उपरांत हिन्दी साहित्य के विकास का अध्ययन करना हो तो इसकी कहानी लहरकी जुबानी सुनी जा सकती है |....”

अपने प्रकाशन के नवें महीने में प्रकाश जैन ने जिस व्यक्तिगत हस्ताक्षर को लहरके सम्पादन से (औपचारिक तौर पर) जोड़ा- वह और कोई नहीं, उनकी दूसरी जीवन संगिनी मनमोहिनी थी! मनमोहिनी जी और प्रकाश जी की प्रेमकथा का मेरे लहर-प्रसंग से सीधा कोई सम्बन्ध नहीं है, किन्तु प्रकाश जी अगर लेखकों को लम्बे 2 ख़त लिखवाना चाहते तो इसी सहकर्मी की ओर ताकते होंगे, क्यों कि प्रकाश जैन पृथ्वी पर ये क़सम खा कर अवतरित हुए थे कि वह लेखकों को संसार के सबसे छोटे पत्र लिखने का एक सम्पादकीय कीर्तिमान बनाएँगे|

स्व. प्रकाश जैन के सम्मान में अकादमी अध्यक्ष प्रकाश 'आतुर' ने मनमोहिनी जी के आतिथ्य सम्पादन में जो स्मृति अंक निकाला था- उसमें अन्यों के साथ इन पंक्तियों के लेखक का पत्र- जिसमें दर्ज था ये तथ्य - कि प्रकाश जैन के सम्पादन में हेमंत शेष की पहली कविता 'लहर' में ही छपी थी-

भाई , चुप क्यों ? फ़ौरन कवितायेँ भेजो|” “प्रिय हेमंत, कविता चाहिए|” ‘भाई कविता कहाँ है?’ 'प्रिय हेमंत, जो लिखा हो- भेजो|" “ रचना भेज दो| अंक रुका है|” या हेमंत....???????” जैसी पचासों नहीं शताधिक चिट्ठियां मेरे संकलन में थीं- ज़्यादातर पोस्ट कार्ड्स ही | सब या तो कविता मांगने, कोई आलेख लिखवाने या 'लहर' में सांस्कृतिक गतिविधियों का नया स्तम्भ शुरू करने से सम्बंधित!

पर प्रकाश जैन के साफ-सुथरे हस्तलेख से से शायद १९८४ की उस नामुराद बारिश की कोई दुश्मनी, पुराने जन्मों की शत्रुता ही रही होगी| हम तब सी-स्कीम वाले घर में, जो लोग आज तक भी मेरा स्थाई पता मानते हैं, रहते थे| उस दिन की भयानक प्रलयन्कारी बाढ़ ने जयपुर को कुछ ही घंटों में पूरा धो डाला थाजहाँ मेरी किताबें और दूसरे कागज़ात पड़े थे छत टपकने लगी| मैं जब तक घर लौट कर अपने कमरे के कागज़ आदिसमेटता, वे लगभग लुगदी में बदलने को थे|

प्रकाश जी की चिट्ठियों का बण्डल ऊपर 2 ही रखा था| वह उस बाढ़ के दिन मिट्टी के लौंदे की तरह गल गया| बाद में हीटर से जितना सुखाया जा सकता था सुखाया भी... पर जयपुर की बाढ़ की मेरी सबसे दुखांत स्मृति में प्रकाश जैन के लिखे वे पोस्टकार्ड ही हैं, जो उस दिन धुल गए |

अब सोचता हूँ- क्या हुआ जो प्रकाश जी का हस्तलेख भीग गया- वह अपनी समूची साबुत शख्सियत के साथ मेरे ज़हन में फिर वैसे ही उभर आये हैं- जैसे लहरके कचहरी रोड वाले दफ्तर की नीली खिड़कियाँ- जहाँ मैं उनसे ऊपर की मंजिल पर पहली बार मिला था !

चिठ्ठी-पत्री तो निर्बाध रूप से चलती ही रहती थी, एक दिन प्रकाश जैन साहब से फोन पर बात हुई और तय हुआ- हम अजमेर में मिलेंगे|

"तुम जहाँ ठहरे हो, वहां सर्किट हाउस से कचहरी रोड- 'लहर' का दफ्तर बहुत दूर नहीं| वहीं आ जाओ| अभी तो मैं घर पर हूँ...पर दफ्तर पहुँच रहा हूँ .." उन्होंने कहा|

जब एक ऑटो पकड़ कर उनसे भेंट करने कचहरी रोड पहुंचा- तो दफ्तर के नीचे हिन्दी की सबसे सर्जनात्मक पत्रिकाओं में से एक 'लहर' का वह स्नेही संपादक सामान्य से सफ़ेद शर्ट-पेंट में अपने चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान लिए मेरा इंतज़ार कर रहा था- जिसे लोग दम्भी, घमंडी, निष्ठुर, मनमौजी, न जाने क्या क्या कहते, किन-किन अजीबोगरीब संज्ञाओं से विभूषित करते आये थे| अपनी पत्रिका में राजस्थान के लेखकों को छापने से उन्हें सख्त परहेज़ है, ऐसी भी छवि थी उनकी|

'लहर' का साइनबोर्ड जिस बिल्डिंग पर लगा था, उसकी खिड़कियाँ नीले रंग की थीं और बाहर महात्मा गाँधी रोड के भीड़ और शोर शराबे से लकदक बाज़ार में खुलतीं थीं- सीढ़ियाँ कुछ ऊंची ऊंची सी थीं, पर अभ्यासजन्य तेज़ी से उन पर चढ़ते वह मुझे अपने दफ्तर में ले आये|

....और तब मैंने देखा- वह बड़ा सा कमरा लगभग छत तक कागजों और 'लहर' के अंकों के अलावा अन्य पत्र-पत्रिकाओं के अंकों से भी लदा हुआ था| सारे भारत से उनके यहाँ लेखकों के ख़त आते थे और देश के कोने- कोने से रचनाएं!

चाय नीचे की किसी दूकान से मंगवाई गई| दुनिया भर की बातचीत होने लगी-ज्यादातर बातें साहित्यऔर कविताओं पर केन्द्रित थी| दुपहर का वक़्त हो चला|  "तुम्हें आज खाना मेरे साथ ही खाना है- " उन्होंने आदेशात्मक लहजे में अचानक कहामैं स्वभाव से संकोची हूँ और जहाँ तक मुमकिन हो, अक्सर भोजन के आमंत्रण टालता हूँ- पर यों उनके मैत्रीपूर्ण निमंत्रण को अस्वीकारने की अशिष्ट हिम्मत न थी तो उनके साथ होने के सिवा कोई चारा न बचा|

चलते-चलाते प्रकाशजी ने मुझे उस विकट ढेर से खोज खोज कर 'लहर' के कई विशेषांक भेंट किये- जिनमें 'युद्ध विशेषांक'(जनवरी-1966) ' दो कविता-विशेषांक-1966-67 ' 'महानगर विशेषांक', 'नवलेखन' विशेषांक सरीखे कई बहुचर्चित और दुर्लभ अंक थे|

बाहर धूप में तेज़ी थी| पर उनका घर 'लहर' के दफ्तर से ज्यादा दूर न था| एक 'शॉर्ट कट' से रेल की पटरियों को उलान्घते हुए वह मुझे अपने घर पैदल ही ले गए जहाँ मनमोहिनी जी स्वादिष्ट खाना बना कर हमारी बाट जोह रहीं थी| (दफ्तर आते हुए वह उन्हें भोजन बनाने को कह आये थे|) वह भी मुझ से बड़े वात्सल्यपूर्ण आत्मीय भाव से मिलींएक नए लेखक और एक प्रतिष्ठित संपादक के बीच उस भेंट के बाद जो संपर्क बना वह बरसों कायम रहा और प्रगाढ़तर हुआ | प्रकाश जी उम्र औरअनुभव के फासलों को उलांघते जिसे भी अपना लेखक और दोस्त मानते और चाहते थे- वह उसकी पूरी इज्ज़त करते थे| स्नेह और मैत्री की गर्मी उस दृष्टिवान संपादक में इतनी थी कि बस! रचना भेजने के लिए उनके एक एक लाइनों के पोस्टकार्डों की बरसात से मुझ से ज्यादा भला और कौन भीगा होगा?

उनके परिजनों, मित्रों और प्रशंसकों की घनघोर नाराजगी का जोखिम उठाते भी मुझे अपनी ये स्पष्टवादिता खुद क्षम्य लग रही है कि प्रकाश जैन कभी भी एक सशक्त कवि या बिन्दु-संपादक नन्द चतुर्वेदी जैसा प्रीतिकर और बहुत जानदार गद्य लिखने वाले रचनाकार नहीं लगे| उनका काव्य-संकलन 'कभी कभी ', वीर सक्सेना के एक प्रशंसात्मक आलेख, 'मधुमती' के विशेषांक में छपी उनकी प्रमुख रचनाओं, उन पर बाद में एक बेहतरीन ढंग से छपे स्मृति-ग्रन्थ में संकलित सारी कविताओं तक में| देखा जाय तो हिंदी कविता की मुख्य धारा के कवि वह कभी भी नहीं रहे- क्यों कि उनकी कविता में (इस अज्ञानी की विनम्र राय में) एक व्यक्तिगत आर्तनाद, बेचैनी, अवसाद, चीज़ों के पकड़ से छूटने आदि का कष्ट, पछतावा आदि आदि भाव तो बेहद स्पष्ट और अक्सर सीधी सपाट अकलात्मक प्रतिक्रिया की शक्ल में दीखते हों, कविता नहीं है- शिल्प के प्रति सावधानी या फॉर्म की नवीनता तो बिलकुल नहीं! गद्य भी वह आपद्धर्म की तरह लिखते रहे- उतना भर, जितना एक सम्पादक सरसरे तौर पर अपने अंकों की सामग्री की सूचना देते फौरी तौर पर लिखता है; इस के बावजूद अगर भारत भर के लेखक 'लहर, पोस्ट बौक्स 82, कचहरी रोड , अजमेर ' के पते पर अपना श्रेष्ठ लेखन बराबर भेजा करते थे तो यह एक उत्कृष्ट पत्रिका के अत्यंत समझदार विवेकशील सम्पादक पर उनके भरोसे का द्योतक थी|

उन्हें हजारों रचनाओं में से खरे और खोटे की विवेक की अप्रतिम पहचान थे| नए, संभावनाशील बनते या अच्छे लेखक को वह नींद में भी सूंघ सकते थे| दुर्गाप्रसाद अग्रवाल का कहना ठीक है कि वह अपनी निगाह रचना पर रखते थे- रचनाकार पर उतनी नहीं| वह किसी को महज़ इस कारण अपनी पत्रिका में जगह नहीं देते थे कि वह राजस्थान का निवासी है. उनके लिए रचना महत्वपूर्ण थी, न कि निवास का प्रमाण पत्र." अगर उदाहरण देना ज़रूरी हो तो मेरी बाद की पीढ़ी के या आज की नयी पीढ़ी के निर्माणाधीन लोगों को ये बताना मुझे अच्छा लगेगा कि जनवरी-फरवरी १९६१ के 'कवितांक' में शरीक लेखकों को देखिये| इस अंक की (आंशिक) लेखक-सूची ही उन्हें बेहोश करने को काफी होगी|

अज्ञेय, त्रिलोचन, मलयज, लक्ष्मीकांत वर्मा, जगदीश गुप्त, दूधनाथ सिंह, विष्णुचन्द्र शर्मा, श्रीराम वर्मा, विजयदेव नारायण साही, कुंवर नारायण, विपिन कुमार अग्रवाल, शिवकुटी लाल वर्मा, शम्भुनाथ सिंह, रामस्वरूप चतुर्वेदी, शमशेर बहादुर सिंह, डॉ. रघुवंश, श्रीकांत वर्मा, रांगेय राघव, राजकमल चौधरी, भुवनेश्वर, अशोक वाजपेयी, गिरिजा कुमार माथुर, जगदीश चतुर्वेदी, प्रेमलता वर्मा वगैरह 2 से लगा कर अनुवादों में- डब्ल्यू .एच. औडेन, रॉबर्ट फ्रॉस्ट, कॉनरेड आइकेन, ई ई कमिंग्स, गुसेप उन्गारत्ती, एलिजाबेथ ज़ेनिन्ग्ज़ आदि आदि तक बेहद आर्थिक कष्ट और अनगिनत सामाजिक- पारिवारिक कठिनाइयां झेलते भी अगर इस जुझारू सम्पादक ने अपना पूरा जीवन, एक पत्रिका 'लहर' को खड़ा करने में , उसे साहित्यिक मारकाट के दृश्यों के बीच एक अपराजित योद्धा के ध्वज की तरह ऊंचा उठाए रखने में लगाया, तो यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है|

****

जब अपनी तितर बितर डायरी में प्रकाश जैन की स्मृतियाँ लिखने बैठा ही हूँ तो इसी प्रसंग में जयपुर की एकाध गोष्ठी की कुछ पुरानी यादें भी बरबस ही ताज़ा हो गईं | सन सत्तर का ज़माना था| (सुरेन्द्र भारतीय द्वारा सम्पादित पत्रिका आयाम’ ( जिसका बस एक अंक ही निकल पाया) में छपे ताराप्रकाश जोशी के एक आलेख और राधेश्याम शर्मा के अखबार क्रोंचकी साहित्यिक-खबर से ज्ञात हो रहा है)- किस्सा नवम्बर 1970 का है| तब वीर सक्सेना, भारतरत्न भार्गव, और ताराप्रकाश जोशी सरीखे कई लोग अपेक्षाकृत और जवान और ऊर्जावान हुआ करते थे और साहित्य के अलावा स्थानीय साहित्यिक-राजनीति की हलचलों से खुद को जोड़े रखने के लिए भी उतने ही उत्सुक भी  थे| कॉफ़ी-हाउस, मिर्ज़ा इस्माइल रोड, पर (किसी भी दूसरे शहर की तरह ही) जयपुर के लेखकों, पत्रकारों, चित्रकारों और रंगकर्मियों  आदि के बीच, बेहद लोकप्रिय जगह थी| जगह शहर के बीच थी, कहीं से भी पहुंचा जा सकता था- कॉफ़ी के बस एक प्याले पर घंटों वक्त गुज़ारने के लिए एक मुफीद जगह| वहां के बैरे तक नियमित आने वाले लेखकों आदि को उनकी रचनाओं समेत  पहचानते थे| बेहद दुबले-पतले किन्तु खतरनाक रूप से बोल्डराधेश्याम शर्मा, तब एक साप्ताहिक अखबार क्रोंचके संपादक-प्रकाशक थे|

(सौभाग्य से वह हमारे बीच मालवीय नगर में आज भी हैं) युवा, जोशीले और अक्सर मांसाहारी गालियों से बात करने वाले| उनका शब्दकोष बड़ा विस्तृत था- लिहाज़ा गुस्से में भी एक गाली कभी रिपीट नहीं करते थे| करौली से आये थे और अपने अखबार में हर अंक में अन्यान्य कारणों से अक्सर पी डब्ल्यू डी सरीखे महकमों के किसी न किसी भ्रष्ट इंजीनियर की तगड़ी  खाल-खिंचाईके लिए जाने जाते थे| (पारिवारिक कारणों से, वह आज भी मेरे बहुत अजीज़ हैं, और पूर्ववत बड़ा सम्मान और प्यार करते हैं) पर बहुत से साप्ताहिक पत्रकारों की तुलना में राधेश्याम जी को साहित्य और कलाओं में भी दिलचस्पी थी| नवम्बर के आखिरी सप्ताह में इन्हीं ने अपने अखबार के तत्वावधान में कॉफ़ी हाउस के प्रथम तल पर अवस्थित हौल में उसी एक कवि-गोष्ठी का आयोजन किया जिसकी चर्चा हम कर रहे हैं| पच्चीस-तीस नए, अज्ञात-कुलशील कवियों और दस-बीस मूर्धन्यों को ले कर सर्दियों की एक शाम वह काव्य-गोष्ठी रखी गयी|

जहाँ तक  मेरी  याददाश्त  का घोड़ा दौड़ता है, उस  गोष्ठी  का  संयोजन वीर सक्सेना या  भारतरत्न भार्गव में से किसी एक ने अपनी पेटेंट (गोष्ठी-संयोजन) शब्दावली के साथ की थी- अध्यक्ष के रूप में तब ताराप्रकाश जोशी- (सिटी मजिस्ट्रेट होने के नाते भी) कार्यक्रमों की अध्यक्षता आदि  कामों  के  लिए बड़े मुफीद और सर्व-सुलभ साहित्यकार थे|

वह सदा अपने धाराप्रवाह भाषणों के साथ विभिन्न साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शिरकत करते थे| साहित्य उनका एकमात्र व्यसन था| मैंने अपनी आँखों  से  देखा  है- एक दफा राजस्थान विश्वविद्यालय के ऐन सामने, जब छात्रों  के दो गुट आपस में भिड़ रहे थे- और पुलिस, ‘आगे के निर्देशों की प्राप्ति के लिए अपने ऑन ड्यूटी सिटी-मजिस्ट्रेट साहब की विकलतापूर्वक खोज कर रही थी, ताराप्रकाश जोशी हम कुछ नौजवानों से घिरे, अपनी सरकारी जीप सड़क किनारे लगवा कर चाय की थडी पर सार्त्र के लेखन की श्रेष्ठता पर धुआंधार प्रवचन कर रहे थे|

वह हर बार विश्व के सर्वश्रेष्ठ कवियों की अपनी सूची बदलते रहते थे- कभी उनकी निगाह में काजी नजरुल इस्लाम विश्व के सर्वश्रेष्ठ कवि हो जाते तो कभी रवींद्रनाथ टैगोर, कभी कोई अज्ञात अफ्रीकी कवियित्री जोशी जी के मूल्यांकन  की पहली पायदान पर  आ जाती तो कभी कोई बिलकुल ही स्थानीय कवि

बहरहाल, लुब्बे लुबाब ये कि उस शाम गोष्ठी हुई और  खूब  हुई- वह बहुत  देर  आधी रात के बाद तक चली क्यों कि कवि ज्यादा थे-श्रोता कम... वरिष्ट लेखकों ने अद्वितीय संयम का परिचय देते अपनी रचनाएं कम  सुनाईं- नयों को पूरी उत्सुकता से सुना | मुझे याद नहीं उस शाम और किस-किस  ने कविता-पाठ किया पर मेरे जैसे मामूली कवि के लिए कहीं भी किया  जाने   वाला   यकीनन वह पहला काव्य-पाठ था| गोविन्द माथुर, राजा राकेश, पुरुषोत्तम सैनी, सुरेन्द्र भारतीय, मंजुल उपाध्याय, वसंत वसु, वसुधाकर गोस्वामी, श्रीकांत मंजुल’, मंजु बाफना, सुबोध मैनी, अशोक माथुर, चंद्रप्रकाश सरना, ओम सैनी, सुमित्रा सहारण आदि आदि  कुछ नाम हैं जो अभी तुरंत याद आ रहे  हैं| तेजसिंह जोधा की राजस्थानी कविता म्हारा बाप और हेमंत शेष की लम्बी हिंदी कविता को भरपूर सराहा गया| इतनी वाहवाही की मैंने सच कभी उम्मीद न की थी- वह मेरे आरंभिक छात्र जीवन की दो-तीन-चार  पेज लम्बी पहली रचना थी- पतझड़ से साक्षात्कार पर”|

ये वे  दिन थे जब गुटबाज़ी, गेंग-निर्माण, और आपसी पूर्वाग्रहों का केन्सर शहर में फैला न था| अच्छी कविता लोग ईमानदारी से सुनते और प्यार से सराहते थे- इस बात   पर  बिना  ध्यान  दिए  कि   वह लिखी किसने है? राधेश्याम शर्मा क्रोंचकी कोशिश कुछ इस तरह असाधारण रूप  से सफल  हुई जिसका खुद उन्हें इल्हाम न था| शहर के आकाश पर इतने धूमकेतुओं का एक धमाके से अचानक उदय हुआ था| नए कवियों की इस गोष्ठी की खबर बम के धमाके की तरह जयपुर से बाहर अलवर, अजमेर, बीकानेर, उदयपुर तक भी फैल गयी| इस खबर का अजमेर तक भी जाना था  कि प्रकाश जैन के भी कान खड़े हुए (और दो-चार भरोसेमंद दोस्तों से बाकायदा ये इत्मीनान करने के बाद कि पढी गयी रचनाओं  में  से कुछ  सचमुच  अच्छी भी थीं) , प्रकाश जैन ने खुद पत्र लिख पर लहरके लिए दो कवियों से रचनाएं मांगीं- 18 साल की उम्र में पतझड़ से साक्षात्कार पर मेरी पहली कविता को लहरके अगस्त 1970 अंक में  जगह मिली| ये कहना वास्तव में सही नहीं कि प्रकाश जी डिक्टेटरसंपादक थे मेरी राय में वह बस रचना देखते थे- रचनाकार को नहीं- जैसा पहले भी हम लिख आये हैं|

तेजसिंह जोधा, तब नागौर के रणसीसर गाँव से आ कर जयपुर में हिन्दी एम्. ए.के विद्यार्थी भर थे- नन्द भारद्वाज, प्रेमचंद्र गोस्वामी और शायद पूरण शर्मा के साथ पढ़ने  वाले| किन्तु मुझे आज  भी लगता है जैसी कविता तब तेजसिंह लिख  रहे  थे- अगर वह अपना लेखन-क्रम बनाये रखते तो आज राजस्थानी साहित्य, खास तौर पर कविता के बेनाम बादशाह होते| मदिरातिरेक ने उनकी असामान्य प्रतिभा, साहित्य-विवेक और लेखन-ऊर्जा को  बहुत जल्दी निगल  लिया और अंतत: वह डीडवाना के सरकारी कॉलेज के एक हिन्दी प्राध्यापक भर हो कर रह गए| ‘लहर के सितम्बर  १९७० अंक में प्रकाशित कविता कहीं कुछ  हो  गया   है और मार्च १९७२ के अंक में लहरमें प्रकाशित उनकी मूल राजस्थानी कविता- म्हारा बाप’ (जिन दोनों ही का हिन्दी तर्जुमा भी प्रकाश जैन ने साथ 2 छापा) जैसी कवितायेँ राजस्थानी की आधुनिक कविताओं के लिए आज  भी  एक  मानक  हैं और तेजसिंह जोधा अपनी बस इन्हीं दो कविताओं के दम पर बहुत  से राजस्थानी / मारवाड़ी कवियों  को  काव्य-लेखन की कोचिंग क्लास चला कर एडमिशन दे सकते हैं....

आगे का हिस्सा थोड़ा और रोचक है | ‘क्रोंचको अगर अगले कुछ अंकों  के लिए छापने  की  सामग्री अयाचित रूप से मिल गयी  वहीं जोशीजी एन्ड पार्टी को लगा- जयपुर  से हिंदी कविता को युवा-कविता का एक नया आन्दोलन तक भी दिया  जा  सकता है| तब के कवियों की कविता के मिजाज़को ध्यान  रखते हुए बाकायदा एक नाम सोचा गया- क्रुद्ध कविता आन्दोलन| इस से पहले भी हिंदी कविता ने १८६० आन्दोलन झेले थे और सब मशरूमी-आंदोलनों का हश्र  सामने  था, पर ताराप्रकाश जी ने बला की फुर्ती प्रदर्शित करते स्थानीय अख़बारों और पत्रिकाओं में जोशीलेलेख लिख-लिख कर इस नए आन्दोलन को स्थापित करने में एड़ी चोटी का जोर लगा डाला| आनन-फानन में कुछ अति-उत्साही युवतर दोस्तों ने तो अपनी लघु-पत्रिकाएँ तक निकाल डालीं | सुरेन्द्र भारतीय ने, जो साधुओं जैसी काली दाढ़ी-मूंछें बढाए सफ़ेद कुरते-पायजामे में बजाज नगर की मुख्य सड़क पर एक मेडिकल स्टोर में बैठते या उसे शायद खुद चलाया करते थे, ‘आयामनाम की  लघु-पत्रिका गोविन्द माथुर और पुरुषोत्तम सैनी को साथ ले कर शुरू की, वहीं, डॉ. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय के चिरंजीव मंजुल उपाध्याय ने हमनामक पत्रिका| मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहे छात्र-कवि राजा राकेश कैसे पीछे  रहते? लगे हाथों उन्होंने भी नवचिंतननामक नई पत्रिका शुरू कर डाली| तभी जनसंपर्क विभाग में कार्यरत कवि श्रीकांत मंजुलको भी जोश आया और उन्होंने भी शररशीर्षक से एक कविता-पत्रिका का बाकायदा संपादन आरम्भ कर दिया|

ताराप्रकाश जोशी जी ने आयाम के प्रवेशांक में एक लेख लिखा- क्रुद्ध कविता: एक आक्रामक शुरूआत’- जिसमें राजा राकेश, किशन दाधीच, वसंत वसु, ओम सैनी, कुमारी मंजु, पुरुषोत्तम  सैनी, वसुधाकर  गोस्वामी, अशोक कुमार माथुर, गोविन्द माथुर आदि की कविताओं के अंश उद्धृत करते हुए ये स्थापित करने की कोशिश की गयी कि कैसे क्रुद्ध कविता आम आदमी की, सड़क की कविता है | ताराप्रकाश जी ने अपने आलेख का समापन इन पंक्तियों  के साथ किया –“ मेरा यह विश्वास है कि अन्य साहित्यिक आन्दोलनों से भिन्न भाव-भूमि पर स्थापित  होने के कारण क्रुद्ध कविता का आन्दोलन चिरंजीवी होगा और जनता को यातना-शिविरों से मुक्ति दिलाने में अपनी ऐतिहासिक भूमिका दिलवाएगा|”

एक स्थानीय साप्ताहिक में साक्षात्कार देते ताराप्रकाश जोशी ने 'लहर' की चर्चा करते हुए जो बात कही थी, यथावत उधृत किया जाना प्रासंगिक है-

........" जहाँ तक ईमानदारी के स्वरों को बुलंद करने का प्रश्न है, मेरी मान्यता है, हमारी मिट्टी अभी इतनी बाँझ नहीं हुई कि ऐसे संपादक न मिलें| मैं स्वयं जानता हूँ कि राजकमल चौधरी, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, नागार्जुन, मुद्राराक्षस, गोपाल कृष्ण कौल, रमेश बक्शी, रमेश गौड़, कमलेश, विजेंद्र, वीर सक्सेना, भारतरत्न भार्गव, हरिराम आचार्य, रमेश शील, डॉ. जयसिंह नीरज, प्रकाश आतुर, नन्द चतुर्वेदी, नवलकिशोर, रणजीत, मरुधर मृदुल, ब्रजेन्द्र कौशिक, शांति भारद्वाज, ज्ञान भारिल्ल, मंगल सक्सेना, जनकराज पारीक, मनमोहन झा, रमेश सत्यार्थी, हरीश भदानी, आदि जैसे लोगों को बुलंदी के साथ प्रस्तुत करने का कार्य मासिक 'लहर' के सम्पादक प्रकाश जैन ने किया है| ऐसी ईमानदारी के स्वर बुलंद करने के अभियोग में प्रकाश जैन को अमानवीय यंत्रणाओं का शिकार होना पड़ा, और सेठों के हरम में पलने वाले चापलूसों ने जो सेठों की कै चाट कर जिंदा रहते हैं, प्रकाश जैन की पत्रिका को 'रखैल पत्रिका' कहा है| वक्त ने सिद्ध कर दिया है कि प्रकाश जैन हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों में सबसे प्रखर और ईमानदार हैं| मुझे विश्वास है कि प्रकाश जैन खतरे उठाने की अपनी परंपरा को बरक़रार रखते हुए 'क्रुद्ध कविता' आन्दोलन को जनता का आन्दोलन बनाने में आगे तक ले जाएंगे| 'राष्ट्रदूत' के साथ राजस्थान के अन्य दैनिक पत्र भी इसको जनता की रग-रग तक उतारने में सहायता करेंगे......"

बस दो-चार महीने ही चल पाया यह तथाकथित कविता-आन्दोलन दूध के उफान की तरह उभरा और एक कुकुरमुत्ते की तरह मुरझा गया पर जयपुर के साहित्य परिदृश्य में तब १९७०-१९७१ के सालों में इस कारण जो अभूतपूर्व खलबली मची वैसा बाद के सालों में बहुत कम देखने को आया| तेजसिंह जोधा शीत-समाधि में चले गए, किशन दाधीच गीत-सरता में लहरें गिनने लगे, बस गोविन्द माथुर, और इन पंक्तियों के लेखक के अलावा (यदा-कदा वसंत वसु भी - जैसा खुद उनका दावा है) कविता-लेखन में बचे रहे|

लहरऔर प्रकाश जैन के बहाने मेरे मन में उन दिनों का जैसा चित्र आया- मांडदिया है- ये अच्छा है या बुरा, मुझे पता नहीं, न प्रतिक्रियाओं की परवाह, पर मेरे प्रिय लेखक नन्द चतुर्वेदी मुझ से हर बार एक ही बात कहते थे- हमें अपने समकालीनों पर भी बराबर लिखना ही चाहिए, हेमंत”,

.....और वही मैंने इस लेख में भी किया है- नन्द बाबू- आप वहां बैठे इसे पढ़ तो रहे हैं न ?

 

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असदुल्लाह बेग

मैंने अपने लम्बे प्रशासनिक जीवन में अनेक ठाकुरों, ठकुरानियों, छुटभैय्ये ही सही- पर एक वक़्त के बड़े ज़मींदारों-जागीरदारों  और उनके दुर्भाग्यशाली वंशजों को बुरे वक्तों से दो-दो हाथ करते देखा है.  हैदराबाद, भोपाल, टीकमगढ़, पाली, जोधपुर, टोंक, लावा, जयपुर, उनियारा, मालपुरा, पचकौडिया, बाली, नाडौल, बागोर, इन्दरगढ, अचरोल, उदयपुर, प्रतापगढ़, चितौड, नागपुर के अनेक ठाकुरों और भूतपूर्व राजाओं रानियों से मिला हूँ कुछ को नज़दीक से भी देखा जाना है, तो संयोगवश कुछ से गहरी वाकफियत भी रही है पर यह मुलाक़ात हुई है हर बार इनके बीते हुए वैभव के साल-दर-साल उधड़ते हुए दयनीय चिथड़ों के साथ, बस ! हर बार मुझे ऐसे लोग बूढ़े, पहले से ज्यादा निस्तेज असहाय और लाचार नज़र आये हैं...

जयपुर और बीकानेर का हमारा खुद का राजगुरुपरिवार भी कोई अपवाद नहीं है- राजाशाही के वक्तों में हमारी आवंटित पट्टाशुदा विशाल भूमियों पर  अब  सब से महंगी रिहाइशी बस्तियां बसी हुई हैं... वे गाँव  जो कभी हमारे यशस्वी पूर्वजों की जागीर में थे, अब महानगरों का हिस्सा  हैं | आलम ये है कि अपने गुज़र-बसर के लिए यहाँ वहां प्राइवेट या सरकारी नौकरियां करने वाले आम शहरी में बदल चुके हमारे बेटे बेटियां तक इस बात को गप्प मानते हैं कि हमारे पूर्वज भी कभी धनवान थे ! हम भी अपने इस इतिहास को भूल गए हैं जैसे हमारे एक यशस्वी पूर्वज जाने माने मान्त्रिक-तांत्रिक शिरोमणि भट्ट (शिवानन्द गोस्वामी) चंदेरी के गवर्नर (सूबेदार) देवीसिंह बुंदेला के गुरु थे, जिन्होंने गोस्वामीजी से 'मंत्र-दीक्षा' लेकर भेंट में कुछ गांवों की जागीर बख्शी थी। इसी प्रकार ओरछा के सातवीं पीढ़ी के राजा देवीसिंह (1635-1641) ने भी इन शिरोमणि भट्ट की असाधारण विद्वत्ता से प्रभावित हो कर 4 ग्रामों की जागीर मध्यप्रदेश में दी थी। जयपुर के संस्थापक सवाई जयसिंह के पिता राजा विष्णुसिंह ने सन 1692-1694 ईस्वी में इन्हें रामजीपुरा (जिस पर आज जयपुर का सम्पूर्ण मालवीय नगर बना है), हरिवंशपुरा, चिमनपुरा और महापुरा ग्रामों की जागीर भेंट की थी, जिसका प्रमाण जयपुर के राजसी पोथीखानाके अभिलेख में आज भी सुरक्षित है । इसी मंशा का कोई ताम्रपत्र भी कहीं न कहीं है जो किसी अटाले में पड़ा धूल  खा रहा होगा.... जयपुर से 10 किलोमीटर दूर अजमेर रोड पर स्थित महापुरा ग्राम तो पूरा ही आज महानगर का ही अभिन्न भाग बन चुका है। इसी तरह बीकानेर के महाराजा अनूपसिंह (1669-98 ई.) द्वारा गोस्वामीजी को दो गांवों - पूलासर और चिलकोई की जागीर भेंट की गई थी।  शिवानन्द जी के बाद इनके पुत्रों ने भी अपनी कुल-परम्परा को अक्षुण्ण रखते हुए राज्याश्रय में अनेकानेक उपलब्धियां प्राप्त करना जारी रखा, जैसा बीकानेर आर्काइव्स (लालगढ़ पैलेस) में आज भी सुरक्षित एक अंग्रेज़ी दस्तावेज़ से सिद्ध होता है!

अखबार और इलेक्ट्रोनिक मीडिया वालों के बीच यह स्कूप बड़ा लोकप्रिय रहा है कि आज़ादी के बाद खास तौर पर प्रीवी-पर्स छीन जाने के बादहिंदुस्तान के बहुतेरे महापुरुषों/ राजपुरुषों- खुद महाराजाओं और महारानियों, नवाबों, बेगमों, निज़ामों, राजकुमारों और राजकुमारियों या उनके वारिसों की जिंदगियों का हाल आज कैसा है ज़ाहिर है वे सब अपने गए हुए ज़मानों की रंगीन यादों के सहारे अपने अच्छे या बुरे दिन काट रहे हैं....

 टोंक के नवाबों के वंशज अपवाद भला कैसे हो सकते हैं ?

बोलचाल में आम लोग यही तो कहते हैं न- समय बड़ा बलवान! यह कहावत टोंक के उन नवाबज़ादोंपर भी बखूबी चस्पां होती है- जिनके पूर्वज कभी किन्हीं  ज़मानों में टोंक रियासत के एकछत्र शासक रहे थे !

अनेक भूतपूर्व नवाबों राजाओं रानियों और ठाकुरों सब ने अपने जीवन-काल का सबसे अच्छा और सब से खराब वक़्त एक साथ  देखा और झेला  है | उनके राजपाट, उनके अधिकारसत्ताएँ एकाएक छीन ली गयीं देखते देखते अपार दौलतें हवा हो गयीं, महल, किले, हवेलियाँ, खेत-खलिहान, जागीरें और ज़मीनें पल भर में सरकारी संपत्तियां बन गयीं|

माना, ये संपत्तियां उनकी खुद की  गाढ़ी कमाई या खून पसीने से अर्जित जायदादें नहीं थीं, उन्हें संयोगवश परिवार-ए-खास में पैदा हो जाने के कारण बेशुमार दौलतें विरासत के बतौर प्राप्त हो गयीं थीं, यहाँ  तक तो ठीक था- पर कई राजपरिवार जो सोने के चम्मचों से पांच वक्त खाते थे और जिनके कपड़े-लत्ते तक हवाई जहाज़ों से कहीं और धुलने जाया करते उनमें से कई तो बाद में छोटे-मोटे सरकारी मुआवज़े  तक को  तरस गए ... सब कुछ गँवा देने के बावजूद उन्हें एन्यूटी या पेंशन जैसे अधिकारपाने के लिए कानूनों और कोर्ट-कचहरियों के मकड़जाल ने ताउम्र  उलझाये रखा, कुछ राजाओं को बाकायदा भीख मांग कर ज़िन्दगी चलानी पड़ी |

कुछ राजपरिवारों ने समय रहते राजनीति का पल्लू पकड़ा, जिसमें हर अच्छे बुरे आदमी का, सेवा-भाव, अनुभव या योग्यता के बिना भी बेधड़क दाखिला मुमकिन है, कुछ ने व्यापार-वाणिज्य के घाट पर अपने डूबते जहाजों को किसी तरह किनारे लगाना चाहा कुछ ने अपने किलों हवेलियों और निजी महलों को होटलों में बदलने वाले समूहों को बेचने में ही भलाई समझी... तो कुछ ने सब कुछ बेच कर भारत के बड़े शहरों या विदेश में जा बसने की जुगत की...आज भी ऐसे सेंकडों परिवार आज़ाद हिंदुस्तान में कहीं न कहीं मिल जायेंगे जो अपने पुराने गहने, आभूषण, सोना-चाँदी और महंगी कारें वगैरह बेच या गिरवी रख कर किसी तरह लगभग गुमनामी में अपने दुर्दिन यहाँ वहां जाने कहाँ-कहाँ काटते  आ रहे हैं !

एक वाकया बरबस याद आ रहा है - जिसे तब मैंने डायरी के पन्नों में कभी दर्ज कर लिया था

एक दिन सुबह सुबह इजलास में जाने से पहले चैंबर से निकला ही था कि रिक्शे में बैठ कर एक सज्जन मिलने आ पहुंचे | करीने से संवारी सफ़ेद झक्क-दाढ़ी सफाचट मूँछें, काली अचकन, सफ़ेद इस्तरी किया चूडीदार पायजामा, काली जूतियाँ, मुंह में पान की महकती हुई गिलौरी, होंठों पर कत्थे की सुर्खी, एक हाथ में छोटी सी आबनूस की छड़ी दूसरे हाथ में सवाईमाधोपुर में बनने वाली सुगन्धित खस के रेशों से बना हल्का सा भीगा पानदान ।

आते ही झुक कर कोर्निश की, आँखों में इजाज़त मांगने का सा भाव लिए छड़ी मेरी मेज़ पर आहिस्ता से टिकाई, अचकन की जेब से एक बेहद खूबसूरत छोटी सी शीशी निकाली, फिर दूसरी जेब से रुई का छोटा सा फोहा, और उसे हिना के इत्र में भिगो कर थोड़ा कमर झुका कर  मेरी तरफ बड़ी तहज़ीब से बढ़ा दिया. मैं इस अयाचित मेहमान की इस खुशबूदार दयानतदारी का मायना कुछ समझ पता उससे पहले ही कहने लगे : जनाबेआला! मेरा नाम है असदुल्लाह बेग और नाचीज़ की रिहाइश है बड़ा कुआं हम लोगों का ताल्लुक़ अंजुमन सोसाइटी खानदाने-अमीरिया से है ...आज सुबह ही मोतीबाग़ कब्रिस्तान में इस रियासत के पहले नवाब मरहूम अमीरुद्दौला साहेब की मुक़द्दस मज़ार पर हमारी तरफ से कुरानख्वानी की रस्म हुई है ...कलेक्ट्री पेंशन लेने आया था- सोचा उससे पहले  साहब-बहादुर का  दीदार कर ज़िन्दगी बना लूं... परसों ही कहीं सुना था शहरे-टोंक को आप जैसा खुशगवार और खूबसूरत हाकिम नसीब हुआ है ...चुनांचे हुज़ूर से ज़ाती तार्रुफ़ की गरज़ से ये खाक़सार सरे-इजलास हाज़िर है! ज़ाहिर था जनाब बड़े नाटकीय और बातूनी किस्म के थे पर थे सौ फी-सदी-खानदानी साहबज़ादे- जिन्हें बड़ी मामूली सी सरकारी पेंशन मिला करती थी और जो इसी को लेने कलेक्ट्री आये थे कि मामूली होने पर भी ये सरकारी पेंशन उनके नवाबी वारिस होने का पुख्ता सबूत थी !

मुझे याद नहीं उस पहली मुलाक़ात में ही उन भूतपूर्व नवाब साहब ने टोंक की तवारीख, यहाँ की रवायत, अपने खानदान के इतिहास, अपनी ज़ाती अरबी-फारसी  की तालीम, और शहर की  किन-किन खुसूसियतों पर मांगे बिना ही रोशनी डाली ( जो मेरे लिए बाद में बड़ी उपयोगी साबित हुई) ...जाते जाते वह मुझे एक शेर सुना कर अपने गरीबखानेपर  तशरीफ़ लाने की दोस्ताना दावत देना न  भूले !  मैं इस शहर की एक मोतबिर शक्सियत से अनायास परिचय पा कर खुश था.

इस मुलाक़ात के कई दिन बाद की बात है- तब हमारे पास मोबाइल वायरलैस  लगी एक नयी चमचमाती सफ़ेद सरकारी जिस्प्सी हुआ करती थी. दशहरा उत्सव के दौरान संकरे शहर के भीतर पहली बार किसी काम से जाना पड़ा... हर पुराने शहर की तरह यहाँ की अंदरूनी सड़कें और  गलियां बेहद संकरी और भीड़ भाड़ वाली हैं. जब बहुत देर तक पीं पीं पीं पीं करने के बावजूद एक मुस्लिम रिक्शाचालक तीन सवारियों को लादे किनारे न हुआ तो मिलिट्री से रिटायर हुए मेरे ड्राइवर मिट्ठूसिंह मीना ने आदतन गर्दन खिड़की से निकालते उसे झिड़का : मौलाना साहब ! आपकी दाढ़ी तो खूब लम्बी है पर कान नहीं हैं क्या ? दूसरे को भी रास्ता देने की भी रखी है  अपन ने!

 अत्यधिक साधारण लगभग मैले पुराने कपड़ों में रिक्शे वाले ने पलट कर जो ड्राइवर की और देखा तो मैं हक्का बक्का रह गया. खानदाने-अमीरिया से ताल्लुक़ रखने वाले दूसरे के रिक्शे पर सवार हो कर उस दिन पेंशन लेने आये साफ़-शफ्फाक़ पोशाक वाले असदुल्लाह बेग खुद ये रिक्शा हांक रहे थे....उन्हें इस असली सूरते-हाल में देख कर मुझे एक धक्का सा लगा!

 मैंने फ़ौरन रुमाल मुंह पर रख कर मुंह ऐसे फेर लिया जैसे मैंने पहले उन्हें कभी देखा या पहचाना ही न हो...टोंक में रहते हुए उस दिन के बाद इन सज्जन से दुबारा कभी मुलाक़ात नहीं हुई ....पर अतीत का सब कुछ भुला कर मेहनत मजदूरी से से रोजी रोटी कमाने की उनकी खुद्दारी को मैं आज तक नहीं भूल पाया हूँ ....

    -      हेमंत शेष जी के परिचय की कोई दरकार तो नहीं हम सभी जानते हैं कि वे प्रसिद्ध कवि हैं, पेंटर और फोटोग्राफर हैं। अनेक लोकप्रिय कविता-संकलन प्रकाशित हो चुके हैं। राजस्थान पत्रिका – इतवारी पत्रिका में नियमित स्तंभ लेखन किया है। उनके गद्य लेखन की रोचकता का कौन मुरीद नहीं। राजस्थान प्रशासनिक सेवा में काम करते हुर उनके अनुभवों में अनगिनत किस्से आए हैं। वे एक एनसायक्लोपीडिया हैं राजस्थान के ज़िलों के इतिहास का और तमाम प्राचीन ऎतिहासिक महत्व की इमारतों और स्थापत्य का। ‘कला-प्रयोजन’ के संपादक रहे हेमंत जी कलाओं में गहरे डूब चुके हैं.... आप उनसे संवाद करेंगे तो आप भी तिर तो न पाएंगे गहरे ही पैठेंगे।

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