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कभी तारीख में कभी खुद में

कालू लाल कुल्मी

3 अप्रैल 2015

बेगम अख्तर संगीत की साधक थी उनका जीवन उसी में लगा वे संगीत को बहुत बड़ी जमीन प्रदान करती हैं और संगीत उनको प्रेम को नया नाम देती हैं बेगम।
लाल सिंह दिल अपने जीवन को नया रंग देता हैं लेकिन उसको कहां पता था कि उसको यहां से केवल दुख ही मिलना हैं । वह भटकता रहा प्रेम के लिए भी तरसता रहा और रोजगार की कभी चिंता न की तो उसके पास एक ही बात थी कि उसके वह ऐसे ही भटकता रहा?
पाश की तरह था पर जीवन दूभर हो गया एक दिन यहां तो एक दिन वहां इस तरह भागता रहा जमाने ने भी उसको तड़पाया उसका जीवन एक दिन ऐसे ही चला गया और समाजवाद की बात करना उसके लिए आज भी वैसा ही हैं
जिंदगी से आग मांगी पर वह तो उसकी प्रियतमा ले गयी थी फिर उसको कहना था और वह कहता रहा पर उसका उसे कहीं पता न चला।


4 अप्रैल 2015 बैंगलोर

मन उदास था हवा भी गर्म पर उदासी का कारण तुम थी पर तुम तो शहर से बाहर थी वर्ना मैं तुमको बुला लेता। एक से बढ़कर एक था उसका गुस्सा पर शहर था कि गर्म। यह रवीश का शहर में इश्क होना कहां था ,वर्ना शहर तो मेरे साथ था मैं मगर वहां अकेला
इंसान के सपने टूटते तो वह उझड़े हुए शहर की तरह हो जाता हैं लूटा पिटा, खाली और तन्हा उसके पास कुछ भी नहीं होता। वह पतन के चरम पर होता हैं , सब और से निराश, हताश, ठगा सा। लेकिन जब वह सपनों पर सवार होता हैं तो वह उस शहर की तरह होता हैं जहां सब ठीक होता हैं जहां प्रेम मंे शहर को जी रहा होता हैं ,मन भी कमाल का जादूगर हैं पल से पल में क्या जादू कर देता हैं।
एक विजेता और एक पराजित में क्या फर्क होता हैं , दोनों के नजरिये में जो फर्क होता हैं वह उसमें था वह एक पराजित योद्धा था। योद्धा तो था पर था पराजित। इसी कारण उसे अपनी ताकत पर यकीन कम हो चला था। उसे सामना करना था उसका जो विजय कहा जा रहा था, ऐसी बाते करता हुआ वह आगे बढ़ रहा था, दरअसल उसकी प्रेमिका किसी के साथ भाग गई थी।


5 अप्रैल 2015 बैंगलोर

वह इस देश का सबसे प्रतापी इंसान था पर उसकी जेब भरी थी लेकिन उसके लोग उसकी तरफ देख रहे थे। सम्राट के पास धनजन योजना थी पर जन के पास धन कहां था?


6अप्रैल 2015 बैंगलोर

एक शब्द का जादू चला पर शब्द चला गया, दूर से सब चला लेकिन पास से कोई न चला, इस तरह चलता रहा सब और एक एक कर सब चले। वह चला गया पर कहां जाता?
एक खण्डहर में एक उदास आदमी बैठा था उसके पास इतना कुछ था कि वह उदास होकर भी उदास नहीं था। इस तरह उसकी उदासी में कई सवाल थे जिनकी उदासी में खण्डहर भी उदास था। वहां बहुत लोग आए जिनकी पे्रम कहानियां थी और उनका आधार पे्रम ही था पर एक दिन वे इस तरह उदास होकर चले गए। उनके पास घर की याद और पे्रम की उदासी दोनों थी जिसको वे इसी तरह जी रहे थे एक रोज उस खण्डहर में स्कूल के लड़के और लड़की आये वे भी ऐसे ही साथ चले और उनका साथ चलना किसी से कुछ करा सकता पर पे्रम को कौन रोक पाता? लेकिन वे ऐसे ही उदास होकर चले गए? उनको चाचा ने पकड़ लिया। कभी एक रानी इस खण्डहर में पे्रम के लिए तरस कर मर गई थी लेकिन एक दिन कोई दूसरी कहानी सुनाई गई। रानी तो अमर हो गई पे्रम के लिए। जबकि राजा के पास इतनी औरतें थी कि रानी के लिए उसके पास समय ही नहीं था?
पाजेब न भीगे या फिर तुम ऐसे न झूको याद करो अपनी बहादुरी के किस्से और यहां से वहां कुछ ऐसा करो कि सब कुछ बदल जाए। दुनियां में कितने ही उदास खंडहर हैं जहां जवान लोग अपनी उदासी तार तार करते हैं। उन खंडहरों को जवान करते हैं। वे इस तरह से उन खंडहरों में जवानी का इतिहास रच रहे होते हैं। कितने ही जल महल कितने ही पुराने किले पे्रम के गुजलार अड्डे हैं। जहां वे लोग जाते हैं जिनके पास पे्रम करने की जगह नहीं हैं । जहां कि समाज की पहुंच नहीं हैं । खंडहर के चुबन में कहते हैं जादू होता हैं । वर्ना किसको क्या पता कि पर जो लोग वहां गए वे यही कहते हैं। यह मेरे गांव का पुराना मंदिर था जहां अक्सर लोग जाते रहे मैं नहीं गया बचपन में पता नहीं क्यांे में स्त्री को पवित्र समझता था और चाहता था कि उसको कभी टच न करुं, बस कितनी ही पे्रमिकाएं चली गई। जबकि वे मुझे टच करना चाहती थी? वे चाहती थी कि मैं उनको हर जगह से टच करुं। फिर भी एक दिन मैं चला ही गया। उसको लेकर उस जगह जहां केवल नाद था। कभी-कभी आवाज आती थी। उस आवाज का गहरा सूर था। अंदर तक जाता था। उसने मुझे चुमा पर वह गायब थी।
मैं वहां से चला आया अपने खेत पर, आकर भैंस के बछड़े के पास बैठ गया, कुछ देर में मां आ गई।
एक दिन मैं उसके घर में गया वह अकेली थी वह चाहती थी कि मैं तभी आऊ जब वह अकेली हो, पर यह मौका बहुत कम मिलता। एक दिन आखिर मिल ही गया। मैंने उससे कहा क्या चलोगी मेरे साथ, बोली नहीं अंदर ही चलते हैं लेकिन उसकी मां उस दिन कहीं गई थी वापस आ गई और बैठी से कहने लगी चलो चलते हैं। ऐसे ही कब तक चलना था। मैंने उसको शर्ताे में उलझाया, पर वह कहां मानती, उसे तो अपने बाप की पड़ी थी। यह अजीब ही दौर था रात में मैं सोता नहीं उसको याद करता और चुंबन देता रहता? मंदिर की घंटिया या फिर अजान की आवाज मेरे कानों में पड़ती और मैं निकल जाता?


जिस तालाब पर मैं उसके साथ था वही तालाब सूख रहा था। उसने मुझे रास्ता बताया कि सूखे में चलना आसान होता हैं मैंने कहा सूखे में डूबना कैसे होगा, तुम तो चली जाओगी एक दिन मैं यहां से किस राह पर चलूंगा? तुम अगर पढ़ाई करती तो कुछ नहीं बिगड़ता, पर तुम तो केवल यहां नहाने आती हो? वह भी वस्त्रों में? तुम ऐसा क्यों करती हो! चलो अगर चलना चाहो तो?

रात में घाट पर कौन गा रहा था वह तुम ही गा रही थी जिसका गीत दर्द से भरा था और जिसमें रिदम का अहसास था, भौर हो रही थी और गीत का स्वर मदम हो रहा था। ऐसे ही उसको गीतों से बहुत प्यार था। उसका यार चला गया था दूर?



7 अप्रैल 2015 बैंगलोर

किसके बारे में लिखा जाए और क्यों लिखा जाए? साला सब बकवास हो गया हैं । उसने कहा था पर मैं कहता हूं कि क्यों कहा था? एक आदमी जिसके पास सब कुछ था और एक दिन उसके पास जितना कुछ था सब को छोड़कर चल देता हैं । उसके मन में एक विचार बैठ जाता हैं कि मैं कुछ नहीं हूं। फिर देखों उसके जीवन में क्या बचा रहता हैं वह सब कुछ से दूर चला जाता हैं उसको किसी बात का कोई दुख नहीं हैं । वह केवल जीता रहता हैं मरने के लिए, उसे जिंदगी और मौत में कहीं कोई फर्क लगता हो ऐसा नहीं हैं । उसका जीवन केवल मौत का इंतजार करता हैं । वो आदमी जो कल तक सत्ता का सपना देख रहा था। उसके पास आज जैसे कुछ भी नहीं था। यह उमाशंकर चैधरी की कहानी का नायक था। कम्पनी राजेश्वर सिंह का दुख। इंसान को खत्म होने में कितना वक्त लगता हैं । एक हंसता हुआ इंसान कब खत्म होने लगता हैं ? यह सदमा हो या फिर कोई दुख उसे खत्म कर देता हैं । वह चाहता क्या हैं और होता क्या हैं । बेटा चाहता था और हुई बेटिया यह दुख नहीं हैं दुख उसके अंदर बैठा हैं । जिसको उसने गांठ बंाध लिया? वह वहां से आगे कभी गया ही कहां? इसी कारण एक दिन जीवन से पलायन करते हुए वह चला गया मौत के आगौश में? यह दुख भी क्या हैं ? दुख तो आदमी को मांझता हैं पर यह कैसी पीड़ा हैं कि आदमी को खत्म कर देती हैं । वह जीवन से दूर चला जाता हैं । उसके लिए हर चीज का मतलब खत्म हो जाता हैं । कम्पनी को यह कहां पता था वह तो कहीं दूर चला गया जिसका कहीं कोई अर्थ ही नहीं था। मनुष्य मन का कौनसा कौना कब खाली हो जाए और उसमें कौन आकर बैठ जाए उसको भी कहां पता रहता हैं । एक दिन उसके पिता ने भी उसे ठुकरा दिया फिर वह कहां रहता कुछ भी। रहता भी तो क्या? वह अपने द्वारा ही ठुकराया जा चुका था। इस कारण उसका सब कुछ ठुकराया जा चुका था।
आज कल जो कहानिया लिखी जा रही हैं उनमें एक खास तरह का विचार हैं संघर्ष की कहानी स्त्री के दुखों की कथा। एक तरह की कहानी? जैसे शहर की कहानी के अलावा कोई कहानी हैं कहां?कुछ कहानीकार सेक्स पर लिखते हैं , कुछ स्त्री के सौंदर्य पर कुछ उसके शरीर पर तो कुछ उसके कामशास्त्र पर। कहां जा रहा हैं कहानी का कलेवर। कहीं शहर का अकेलापन हैं हैं तो कहीं गांव का विस्थापन तो कहीं उसका दुख हैं ? कहानी उस विराटता को कब समेट रही हैं जिसमें गांव का नक्शा भी सामने हो। जहां दर्द का बयान हो।



8 अप्रैल 2015 बैंगलोर

लम्हे ने खता की और सदियों ने सजा पाई


9 अप्रैल 2015

जिंदगी को नापने का कोई पैमाना बना होता तो कितना सुखद होता? जिंदगी का तापमान तो पता होता? उसके बाद यह भी खबर लगती रहती कि किसके पास रहने से उसमें इजाफा होता रहना हैं । गांधीजी की आत्मकथा सत्य के प्रयोग पढ़ रहा था। पहले पढने की चाह थी पर पढ़ नहीं पाया। जिसके पिता दीवान थे और वे समय से पहले चले गए। गुजरात के जूनागढ़ में पला यह गांधी सेक्स का दिवाना था पर बाद में उसका जीवन प्रयोग बनता जाता हैं । वह जैसे जिंदगी को प्रयोग में ढ़ालता हैं और ईश्वर की खोज में लगता हैं । धर्म उनके लिए अनिवार्य था और वह वकालात करते हुए लंदन से द अफ्रीका और भारत आते हैं। वह आदमी सत्य की बात बचपन से करता रहा और उसको निभाता रहा। उसके कारण अपना नुकसान भी खूब किया। समाज के साथ कब जुड़ता गया और कब उनका सामना करता गया इसका आभास उसे भी न हुआ होगा। लेकिन वकालात उनके लिए समाधान ही था वे चाहते यही थे और किया भी वही कि इससे लोगों को लाभ हो न कि नुकसान। गांधी ने इस देश के जन की नब्ज को पकड़ा था। एक आदमी कैसे बदलता हैं इसकी कहानी भी हैं । वह अपने प्रण पर रहता हैं और उसको साधता भी हैं ।


10 अप्रैल 2015 बैंगलौर

मन बहुत खाली रहता हैं । एक साथी की जरूरत महसूस होती हैं । लेकिन भटकन में साथ और साथी छूटते गए? घर से भी दूर निकलता आया और कई बार अपने से भी कहा और कहना चाहा खुद से लड़ा और लड़ता रहा। कभी मुक्तिबोध का पहाड़ पार करना तो कभी निराला का महिर पार करना याद आया। पर पार तो करना ही होगा? तभी सत्य की पड़ताल संभव होगी।
एक के बाद दूसरा और फिर कईं कुछ बढ़ता जाता। यह तेल की धार और फिर धार में कोई दूसरा ही रहता और इस तरह बहुत कुछ कहते हुए भी ठगाता गया तू और जमाना भी अजीब था पर फिर कहानी भी तो थी। इस तरह वह कहीं दूर चला गया। वर्ना वह एक के बाद दूसरा ही होता।


11अप्रैल बैंगलौर 2015

दुख जैसे जम गया आंसू थम गए? और सब भटक गया और उसमें एक के बाद दूसरा ठहर गया। जितना कुछ था उसका आधार केवल तुम थे या कि वे लोग जिनके कारण हम जिम्मेदार बने। यह अजीब कहानी हैं कि इसका सूत्रधार कोई और हैं और पात्र कोई? सजा किसको मिलती हैं पर इंसान को अपने दम पर करना होता हैं । पर उसको पुराना भी चुकाना होता हैं । जहां तक पुराने की बात हैं देवदास वही चुकाता हैं । लंदन में पढ़कर आया बंगाली सभ्य अपनी तमाम सीमाओं को लांघता हैं पर उसका पे्रम उसके घरवाले नकारते हैं और वह जाति का शिकार होता हैं । उसका पे्रम कभी मिटता नहीं वह स्वयं ही उस पर अपने को बलिदान कर देता हैं । यह वह दौर था जब आधुनिकता प्रवेश कर रही थी। पे्रम अपने को स्वतंत्र कर रहा था। तमाम गिरफत से आजाद कर रहा था। वह हत्या से बाहर जीवन की तरफ लौटने की समाज में जगह बना रहा था। देवदास का जीवन इसका उदाहरण हैं । पहले दोनों मरते थे इस बार एक ही। क्योंकि उसे उसका प्यार नहीं मिला। उसका प्यार उसके सामने से चला गया।बंगाल के आभिजात्य पर एक तमाचा हैं देवदास। कितना खोखला हैं वह समाज जो अपने को सभ्य कहता हैं । जिसके पास करने को सब कुछ हैं । लेकिन वह करता क्या हैं । अपने को ढ़ो रहा हैं वह समाज।



13 अप्रैल 2015 बैंगलोर

वह जमना थी पर एक दम तरल। जब पहली बार इस गांव की धरती पर पैर रखा तो लोग बताते कि उसके दिवानों की लाईन लग गई। उसकी सुंदरता के बारे में कहते हैं विश्वसुंदरियों को मात देती थी, गजब के नैन नक्स चाल के क्या कहने और उसकी नाभी तो कमाल की थी। जैसे भंवरा यही पिरो दिया गया हो। कई लोग तो उसकी नाभी को चुमना चाहते थे। वैसे उसके जलवे कोई कम नहीं थे। पूरे गांव में उसको गोली कहते थे। लेकिन उसने भी कईयों की चोटी पकड़कर लपेटा था। उसकी बाहें कई रंगरूटों को जुला रही थी। वह अपने जमाने की परी थी। जितनी फैमस अपने पीहर में थी उतनी ही फैमस वह अपने पति के घर पर भी। पति तो कभी उसे फिट आया ही नहीं। उसको तरह-तरह के मर्दाे के साथ मजा आता था। वह कभी किसी को मना भी नहीं करती। उसके लिए सब कुछ खेल था। वह अपनी जांघ दिखा कर पैसा लिया करती थी। उसके घर के दो दरवाजे थे एक जाने को एक आने का। उसको गांव के हर शोदे ने चैदा हैं । या उसने गांव के हर शौदे को चैदना सीखाया हैं । वह अपने धर्म के अनुकूल थी। उसे किसी की परवाह भी कहां थी। आज भी उसे देखकर लोग दिवाने हुए जाते हैं। उसे जो भी काम रहता वह ऐसे ही कराती थी। उसके लिए यही आसान रास्ता भी था।
उसने ऐसा एक बार नहीं हर बार किया। उसे जिंदगी में मजा आता था वह जिंदगी को मजा समझकर ही जी रही थी उसके पास सब था लेकिन वह जहां भी जाती उसके पास वे लोग आते जो उसके चाहनेवाले होते। उसे छला भी बहुत लोगों ने।


15 अप्रैल 2015 बैंगलोर

गांधी का जीवन कितना भी विचित्र रहा हो वे अपनी राह पर चलते रहे। फकीरी की राह। जहां भी जाओ उसने कहा था पढ़ो। इस कहानी में पे्रम की वह अनुभूति हैं जो समय से परे हैं। पर गुलेरी जी का जीवन कितना सम्पन्न था। पे्रमचंद को भी तो मिला था न्यौता वे तो नहीं गए राजा के यहां। पे्रमचंद का कद कितना श्रेष्ठ हैं ? वहीं गुलेरी का जीवन उनकी रचना का सम्मान करते हुए कहना चाहता हूं कि यह किस और संकेत हैं
पे्रमचंद को कोई बड़ा पुरस्कार नहीं मिला पर पे्रमचंद की बराबरी कौन कर पाया। वे आज भी उसी तरह पढ़े जाते जितना उनको पढ़ा जाना चाहिए। जहां से भी वे नमक का दारोगा पढ़ों या फिर ईदगाह। वे हर बात को कहते हंै और कहते जाते हैं। उनके जीवन में कई तरह के बदलाव आए पर वे आकर गोदान पर ही रुके।



18 अप्रैल 2015 बैंगलोर

जिंदगी के ख्वाब और जिंदगी की हकीकत में कितना फर्क होता हैं । जब जिंदगी की हकीकत को समझ रहे थे उस समय जिंदगी बहुत दूर से पुकारती हैं । वह हर बार कहती हैं कि फैसला तुमको करना हैं । तुम इससे परे नहीं जी सकते। तुमको कल्पना से बाहर जीवन की हकीकत के साथ खड़े होने की आवश्यकता हैं । तुम चाहो तो उसको आज ही समझ सकते हो।े तुम चाहो तो उससे परे भी जी सकते हो? वह जीवन जो छात्र जीवन के साथ युवा अवस्था में प्रवेश करता हैं उसका जादू ही अलग होता हैं । लेकिन इतने भी नाजुक न थे तुम कि सबसे परे चले जाते और कहते अरे मैं?खुद से भी अगर भरोसा उठ जाए तो कैसे जिएगा कोई? इस शहर में भंवर के साथ अकेले हो तो क्या हैं ? शहर में इंसान अकेला ही होता हैं उसे कहने और सुनने को बहुत कुछ होता हैं लेकिन उसको सुननेवाला केाई नहीं मिलता? जिसके कारण वह अपने को अंदर ही खोजता रहता हैं । कभी पार्को में कभी बागानों में कभी कहीं दूर उसके साथ एक से बढ़कर एक होता हैं जिसका उसके पास कहीं कोई जवाब होता हैं तो कभी उसके पास जवाब नहीं भी होता हैं ।
सभी गालिब कहां हो पाते? कोई मीर भी नहीं लोग तो वह होते हैं जो उनको होने में जिंदगी के मायने लगते हैं।
जब मन टूट जाता हैं तो यह दुनिया वैसी ही लगती हैं । हादसो के बाद दुनिया वैसी ही लगती हैं । अजीब तरह के हादसे इंसान को वैसा ही बना देते हैं। लेकिन जब वहीं इंसान वहां से निकलता हैं तो फिर उसमें जो चमक होती हैं वह लाजवाब होती हैं । असफलता और धोखा इंसान को जिंदगी में जो सीखाता हैं वह सफलता और विश्वास नहीं। ठोकर इंसान को हमेशा के लिए चलना सीखा देती हैं । वह उसके बाद सदैव ऐसे ही चलता हैं जैसे उसे ठोकर लगने ही वाली हैं ।
पुराने किस्से कहानी भी कुछ ऐसे ही कहते हैं। वैसे भी यह बात याद रखने की हैं कि पुराने में बहुत कुछ हैं जिसका कहीं कोई महत्व नहीं हैं , लेकिन पुराना ढोना कोई समझदारी भी नहीं हैं ।
इस शहर में दुनिया सिमट गई और शहर यहीं समा गया, ऐसा किसी कहानी में पढ़ा था। कहानी का नायक उसी में खो गया और वह समझते हुए भी समझने से मना कर गया,वह एक के बाद दूसरा और इस तरह अपने में सिमटता गया उसकी परते बढ़ती गई और वह इस तरह उनमें मिटता गया।

एक शहर भीड़ में तन्हा था
हर शख्स

यह एक के साथ हो तो फिर भी हो सकत हैं पर यह तो सभी के साथ था। कौन किससे क्या कहता और कैसे कहता? किसी को कुछ भी कहने का कुछ भी हक होता तो कोई बात भी न होती? यहां तो सभी अपने में तन्हा थे?
तुम अपने में अकेले जी रहे थे
जिंदगी तुमकों सभी में तलाश रही थी
ये आंसू भी आते तो
तुम्हारी याद में रोते तो सही
तन्हाई का आलम ये हैं कि
खुद को कोस रहे हैं वे



23 अप्रैल 2015 बैंगलोर

जिंदगी में तिलस्म का होना जरुरी हैं । रहस्य के सहारे ही आगे बढ़ा जा सकता हैं । जिंदगी की केमेस्ट्री कुछ ऐसी ही हैं ।


24 अप्रैल 2015

सारी कलाएं झूठ ही हैं । जो कलाकार जिस तरह से झूठ को रच पाएगा वह उतना ही बड़ा होता जाएगा? जो कहानी में होता हैं वह कहीं भी नहीं होता लेकिन हम सभी उसको खोज लेते हैं। सारा आकाश के समर और प्रभा हम सब में हंै। बस उनको देखने की आवश्यकता हैं ।


25 अप्रैल 2015 बैंगलोर

नेपाल में भूकंप राजधानी तबाह हो गई। कितने लोग मारे गए पता नहीं। कभी न कभी कुछ न कुछ होता ही रहता हैं । जो कभी ठहरता ही नहीं। बस सब चल रहा हैं । बाढ़ कभी अकाल महामारी, कभी उससे भी भयंकर सूखा कभी युद्ध कहां हैं राहत। नेपाल और भारत दोनों ही हिस्सों में आया हैं यह भूकंप। हिमालय के गर्भ में कुछ प्लेटस हिलती हैं । और आगे भी आएगा। दिल्ली में भी आ सकता हैं । 26 जनवरी 2001 को आया था कच्छ में। उस समय बी.ए. प्रथम वर्ष में था। काॅलेज के गा्रउंड में थे प्रोग्राम सेलेब्रेट कर रहे थे। कि हल्का सा झटका महसूस हुआ। जिस प्लेट में यह भूकंप आया आया पहले भी कई आया हैं । 1935 के समय भी आया था उससे पहले भी आया था।


28 अप्रैल2015


बुद्धिजीवी अपनी प्रेमिकाओं की बाहों में लेटे हैं और प्रेमिकाएं उनको दुलार रही हैं किसान उनकी आवाज में अपनी आवाज तलाश रहे हैं। वे उनको सीने से लगा रही हैं ताकि उनकी आवाज में नमी आए।



29 अप्रैल 2015 बैंगलोर


तुम अपने जादू से आगे आओ मैं तुमको उसका तिलस्म दिखाता रहूंगा।


1 मई 2015 बैंगलोर

आज जिन लोगों का दिन हैं उनका जीवन कहां से शुरु होता हैं और खत्म होता इसका पता किसी को न होता। वे मजदूर ही पैदा होते और मर जाते हैं उनके पास इसके अलावा कोई जीवन संभव न होता। अपार दौलत के सामने वे वहीं रहते हैं। वे आज वहीं कहीं सड़ रहे होंगे। वे बाते करते रहते पर उनकी बातों मंे कहीं कोई दम होता भी पर कहां उसको तय कर पाते। उनकी पसंद और ना पसंद का कोई मतलब होता होगा? वे ऐसे ही जीते और ऐसे ही मर जाते हैं। उनकी याद में कौन रोता हैं। उलझ रहा कि सुलझ रहा किसको पता कि क्या हो रहा? बस हो रहा हैं । यही जो नहीं होना चाहिए।
बताया जा रहा हैं कि नेपाल पटरी पर आ गया हैं । लेकिन वहां के लोग ऐसे ही मरे हैं लाशे जल रही हैं । अनंत लाशों का अंबार लगा हैं । एक आदमी नहीं कितने ही आदमी जल रहे हैं
ऐसे ही सत्ता धनवान हो रही हैं जनता गरीबी की और जा रही हैं ।

कालू लाल कुल्मी



 


कालू लाल कुल्मी से मेरा परिचय वर्धा विश्वविद्यालय में एक उत्साही युवा की तरह हुआ था वे तब भी लिखते थे, आज उनके लेखन में गांभीर्य आ गया है। अब वे  जी जी यू बिलासपुर में असिस्टेंर्ट प्रोफेसर हैं।

 

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