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शीबी राणा

आओ बच्चो तुम्हे सुनाऊं कहानी शीबी राणा की
सत्यवादी और वचन के पक्के भारत के एक राजा की

ख्याती फैली सुदूर भाई प्राण जाए पर वचन न जाई
धर्म ने चाहा परखूं राणा को उतार दूं उसके घमंड को

भक्षक पक्षीराज बना धर्म इन्द्रराज बने कबूतर नर्म
पीछे पडी चील कबूतर के करने टुकडे टुकडे उसके

बचाओ बचाओ करता कबूतर घुस गया राजमहल के भीतर
शरण दो राजा से बिनती की वह चील देखो पिछे है पडी

आओ कबूतर न घबराना मै हूं तुम्हारा रक्षक राणा
चील से दो हाथ कर मेरा फर्ज है तुम्हे बचाना

आई चील पीछा करती बोली ''राणा मेरा भक्ष्य मुझे लौटा दो
कबूतर मेरा भोजन है कैसे वह तेरे शरण है''

''शरण आये को कैसे मरण दूं'' बोलो हे पक्षिराज तुम कोई और अन्न खोजो।
नहीं राणा मुझे चाहिये मेरा कबूतर अन्यथा हो जाएगा अधर्म भूतलपर।

बोला राणा ''मेरी रसोई से जो चाहे लेलो लेकिन इस कबूतर को छोड दो''

चील ने किया विचार क्षणभर परीक्षा की घडी आयी है पलभर
जो मै चाहूं देख लूं मांगकर राणा ने वचन दिया हां कहकर

तो सुन राणा मुझे चाहिये कबूतर के वजन बराबर
मांस तेरी जाँघ से बस यही होगा हिसाब बराबर

खुश हुआ राणा आज यह शरीर आयेगा काम किसी के
धर्म की होगी रक्षा और प्राण बचेगे गरीब के

चाकू आया और आया तराजू एक पलडे में रखा कबूतर
जाँघ का माँस दूसरी बाजू लेकिन क्या गजब हुआ भाई

काट कर पूरी जांघ रख दी गयी फिर भी न हुआ पलडा भारी
कबूतर का वजन था मांस से भारी बोले पक्षीराज ''राजा अब क्या करोगे''

बोले राणा निर्भयतासे दूसरी बाजू है अभी साबुत पक्षीराज
वहीं से काट लो अपना हिस्सा कबूतर की जान को न लगे धक्का

सत्य वचन सुन राणाके पुष्प वृष्टि हुई स्वर्ग से
न था कबूतर नाही पक्षीराज प्रकट हुए इन्द्रदेव और धर्मराज

आशिष वचन बोले धन्य राणा शीबी धन्य भारत का इतिहास

_ डॉ सी एस शाह
अगस्त, 3 2000

 

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