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महाश्वेता देवी के 82वें जन्मदिन 14 जनवरी पर विशेष

अब याद नहीं आती बचपन की बातें : महाश्वेता देवी

 

नई दिल्ली, 12 जनवरी (आईएएनएस)। महाश्वेता देवी का नाम ध्यान में आते ही उनकी कई-कई छवियां आंखों के सामने प्रकट हो जाती हैं। दरअसल उन्होंने मेहनत व ईमानदारी के बलबूते अपने व्यक्तित्व को निखारा है। उन्होंने अपने को एक पत्रकार, लेखक, साहित्यकार और आंदोलनधर्मी के रूप में विकसित किया। महाश्वेता देवी का जन्म बांग्लादेश के ढाका में हुआ था। सोमवार 14 जनवरी को महाश्वेता देवी  82 वर्ष की हो रही हैं। इस अवसर पर उन्होंने आईएएनएस से विशेष बातचीत की। पेश है बातचीत के मुख्य अंश:-

 

जन्मदिन मनाने की बात पर उन्होंने कहा, ''सामान्य दिन की तरह ही जन्मदिन भी गुजर जाता है। पहले मेरे बहुत सारे मित्र जन्मदिन पर मेरे घर आते थे। मैं उनसे वैचारिक मुद्दों पर बहस करती थी। अब मेरे ज्यादातर मित्र या तो इस दुनिया में नहीं रहे या वे शरीर से लाचार हो गए हैं। मुझे अपने बचपन के बारे में कुछ भी याद नहीं है। कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों ने पीछे लौटकर चीजों को देखने और याद करने का मौका नहीं दिया और अब उन दिनों को याद ही नहीं कर पाती हूं।''

 

महाश्वेता ने अपने जीवन का लंबा समय आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के संघर्ष में खर्च कर दिया। उन्होंने पश्चिम बंगाल की दो जनजातियों 'लोधास' और 'शबर' विशेष पर बहुत काम किया है। इन संघर्षों के दौरान पीड़ा के स्वर को महाश्वेता ने बहुत करीब से सुना और महसूस किया है।

 

पीड़ा के ये स्वर उनकी रचनाओं में साफ-साफ सुनाई पड़ते हैं। उनकी कुछ महत्वपूर्ण कृतियों में 'अग्निगर्भ' 'जंगल के दावेदार' और '1084 की मां' हैं। उन्हें महत्वपूर्ण पुरुस्कार पद्म विभूषण, रैमन मैग्सेसे, भारतीय ज्ञानपीठ सहित कई अन्य पुरस्कार मिले हैं।

 

 लेखिका महाश्वेता देवी 14 जनवरी 2008 को 83 वें साल में प्रवेश कर रही हैं लेकिन आंदोलन के नाम से अब भी उनके खून में वही उबाल देखने को मिलता है जो वर्ष 1967 में नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौरान दिखाई देता था।

 

महाश्वेता, पश्चिम बंगाल की माकपा सरकार द्वारा 'विशेष आर्थिक क्षेत्र' के अंतर्गत किसानों की जमीन छीने जाने को लेकर सक्रिय हैं लेकिन सिंगुर में आंदोलन की ताप धीरे-धीरे कम होती देखकर वह थोड़ी दुखी हैं। उन्होंने इस मुद्दे पर कहा, ''सिंगुर में अभी कोई बड़ा आंदोलन नहीं चल रहा है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि मुद्दे का विरोध कौन लोग कर रहे हैं, इसको समझना भी जरूरी होगा।''

 

राजनीतिक आंदोलनों के साथ उन्होंने साहित्य व सांस्कृतिक आंदोलन में जब-तब शिरकत की है। तसलीमा नसरीन को कोलकाता से हटाये जाने के मामले को लेकर वे पश्चिम बंगाल व केंद्र सरकार के रवैये को लेकर आहत हैं। उन्होंने कहा, ''तसलीमा नसरीन को कोलकाता में लाना जरूरी है। उनके साथ पश्चिम बंगाल सहित केंद्र सरकार ने बुरा किया है। कोलकाता में तसलीमा को लेकर लड़ाई बहुत जोर-शोर से चल रही है।''

-स्वतंत्र मिश्र

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

 

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