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राजनीतिक सुधार : पार्टी विहीन लोकतंत्र की संभावना तलाशनी होगी

 

नई दिल्ली, 22 जनवरी (आईएएनएस)। पिछले दो सौ वर्षों की यूरोपीय चकाचौंध ने भारतीय राजनीतिज्ञों को प्रभावित किया। वे इंग्लैंड को अपना आदर्श मान बैठे। 1935 में अंग्रेजों द्वारा तैयार किया गया संविधान और उसके तहत करवाए गए चुनावों में भारतीय नेताओं की भागीदारी को इस दिशा में शुरुआती कदम के तौर पर देखा जा सकता है।

 

अंग्रेजों के जाने के बाद जिस भारतीय संविधान का निर्माण किया गया, वह मूलत: 1935 के कानून पर ही आधारित है। इस संविधान के तहत भारत में संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था की गई। यद्यपि संविधान में पार्टिर्यों की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं बताई गई है, फिर भी अपने औपनिवेशिक शासकों की नकल करते हुए यहां भी सत्ता पर नियंत्रण के लिए राजनीतिक दलों की स्थापना की गई।

 

गांधी जी की लिखित सलाह के विपरीत कांग्रेस ने राजनीतिक दल के रूप में स्वयं को प्रस्तुत किया। स्वतंत्रता आंदोलन की साख के कारण कई दशकों तक सत्ता पर उसका एकछत्र नियंत्रण रहा। इसके बावजूद जब देश में प्रगति का उपयुक्त वातावरण नहीं बन पाया, तब लोगों ने कांग्रेस को हटाकर एक नए दल को सत्ता सौंपने का निर्णय किया।

 

वर्ष 1977 में संपूर्ण क्रांति के नारे के साथ जनता पार्टी का शासन आ गया। देश की जनता को इस बदलाव से बडी अाशा थी। लेकिन शीघ्र ही सारी आशाएं धूल में मिल गईं। 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह और जनता दल के रूप में देश की जनता ने एक और प्रयोग किया। लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात। इसके बाद भी कई फुटकर प्रयोग होते रहे।

 

वर्ष 1998 में भारतीय जनता पार्टी को भी सरकार बनाने का मौका मिला। वर्ष 2004 तक यह पार्टी लगातार सत्ता में रही। लोगों का विश्वास था कि भारतीय जनता पार्टी एक ऐसी राजनीतिक शक्ति है जो भारतीय सभ्यता के संरक्षण एवं भारतीय राष्ट्र के पुनरोत्थान के प्रति अन्य दलों की अपेक्षा कहीं अधिक समर्पित है।

 

लोगों का विश्वास था कि जब वे ऐसी समर्पित राजनीतिक शक्तियों को सत्ता पर स्थापित करने में सफल होंगे तो उनके समस्त कार्यों में अनाधिकार हस्तक्षेप की राजकीय तंत्र की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा। राज्य के विभिन्न अंग उनकी सांस्कृतिक एवं सभ्यतानिष्ठ संवेदनाओं का सम्मान करना सीखेंगे। भारतभूमि पर उपलब्ध प्रचुर प्राकृतिक संपदाओं, भारत के लोगों के कौशल एवं विभिन्न क्षेत्रों में उनकी अद्वितीय क्षमताओं का राष्ट्रोत्थान के कार्य में समुचित संयोजन करने का गंभीर प्रयास किया जाएगा। लेकिन, दुर्भाग्यवश ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। निराश भारत की जनता मजबूरी में एक बार फिर कांग्रेस के दरवाजे पर चली गई।

 

जब से भारत अंग्रेजी शासन से मुक्त हुआ, तब से लेकर आजतक सभी प्रमुख दलों को सरकार चलाने का मौका मिल चुका है। न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर कभी राजनीतिक दल सत्ता का स्वाद चख चुके हैं। लेकिन, कोई भी भारतीय राज्य के स्वरूप एवं उसकी दिशा में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं कर सका है। सभी लोग सत्ता में आने से पहले एक तरह की बात करते हैं, किंतु धीरे-धीरे वे भी अन्य नेताओं के रंग में ढल जाते हैं। उन्हें लगता है कि सत्ता से तो इतना ही हो सकता है, ज्यादा कुछ नहीं अंतत: वे स्थितियों से समझौता कर बैठते हैं।

 

आज स्थिति यह है कि आम जनता राजनीतिक पार्टियों से निराश हो चुकी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के शुरुआती वर्षों में पार्टियों से जो थोडी-बहुत आशा थी, समय के साथ वह लुप्त हो गई है। अधिकतर पार्टियां आम जनता से कट चुकी हैं। वे अब सत्ता प्राप्ति के लिए जनबल की बजाय धनबल और बाहुबल पर अधिक यकीन करती हैं। उनका प्रबंधन जनसंगठनों की तरह नहीं बल्कि प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह होता है।

 

लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व करने का दंभ भरने वाली ये पार्टियां कुछ गिने-चुने व्यक्तियों की मिल्कियत हो चुकी हैं। जो जनप्रतिनिधि इन पार्टियों के बैनर तले चुनकर आते हैं, वे वास्तव में जनता के नहीं बल्कि अपनी पार्टी के आकाओं के एजेंट होते हैं। उन्हें अगर जनता और पार्टी में से किसी एक को चुनना पडा तो वे निश्चित रूप से पार्टी को ही चुनेंगे।    

 

पार्टियों और जनप्रतिनिधियों के बारे में ये बातें कहकर मैं कोई रहस्योद्धाटन नहीं कर रहा हूं। वास्तव में बाजारवाद के चलते पिछले साठ वर्षों में पूरी दुनिया में दलीय राजनीति जनोन्मुखी न रह कर महज सत्ताकेन्द्रित रह गए हैं। राजनीतिक दल विभिन्न स्वार्थों के प्रतिनिधि या दबाव समूह मात्र रह गए हैं। इस सबके कारण दलीय राजनीति का मूल तकाजा उपेक्षित रह गया। मूल तकाजा यह था कि दल अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं के माध्यम से समाज में एक वैश्विक दृष्टि और जनोन्मुखी नीतियों की आधारशिला तैयार करें।

 

दुर्भाग्यवश आज राजनीतिक दलों में वैश्विक दृष्टि और राष्ट्रीय समझ का अभाव हो गया है। वे केवल सत्ता की होड़ में लगे छोटे-छोटे गिरोहों का रूप ले चुके हैं। उनका एक मात्र लक्ष्य सत्ता प्राप्ति रह गया है। ऐसे में स्वाभाविक है कि वे सत्ता प्राप्त होने के बाद उसका उपयोग जन के लिए करने के बजाय अपने लिए और अपने इर्द-गिर्द के लोगों के लिए ही करेंगे। वास्तव में राजनीति में प्रवेश करने की प्रेरणा ही प्रदूषित हो गई है।

 

आज जन चाहता है परिणामकारी आंदोलन, दल करते हैं कर्मकांडी आंदोलन। जन चाहता है मन, विचार, वाणी और कर्म में समानता। और दल करते हैं इसका दिखावा मात्र। दलों के बीच आपसी साठ-गांठ हो गई है। वे बारी-बारी सत्ता सुख लेते हैं और जनता बेवकूफ बनती है। इसके पचासों उदाहरण हैं। स्टिंग आपरेशन से लेकर लाभकारी पदों की व्यवस्था तक। जहां अच्छा बनने की स्पर्धा होनी चाहिए थी। वहां बुराई के पक्ष में सभी एकत्रित हो गए हैं। जनता असहाय हो गई है। राजनीतिक दलों के इस अपवित्र गठजोड़ को अब तोड़ने की जरूरत है।

 

राजनीतिक दलों को यदि आने वाले समय में भी प्रासंगिक बने रहना है तो उन्हें विचारधारा, पध्दति और आचरण, सभी स्तरों पर सुधार करना होगा। तीनों के स्तर पर स्पष्टता, समझ और प्रतिबध्दता की आवश्यकता है। इसे नेता से लेकर कार्यकर्ता स्तर तक सुनिश्चित करना पड़ेगा। जनाकांक्षा आगे सत्ताकांक्षा पीछे, यह सभी के सामने बिल्कुल स्पष्ट होना चाहिए। और यह सब व्यवहार के स्तर पर भी दिखाना होगा।

 

राजनीति दलों के तौर-तरीके में सुधार हो, यह जरूरी है। लेकिन, राजनीतिक सुधार की सीमा इससे आगे भी जाती है। हमें वैकल्पिक राजनीति के बारे में भी सोचना चाहिए। यह बहुत जरूरी है कि हम सत्ता संचालन के वैकल्पिक उपकरणों पर भी विचार करें। हमें उन संभावनाओं को भी टटोलना होगा जिसमें पार्टी विहीन लोकतंत्र की बात की जाती है। इसी के साथ हमें वर्तमान चुनाव प्रणाली को भी चुनौती देनी होगी।

 

हमें पूछना होगा कि 51-49 की प्रणाली को ही लोकतंत्र क्यों माना जाए। 51 जिसको मिला, वह सब संभाले और जिसको 49 मिले उसे कोई जिम्मेदारी नहीं। ये कहां का लोकतंत्र है? 49 वाला दूसरे नंबर का सहायक क्यों नहीं हो सकता? सब मिलकर काम क्यों नहीं कर सकते? संघर्ष या टकराव जरूरी है क्या? सत्ता पक्ष और विपक्ष एक दूसरे के पूरक क्यों नहीं बन सकते? ऐसे और कई सवाल उठाने होंगे।

 

आज जो लाचारी, असहायपन और विवशता सम्पूर्ण वायुमंडल में दिखती है और लगता है कि हम कहीं न कहीं इन्हीं गहरे गङ्ढो में डूब जाएंगे, उससे निपटने के लिए तमाम अभिनव प्रयोगों की आवश्यकता पड़ेगी। हमें नई परम्पराएं निर्धारित करनी होंगी। यह सब लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यक होगा और देश का अपना जो वैश्विक लक्ष्य है, उसको प्राप्त करने के लिए जरूरी होगा।

के. एन. गोविंदाचार्य

 

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

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