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कानून को ठेंगा दिखा रहे बाल श्रम करवाने वाले

 

भुवनेश्वर, (उड़ीसा), 2 मार्च (आईएएनएस)। भारत सरकार ने वर्ष 1987 के प्रारंभ में ही बालश्रम पर राष्ट्रीय नीति की घोषणा की थी। संभवत: विकासशील देशों में सबसे पहले भारत ने ही इस मुद्दे पर कानून बनाया। यद्यपि हमारे यहां बाल श्रमिक (निषेध और विनियम) कानून मौजूद है, फिर भी हजारों बच्चों से लगातार काम करवाए जा रहे हैं।

 

बाल श्रम के खिलाफ  अभियान के राष्ट्रीय संयोजक रंजन मोहंती बताते हैं, ''हम बच्चों के लिए उन्हीं के सहयोग से राष्ट्रीय स्तर पर एक प्लेटफॉर्म बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे बाल श्रमिकों के लिए एक ऐसा स्थान निर्मित होता है जहां वे अपनी बात बेझिझक बता सकें। यहां बाल श्रम करने वाले, बाल श्रम से बचाए गए और स्कूल जाने वाले बच्चों को एक-दूसरे से मिलने और जानने का मौका मिलता है। उन्हें यहां बाल श्रम, बच्चों के अधिकार, पुनर्वास आदि विभिन्न मुद्दों पर जानकारी हासिल होती है।''

 

बाल श्रमिकों और मुख्य धारा के बच्चों के बीच गठजोड़ विकसित करने के अलावा आयोजकों का ध्यान आम लोगों पर भी है। वे आशा करते हैं कि इससे बाल श्रम पर आम लोगों का ध्यान आकर्षित होगा और वे इसे रोकने के लिए प्रभावी नीति और कार्यक्रम लागू करने के लिए सरकार पर दबाव बनाएंगे। 

 

दुनिया में सबसे अधिक बाल श्रमिक भारत में है। यहां बच्चे कृषि, पशुपालन, बागवानी, ज़री और सिल्क उत्पादन, हथकरघा, कालीन बुनाई, शीशे का उत्पादन, बीड़ी बनाने, आभूषण उद्योग, कचरा बीनने और घरेलू कामों में लगे हुए हैं। संभवत: देश में कोई भी ऐसा व्यवसाय नहीं है जिसमें बाल श्रमिकों को नहीं लगाया जाता हो।

 

बाल श्रम पर भुवनेश्वर में आयोजित चौथे राष्ट्रीय सम्मेलन में यह बात सामने आया कि शिक्षा, भोजन, पानी और घर के अभाव के साथ-साथ कार्यस्थल पर भावनात्मक, शारीरिक और यौन उत्पीड़न के कारण उनका बचपन पूरी तरह बर्बाद हो जाता है। वयस्क होने पर ऐसे बच्चों को खराब स्वास्थ्य और आत्मग्लानि विरासत के रूप में मिलती हैं।

 

बाल श्रम का व्यापक विस्तार भारत के अनियमित क्षेत्रों की पहचान बन चुकी है। भारत में काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के एक आकलन के अनुसार यहां कम-से-कम नौ करोड़ बाल श्रमिक हैं। हालांकि कुछ गैर सरकारी संस्था बाल श्रमिकों की संख्या इससे कहीं अधिक बता रहे हैं। 

(साभार 'ग्रासरूट')

 

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

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