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सांस्कृतिक विरासत की प्रतीक है गुलाब बाड़ी

 

वाराणसी, 16 मार्च (आईएएनएस)। दुनिया के सबसे पुराने शहर और भारत की राजधानी कहे  जाने वाली काशी में आज भी कुछ परम्पराएं और मान्यताएं यथावत हैं। इन्हीं में से एक परम्परा जो गुलाब बाड़ी के नाम से मशहूर है, अब धीरे-धीरे काशी की पहचान बनती जा रही है। होली के पास पड़ने वाले इस पारम्परिक उत्सव को काशीवासी अब बड़े धूमधाम से मनाने लगे हैं।

 

आज वाराणसी के रविन्द्र पुरी के नीलाम्बर में सब कुछ गुलाबी-गुलाबी था। यहां मर्दो ने सफेद कुर्ता और पायजामा पहन रखा था तो महिलाओं ने गुलाबी साड़ी। इस महफिल में शिरकत करने वालों का गुलाब की पंखुडियों और पान की गिलौरी से स्वागत किया गया। बिल्कुल शाही अंदाज में सजने वाली इस महफिल में बैठ कर लोग हलकी गुलाबी ठंड के बीच मुधर शास्त्रीय संगीत का आनंद भी उठा रहे थे। बीच -बीच में गुलाब की फुहार लोगों को गुदगुदाते भी जा  रही थीं। पूरा वातावरण बनारसी अल्हड़ पन का खाका खींचने के लिए काफी था।

 

इस गुलाबी मस्ती के पीछे बनारसी अल्हड़ पन  का एक पुराना इतिहास भी छिपा हुआ है। इसके आयोजक अशोक गुप्ता बताते बताते हैं कि पुराने जमाने में फागुन के महीने में इस तरह की महफिल कई जगह सजती थीं, लेकिन अब सिर्फ एक ही जगह लगाती हैं। पिछले सात सालों से होने वाली इस गुलाबी बाड़ी को अब जाककर एक मजबूत पहचान मिली है।

 

बनारस की यह गुलाब बाड़ी अब साम्प्रदायिक सौहार्द की मिशाल भी बनने लगी है। बड़ी बाजार के निवासी शमीम अंसारी जो पिछले पांच सालों से यहां की ठंडई पिलाने का जिम्मा संभालते हैं। श्री अंसारी बेखौफ होकर बताते हैं कि गुलाब बाड़ी का इंतजार मुझे ईद से कम नहीं रहता।

 

हिंदु मुसलमान इसाई के अलावा इसे देखने के लिए सात समुन्दर पार से भी लोग यहां चले आते हैं। कलिफोर्निया से वनारस घूने आए गिलक्रिस्ट और मारिजुआना कहते हैं कि इस गुलाब बाड़ी में आकर हमें यहां की मस्ती का साक्षात दर्शन हुआ है।

 

यूं तो बनारस में फागुनी बयार पूरे साल बहती रहती है, लेकिन होली के मौसम में इसका रंग कुछ  ज्यादा ही गाढ़ा हो जाता है, तभी तो गुलाब बाड़ी के इस कार्यक्रम में हर कोई मस्ती के रंग में डूब जाना चाहता है और शायद यही वजह है कि गुलाब बाड़ी अब मस्ती के साथ साथ बनारस की  पहचान भी बनता जा रहा है।

 

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

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