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जैनेन्द्र कुमार सा दूसरा न हुआ

 

नई दिल्ली, 17 अप्रैल (आईएएनएस)। जैनेन्द्र कुमार खामोशी की लय उत्पन्न करने वाले कहानी कहानीकार थे और सांकेतिकता ही उनकी कहानी का नाटकीय तत्व है। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में एक कार्यक्रम के दौरान प्रख्यात साहित्यकारों और कथाकारों ने यह बात कही।

 

हिन्दी के आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने कहा कि विश्व साहित्य में भारतीय कहानियों का अपना मौलिक चरित्र है और विश्व साहित्य में जब कभी भारतीय कहानियों की बात होगी तो प्रेमचंद के साथ जैनेन्द्र को जरूर याद किया जाएगा। वह 'सेलेक्टेड शॉर्ट स्टोरीज ऑफ जैनेन्द्र कुमार' नामक पुस्तक लोकार्पण समारोह के अवसर पर बोल रहे थे।

 

उन्होंने जैनेन्द्र को याद करते हुए कहा, ''नई कहानी से जुड़े लोगों ने उनपर बड़े आरोप लगाए। एक अधिवेशन में कोलकाता बुलाकर खूब खरीखोटी सुनाई लेकिन जैनेन्द्र जरा भी उत्तेजित नहीं हुए। आज ऐसे कम साहित्यकार हैं जो अपनी आलोचनाओं को इतनी सहजता से सुनते हैं।''

 

आगे उन्होंने कहा कि वह किस्सागोई के कथाकार नहीं थे और न ही उनकी कहानियां घटना प्रधान होती थी। वह तो प्रतिक्रियावादी थे। इस मौके पर उन्होंने जैनेन्द्र की 'खेल' और 'नीलम देश की राजकन्या' नामक कहानियों की याद दिलाई।

 

जैनेन्द्र के साथ लंबे समय तक रहे प्रदीप कुमार ने कहा, ''वह कहानी किसी भी पंक्ति से शुरू कर देते थे। कहते थे- तुम्हीं पहली पंक्ति कह दो! वह कबीर के भक्त थे और हमेशा कबीर के दोहे गाते रहते थे। कठिन परिस्थितियों में भी सरकार से सहयता की उम्मीद नहीं रखते थे और न ही उसे स्वीकारते थे।''

 

इस अवसर पर कवि अशोक वाजपेयी ने कहा, ''सत्ता के गलियारों में गहरी पैठ रखने वालों से वह बराबरी का संवाद करते थे और स्पष्टत: अपनी बात कहते थे। वह मानते थे कि भाषा हो तो श्रृंगारहीन हो। उन्हें शब्द के संकोच का कथाकार कहा जा सकता है।'' इस अवसर पर साहित्यकार राजेन्द्र यादव और आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने भी अपने विचार रखे।

 

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

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