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वह काली रात, जब लोकतंत्र हुआ था नजरबंद

(आपातकाल की 33 वीं सालगिरह पर विशेष)

 

नई दिल्ली, 24 जून(आईएएनएस)। इतिहास में प्रत्येक युग किसी बड़ी अवधारणा का द्योतक होता है, जिसे कई वैज्ञानिकों और राजनीतिक चिंतकों ने 'सामूहिक मन' कहा है। जब यह अवधारणा अधिकांश लोगों के दिलो-दिमाग पर छा जाती है, तब वह इतिहास की प्रेरक शक्ति बन जाती है। इस दृष्टि से देखने पर पता चलेगा कि बीसवीं शताब्दी के अधिकांश आंदोलन परस्पर संबंधित दो बड़ी अवधारणाओं से प्रेरित थे-स्वतंत्रता और लोकतंत्र।

 

स्वतंत्रता की तलाश में कई परतंत्र राष्ट्रों ने उपनिवेशवादी शासन के विरुध्द संघर्ष किया। हालाँकि राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए इनमें से अधिकांश संघर्षों की शुरुआत अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में हुई, लेकिन उनके परिणाम मुख्य रूप से बीसवीं शताब्दी में प्राप्त हुए। राष्ट्र की स्वतंत्रता के साथ अन्य सशक्त आकांक्षाएँ भी पनपीं-जैसे राजतंत्र, सैनिक तानाशाह, निरंकुश कम्युनिस्ट पार्टी अथवा अन्य प्रकार की दमनकारी व्यवस्था के विरुध्द जनता के शासन की आकांक्षा। राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष तो विदेशी शक्ति के विरुध्द करना पड़ा, किंतु लोकतंत्र के लिए संघर्ष आंतरिक शासन-व्यवस्था के विरुध्द करना पड़ा।

 

कई देशों में राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अभियान जितना कठिन था, लगभग उतना ही कठिन था लोकतंत्र के लिए संघर्ष-और इसे उतने ही हिंसात्मक रूप से कुचल दिया गया। भावी इतिहासकार यह दर्ज करेंगे कि दो विश्व युध्द यदि बीसवीं शताब्दी के फलक पर दाग हैं तो स्वतंत्रता और लोकतंत्र की विजय इस युग की गौरवशाली उपलब्धि हैं।

 

भारत में हम लोग सौभाग्यशाली रहे कि हमारे पड़ोसी देशों और विश्व के अन्य देशों की भाँति सन् 1947 में ब्रिटिश शासन से मुक्त होने के बाद हमें लोकतंत्र के लिए अलग से युध्द नहीं करना पड़ा। स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र उतने ही सहज ढंग से आया जैसे कि यहाँ पर पंथनिरपेक्षता स्वाभाविक रूप से थी; जैसाकि मैं इस संबंध में आगे चर्चा करूँगा। इन दोनों अवधारणाओं की स्वाभाविक स्वीकृति मुख्य रूप से भारत की हिंदू प्रकृति के कारण हुई। मानव इतिहास में हमेशा ऐसे उदाहरण रहे हैं कि कोई अवधारणा कितनी भी उदार क्यों न हो और उसकी जड़ें देश की सांस्कृतिक-आध्यात्मिक भूमि में कितनी ही गहरी क्यों न हो, किंतु ऐसा नहीं हुआ है कि वह अहंकार-प्रेरित और सत्ता की लोलुपता में मदांध लोगों के प्रहार से सदैव बच गई हो। जब ऐसे प्रहार होते हैं तो जिस अवधारणा पर प्रहार होता है, कुछ देर के लिए उसपर ग्रहण लग जाता है। लेकिन ग्रहणकाल की इसकी वेदना ही छाए हुए अंधकार को दूर करने के लिए संघर्ष हेतु और अविनाशी अवधारणा के देदीप्यमान प्रकाश को बिखेरने के लिए विशाल जनसमूह को प्रेरित करती है।

 

ऐसा लगता है कि राष्ट्र को उचित सीख लेने और इसके माध्यम से उस अवधारणा हेतु अपनी प्रतिबध्दता बहाल करने के लिए इतिहास जान-बूझकर ऐसी अग्नि-परीक्षा की स्थिति पैदा करता है।

 

ऐसा ही कुछ जून 1975 में भारत में हुआ, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत पर कू्रर आपातकालीन शासन लागू कर लोकतंत्र पर ग्रहण लगा दिया। उन्नीस माह के बाद कांग्रेस पार्टी की तानाशाही के विरुध्द भारत की जनता के गौरवशाली संघर्ष के परिणामस्वरूप यह ग्रहण छँटा। यदि आपातकाल स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक अंधकारमय अवधि थी तो लोकतंत्र की बहाली के लिए किया गया विजयी संघर्ष सबसे देदीप्यमान घटना। ऐसा हुआ कि मैं अपने हजारों देशवासियों की तरह आपातकाल की संपूर्ण उन्नीस माह की अवधि जेल में व्यतीत करने के कारण इसका भुक्तभोगी तथा आपातकाल के विरुध्द युध्द में विजय प्राप्त करनेवाली लोकतंत्र सेना का एक सेनानी-दोनों रूपों में था।

 

जून 1975 की दो दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ:

भारत की स्वतंत्रता के साठ वर्षों पर नजर डालने पर पता चलता है कि इन छह दशकों में दो तिथियाँ ऐसी हैं, जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता है और ये दोनों जून 1975 से जुड़ी हुई हैं।

 

इनमें से एक है-12 जून। सभी राजनीतिक विश्लेषकों को अचंभे में डालते हुए गुजरात विधानसभा चुनावों में इंदिरा कांग्रेस की भारी पराजय हुई। दूसरा, उसी दिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली से इंदिरा गांधी के लोकसभा में चुने जाने को निरस्त कर दिया और इसके साथ ही चुनावों में भ्रष्टाचार फैलाने के आधार पर उन्हें छह वर्षों के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया।

 

दूसरी तिथि है-25 जून। लोकतंत्र-प्रेमियों के लिए यह तिथि स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे काले दिवसों में से एक के रूप में याद रखी जाएगी। इस दुर्भाग्यपूर्ण तिथि से घटनाओं की ऐसी शृंखला चल पड़ी, जिसने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को विश्व की दूसरी सबसे बड़ी तानाशाही में परिवर्तित कर दिया।

 

दिल्ली में जून के महीने में सबसे अधिक गरमी होती है। अतएव जब दल-बदल के विरुध्द प्रस्तावित कानून से संबंधित संयुक्त संसदीय समिति ने बगीचों के शहर बंगलौर, जो कि ग्रीष्मकाल में भी अपनी शीतल-सुखद जलवायु के लिए विख्यात है, में 26-27 जून को अपनी बैठक करने का निर्णय लिया तो मुझे काफी प्रसन्नता हुई। हम दोनों-अटलजी और मैं-इस समिति के सदस्य थे, जिसके कांग्रेस (ओ) के नेता श्याम नंदन मिश्र भी सदस्य थे।

 

हालाँकि, जब 25 जून की सुबह मैं दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर बंगलौर जानेवाले विमान पर सवार हुआ तो मुझे इस बात का जरा भी खयाल नहीं था कि यह यात्रा दो वर्ष लंबी अवधि के लिए मेरे 'निर्वासन' की शुरुआत है, जिसके संबंध में माउंट आबू बैठक के दौरान पार्टी सांसद और प्रख्यात ज्योतिषी डॉ. वसंत कुमार पंडित ने भविष्यवाणी की थी।

लोकसभा के अधिकारियों ने बंगलौर हवाई अड्डे पर मेरे सहयात्री मिश्र और मेरी अगवानी की। राज्य विधानसभा के विशाल भवन के पास स्थित विधायक निवास पर हमें ले जाया गया। अटलजी एक दिन पहले ही वहाँ पहुँच चुके थे। इस संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष थे-कांग्रेस पार्टी के दरबारा सिंह, जो बाद में पंजाब के मुख्यमंत्री बने।

26 जून को सुबह 7.30 बजे मेरे पास जनसंघ के स्थानीय कार्यालय से एक फोन आया। दिल्ली से जनसंघ के सचिव रामभाऊ गोडबोले का एक अत्यावश्यक संदेश था। वे कह रहे थे कि मध्य रात्रि के तुरंत बाद जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई और अन्य महत्त्वपूर्ण नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया है। गिरफ्तारी जारी है। पुलिस शीघ्र ही अटलजी और आपको गिरफ्तार करने के लिए पहुँचने वाली होगी। मैंने यह सूचना श्याम बाबू को दी। इसके बाद हम लोग एक साथ अटलजी के कमरे में गए। इस संबंध में संक्षिप्त चर्चा के बाद हम इस निर्णय पर पहुँचे कि हम लोग गिरफ्तारी से बचने का प्रयास नहीं करेंगे।

 

8.00 बजे आकाशवाणी से समाचार सुनने के लिए मैंने रेडियो चलाया। मुझे आकाशवाणी समाचारवाचक की परिचित आवाज के स्थान पर इंदिरा गांधी की गमगीन आवाज सुनाई दी। यह उनका राष्ट्र के नाम किया जानेवाला अचानक प्रसारण था, इस सूचना के साथ कि राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आपातकाल घोषित कर दिया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आंतरिक अशांति से निबटने के लिए आपातकाल लागू करना आवश्यक था।

 

मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ, जब मैंने उन्हें यह कहते हुए सुना कि विपक्ष के बहुत बड़े षडयंत्र से देश को बचाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही उनका मनगढ़ंत आरोप यह था कि कुछ ऐसे तत्त्व हैं, जो लोकतंत्र के नाम पर भारत के लोकतंत्र को मिटाने के लिए तत्पर थे और इसे रोकने की आवश्यकता थी।

 

अटलजी और मैंने एक संयुक्त प्रेस वक्तव्य तैयार किया, जिसमें जयप्रकाशजी* और अन्य नेताओं की गिरफ्तारी की भर्त्सना की गई, आपातकाल की निंदा की गई और घोषणा की गई कि 26 जून, 1975 का वही ऐतिहासिक महत्त्व होगा, जो स्वतंत्रता पूर्व अवधि में 9 अगस्त, 1942 का है, जब महात्मा गांधी ने ब्रिटिश शासकों से कहा था-'भारत छोड़ो।'

हालाँकि यह वक्तव्य एक व्यर्थ प्रयास था। लोगों तक इस संदेश को पहुँचाने का कोई माध्यम ही नहीं था, क्योंकि आपातकाल की घोषणा के साथ ही सरकार ने तानाशाही की चिरपरिचित परंपरा के अनुकूल प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी। स्वतंत्रता के बाद पहली बार प्रेस पर पूर्ण सेंसरशिप** लगाई गई थी।

 

पुलिस हम लोगों को गिरफ्तार करने के लिए सुबह 10.00 बजे आ पहुँची। प्रख्यात समाजवादी नेता मधु दंडवते भी एक अन्य संसदीय समिति की बैठक में भाग लेने के लिए बंगलौर में मौजूद थे, उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। हम चारों को बंगलौर सेंट्रल जेल ले जाया गया। उस दिन, मेरी डायरी*** में उल्लिखित है-''26 जून, 1975 का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का अंतिम दिन हो सकता है। आशा करता हूँ कि मेरा यह भय गलत सिध्द हो।'

-लालकृष्ण आडवाणी

(यह लेख वरिष्ठ भाजपा नेता एवं पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की आत्मकथा 'मेरा देश मेरा जीवन' से लिया गया है। प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का लोकार्पण 25 जून को भोपाल में श्रीश्री रविशंकर करेंगे )

 

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