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बेगम अख्तर : कर्मभूमि में ही परिचय को मोहताज

किसी को गुमान भी नहीं था कि 1910 में फैजाबाद के नक्खास इलाके में मुशतरी बाई के घर पैदा होने वाली बिब्बी आगे चलकर मल्लिका-ए-गंजल बनेंगी जिसे दुनिया बेगम अंख्तर के नाम से जानेगी। शुरूआती दिनों में अख्तरी बाई और फिर बैरिस्टर इश्तियाक अहमद अब्बासी से निकाह करने के बाद बेगम अंख्तर के नाम से मशहूर हुई इस महान गायिका ने न केवल ंगंजल वरन् ठुमरी, दादरा गाने में भी उस्ताद थीं और सोजो-सलाम और नौहे भी वह समझती थीं।

अब इसे क्या कहा जाये कि बेगम अंख्तर जैसी शंख्सियत आज अपनी जन्म एवं कर्मभूमि में ही जैसे परिचय की मोहताज हो गयी हैं और कभी उनके नाम पर फख्र महसूस करने वाले शहर के लोग अब मौकों पर भी उनकी याद ताजा करने की ंजहमत भी नहीं उठाते। यहां तक कि उनके जन्मदिन अथवा पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि तक देने की औपचारिकता नहीं निभायी जाती।

लखनऊ के ठाकुरगंज इलाके में पसन्दबाग में अपनी मां बंडी मुशतरी बाई की कब्र के पास ही दफन अंख्तरी बेगम की कब्र पर कोई शमां जलाने वाला नहीं है। उनकी कोठियां बिक चुकी हैं और उन्हें ढहाकर नई इमारतें बुलन्द हो चुकी हैं। कम लोगों को ही यह मालूम है कि उनके पति बैरिस्टर अब्बासी देश के बंटवारे के बाद पाकिस्तान जाने पर आमादा थे लेकिन बेगम अंख्तर ने यह कहकर उन्हें रोक लिया कि वह हिन्दुस्तान और यहां के संगीत के बिना नहीं रह सकतीं। यह अलग बात है कि आज उन्हें उनके अपने ही देश में भुला दिया गया।

मामूली पंढी-लिखी और सामान्य सूरत किन्तु नेक सीरत वाली बेगम अंख्तर ने कई फिल्मों में नायिका की भूमिका भी निभायी और उनकी फिल्म 'अमीना' अपने ंजमाने में खासी मशहूर हुई जिसमें उनके नायक प्रसिद्ध फिल्म लेखक आंगा जानी कश्मीरी बेदिल लखनवी थे। उनका अधिकांश समय लखनऊ में ही गुजरा हालांकि वह रामपुर के नवाब रंजा अली खां के अरबाब निशात (गाने-बजाने वाला विभाग) में शामिल थीं।

गुजरात के अहमदाबाद शहर में 30 अक्टूबर 1974 को उन्होंने आखिरी सांस ली लेकिन उनकी इच्छानुसार उन्हें लखनऊ लाकर दफनाया गया। आज हाल यह है कि उनकी कब्र पर आसपास रहने वाले लोगों को भी यह नहीं पता कि उनके नंजदीक किस शख्सियत की कब्र है। भारत सरकार द्वारा 1968 में 'पद्मश्री' और मरणोपरात् 'पद्मभूषण' दिया गया लेकिन प्रदेश सरकार ने उन्हें याद रखने के सिलसिले में कोई कदम नहीं उठाया।

बेगम अंख्तर की तमन्ना आखिरी समय तक गाते रहने की थी जो पूरी भी हु। मृत्यु से आठ दिन पहले उन्होंने मशहूर शायर कैफी आंजमी की यह गंजल रिकार्ड की थी-

सुना करो मेरी जां, उनसे उनके अफसाने।सब अजनबी हैं यहां, कौन किसको पहचाने॥

1 दिसम्बर 2007

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

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