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जाने और लौट आने के बीच

स्टेशन से दीदी का घर करीब एक मील है।इतनी गर्मी में वहां पैदल जाना असहनीय सा लग रहा है।सामने खड़े रिक्शा वाले को आवाज़ देना चाहता हूं लेकिन जेब में पड़ा पचास का नोट जैसे व्यंग्य-सा कर उठा है।क्षण भर के लिये नज़र चारों ओर दौड़ाई और बैग उठा कर आगे बढ़ आया हूं।
करीब आधा घंटा लगा है मुझे दीदी के यहां पहुंचने में।दीदी दरवाज़े के पास खड़ी है।मुझे देखते ही कुछ कदम आगे बढ़ आयी है।
-आओ...! दीदी ने आगे बढ़ते हुए कहा है।मैं खामोशी से दीदी के पीछे-पीछे सीढ़ियां चढ़ने लगा हूं।
-कैसे आना हुआ? कोई पत्र बगैरा भी नहीं लिखा?
-कल इन्टरव्यू है।
-कहां?
-यहीं स्टेट बैंक में।
मुझे ड्र्र्ाइंर्गरूम में बिठा कर दीदी बाहर चली गई है।लौटी तो हाथ में पानी का गिलास था।
-पापा कैसे हैं? पानी का गिलास मेरी ओर बढ़ाती हुई दीदी बोली है।
-ठीक हैं। अनायास ही जैसे मुंह से निकल आया है।वैसे तो पापा ने भी कहा था कि मैं उनकी बिमारी के बारे में दीदी से कुछ न कहूं।लेकिन मैंने निश्चय कर लिया था कि दीदी से सब कुछ स्पष्ट कह दूंगा।मुझसे यह बोझ अकेले सहन नहीं होता।लेकिन दीदी के पूछने पर शब्द जैसे स्वयं ही बदल गये हैं।
-डाक्टर अंकल आते रहते हैं? दीदी जैसे मेरे चेहरे से कुछ भांप सी गयी है और शायद इसीलिये यह प्रश्न रख दिया है।
-हां! छोटा सा उत्तर देकर मैं फिर खामोश हो गया हूं।दीदी एकटक मेरी ओर देखने लगी है।मुझे ऐसा लग रहा है जैसे दीदी की नज़र मेरी कमीज़ के फटे हुए कॉलर पर टिक गयी है।उसे छिपाने के लिये मैंने गर्दन दायीं ओर घुमा ली है और दीवार पर लगे हुए चित्र को देखने लगा हूं।
-पहले इन्टरव्यू दी थी उसका क्या बना?
-रिटन टेस्ट में तो पास था लेकिन इन्टरव्यू में सिलैक्ट न हो सका।एप्रोच भी तो नहीं थी। मैं फीका सा मुस्करा दिया हूं।
दीदी उठ कर बाहर चली गयी है।उसी समय पर्दे के पीछे एक आकृति उभरी।मंै कुछ सीधा होकर बैठ गया हूं।परदा हटा तो दीदी की सास थीं।मैंने उठ कर प्रणाम किया।
-क्या हाल है बेटा?...बैठो!...पिताजी कैसे हैं?
-जी सब ठीक है।मेरी नज़र अपने बूटों की ओर झुक गयी है और मैं उन्हें सामने पड़ी मेज़ के नीचे छिपाने की कोशिश करने लगा हूं।
-मैं तो बहु से कब से कह रही थी कि तुम्हे एक पत्र लिख दे।वहां से कुछ चीज़ें मंगवानी थीं।
मैं निरूत्तर-सा गर्दन झुकाये बैठा हूं।मुझे कुछ नहीं सूझ रहा क्या बात करूं।कुछ ही देर बाद दीदी चाय की ट्र्े लिये हुए भीतर आ गई।मां जी उठ कर बाहर चली गयी हैं।
दीदी मुस्कराने का असफल प्रयास कर रही है।लेकिन दीदी अपनी गम्भीरता को अधिक देर तक नहीं रोक पायी।कुछ फीके स्वर में दीदी ने कहा है- बिट्टू! सोचती हूं पापा मेरी शादी न करते तो अच्छा था। मैं चौंक-सा पड़ा हूं और एकटक दीदी के चेहरे की तरफ देखने लगा हूं।
-हां बिट्टू! तुम भी सोच रहे होगे मैं यह सब क्या कह रही हूं।सच ही तो है! तुम्हारा और पापा का घर में अकेले रहना ...सच कहूं तो मैं बिल्कुल नहीं चाहती थी कि मेरी शादी हो।लेकिन पापा की ज़िद्द...और फिर अब तो पापा जिस हालत में हैं ् उन्हें अधिक देखभाल की आवश्यकता है।पिछले रविवार राघव आया था तो उसी ने सब कुछ बताया।मैंने आना भी चाहा था लेकिन मां जी ...।ये भी उन दिनों टूर पर थे।कई बार सोचती हूं ये सब बन्धन तोड़ कर हमेशा के लिये चली आऊं।लेकिन यही सोच कर रूक जाती हूं कि यह भी तो पापा के लिये एक गहरा सदमा होगा।
क्षण भर के लिये दीदी ने दरवाज़े की ओर देखा फिर धीमे स्वर में बोली- यदि पापा को मेरी शादी करनी ही थी तो किसी बराबर वाले घर में करते।उन्होंने सोचा होगा यहां धन-दौलत है और मेरा जीवन अच्छा गुज़ऱ जायेगा।लेकिन उन्होंने यह नहीं सोचा कि अगर धन दौलत वालों ने अपनी इच्छाएं ज़ाहिर की तो क्या वे पूरी कर पायेंगे? बिट्टू मैं पापा पर यह इल्जाम नहीं लगा रही।यह तो उनकी मासूमियत थी जिसे तुम्हें बता रही हूं...।
दीदी की बातें सुन मैं कहीं गहरे में डूबने सा लगा हूं।...दीदी ठीक ही तो कह रही है।...मेरे ऊपर हो रही हर प्रतिकिया का अर्थ ज्ैसे दीदी को स्पष्ट होता जा रहा है।
बिट्टु मैं जानती हूं मेरी बातें सुन कर तुम दु:खी हो रहे हो।लेकिन कुछ मत महसूसना।मैंने जो सब कहा वैसा मैंने शुरू-शुरू में सहन किया।अब ऐसा नहीं है।इनका स्वभाव कुछ ठीक है वरना मैं अब तक घुट-घुट कर मर गयी होती।हां अब भी एक घुटन है जब पापा की बिमारी का सुन कर भी मैं उनके पास नहीं आ पाती।... अब तुम्हीं पर भरोसा है उन्हें हर हाल में खुश रखना।बड़े भाई ने हमारे साथ जो किया उसे दोहराने से काई लाभ नहीं।वो सब भूल जाना ही बेहतर है...।दीदी का स्वर कुछ भीग सा गया है।
- आओ बाहर बैठते हैं...।कहते हुए दीदी उठ खड़ी हुई। मैं कुछ ऐसा ही चाहता था।कमरे की हवा भी बोझिल सा करने लगी थी।
बाहर मां जी खाना बना रही हैं।हमारे आते ही उठ खड़ी हुइंर् और तार पर लटक रहे तोलिये से हाथ पोंछती बोली- बहु बाकी के फुलके बना दे। मैं बिमला के यहां जा रही हूं... तेरे बाऊजी आएं तो उन्हें खाना परोस देना।
मैं सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ गया हूं।आते-आते सोचा था दीदी से बहुत बातें करूंगा।लेकिन अब लगता है जैसे वे बातें दीदी के जीवन से बहुत पीछे छूट गयी हैं।मुस्कराते हुए कहा है मैंने- दीदी बहुत बदल गयी हो।अब गुस्सा किस पर निकालती हो?
दीदी ने हंसते हुए क्षण भर को मेरी तरफ देखा फिर गर्दन झुकाती बोली- बदलना ही पड़ता है।
एक चुप्पी-सी बंध गयी है।
-तुम खाना खा लो भूख लगी होगी।
-नहीं अभी नहीं। बना लो इकटठे ही खायेंगे।
इतने में किसी के ऊपर आने की आहट हुई । मेरी नज़र सीढ़ियों के दरवाज़े की ओर उठ गयी।दीदी के ससुर हैं।मंैने उठ कर उन्हें प्रणाम किया।कुशल-समाचार पूछ कर वे भीतर चले गये हैं।
खाना खा कर मैं दीदी के कमरे में आ गया। थोड़ी देर बाद दीदी भी अन्दर आ गयी।
-जीजा जी कितने बजे आते हैं?
-वे तो छ: बजे आते हैं।
मैं पास पड़ी प्रत्रिका के पन्ने पलटने लगा हूं।
-पिछली बार एक कमीज़ का पीस देकर आयी थी तुम्हें।
ऐसा लगा है जैसे किसी ने गहरी खाई में धकेल दिया है मुझे।जिस बात का मुझे डर था वही हुआ।कुछ हिम्मत करके मंने दीदी की ओर देख कर मुस्कराते हुए कहा- दीदी आजकल कपड़ा इतना महंगा नहीं है जितनी सिलाई।
मुझे अपनी हंसी स्वयं को ही फीकी लगी है।लेकिन कुछ ओर कहते नहीं बन पड़ा।छोटी-मोटी बातें पूछते-पूछते दीदी की आंख लग गयी। मंैने भी करवट बदल ली है।
रात को जीजा जी आये तो दीदी ने उन्हें मरी इन्टरव्यू के बारे में बताया।जीजा जी मुस्करा दिये हैं।मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा है।
सुबह नौ बजे तैयार होकर जीजा जी के साथ ही घर से चल पड़ा।मुझे बैंक के नज़दीक छोड़ कर वे आगे चले गये हैं।
काफी लड़के आये हुए हैं इन्टरव्यू देने।करीब एक घंटे के बाद मेरा नम्बर आया।बाहर आया तो निराशा से घिर गया क्योंकि इन्टरव्यू ठीक तरह से नहीं दे पाया हूं।
घर पहुंचा तो दीदी ने उत्सुकता से पूछा- क्या बना?
-ठीक हो गया है।अभी रिज़ल्ट तो कुछ दिन बाद ही मिलेगा।
-काफी लड़के आये होंगे?
-नहीं कोई ज़्यादा नहीं थे।
-बिट्टू मेरा मन कहता है इस बार तुम अवश्य सिलैक्ट हो जाआगे।
-हां! मुझे भी ऐसा लगता है। मैं मुस्करा सा दिया हूं।
-दीदी गाड़ी चार बजे जाती है मुझे चलना चाहिये।
-आज रूक जाओ ...।
-नहीं पापा इंतज़ार करेंगे।
-खाना खा कर जाना।
-लेट हो जाऊंगा।
दीदी चुप है।मैं भीतर से बैग उठा कर मां जी को प्रणाम करने गया तो उन्हाोंने कुछ मुस्कराते हुए कहा- बेटा बहु को कुछ चीज़ें बतायी हैं किसी के हाथ आते-जाते भेज देना।
-जी! स्वीकृति में गर्दन झुका कर आगे बढ़ आया हूं।दीदी मेरे पीछे-पीछे सीढियां उतरने लगी है।नीचे वाले दरवाज़े के पास आ कर ख्क गया हूं।
-अब तुम कब आओगी?
-अभी कुछ नहीं कह सकती।प्रोग््रााम बना तो लिख दूंगी।... तुम पत्र लिखते रहना।...डाक्टर अंकल को कभी स्वयं ही बुलवा लिया करो...।
ंमैं खामोश हूं।कुछ क्षण रूक कर दीदी ने कहा - ये कुछ चीज़ें लिख दी हैं।अगले मास पन्द्रह तारीख को करवाचौथ का व्रत है ये सब लेकर आ जाना।और कागज़ के एक पुऱ्जे के साथ पांच-पांच सौ के दो नोट दीदी ने मेरे हाथ पर रख दिये हैं।
-ये क्या? मैं चौंक सा पड़ा हूं।
-कुछ नहीं...!
मैंने इनकार करना चाहा है लेकिन दीदी ने मेरी मुट्ठी दबा दी है।बैग उठा कर आगे बढ़ गया हूं।एक बार पीछे मुड़ कर देखना चाहता हूं लेकिन हिम्मत नहीं कर पा रहा हूं।और अब ... जल्दी ही दीदी की आंखों से ओझल हो जाना चाहता हूं।... ...

विकेश निझावन
अप्रेल 4
, 2006
 

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