मुखपृष्ठ  कहानीकविता | कार्टून कार्यशालाकैशोर्यचित्र-लेख |  दृष्टिकोणनृत्यनिबन्धदेस-परदेसपरिवार | फीचर | बच्चों की दुनियाभक्ति-काल धर्मरसोईलेखकव्यक्तित्वव्यंग्यविविधा |   संस्मरण | सृजन स्वास्थ्य | साहित्य कोष |

 

 Home | Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | FeedbackContact | Share this Page!

 Click & Connect : Prepaid International Calling Cards 

 
चैनल्स  

मुख पृष्ठ
कहानी
कविता
कार्यशाला
कैशोर्य
चित्र-लेख
दृष्टिकोण
नृत्य
निबन्ध
देस-परदेस
परिवार
फीचर
बच्चों की दुनिया
भक्ति-काल धर्म
रसोई
लेखक
व्यक्तित्व
व्यंग्य
विविध
संस्मरण
सृजन
स्वास्
थ्य
साहित्य कोष
 

   

 

 

उसकी मौत
बाबूजी आपको यह जान कर सदमा पहुंचेगा कि आज मेरे हाथों किसी का खून हो गया है।खून के इल्ज़ाम में किसी को क्या सज़ा मिलती है इससे आप भली-भांति परिचित हैं।सज़ाए-मौत न भी मिले उम्र कैद तो मिलेगी ही।और उम्र कैद में आदमी घुट-घुट कर गल-गल कर मर जाता है।लेकिन सच कहूं बाबूजी यह खून मैंने नहीं किया है।
आप पूछेंगे यदि खून मैंने नहीं किया है तो फिर मुझे कातिल करार क्यों दिया जा रहा है? दरअसल जिस व्यक्ति का खून हुआ है उसके जिस्म पर मेरी ही अंगुलियों के निशान हैं।लेकिन यकीन मानिये बाबूजी यह खून मैंने नहीं किया है।मैं आपको कैसे विश्वास दिलाऊं।आप मेरी पूरी बात सुनेंगे तो आपको अवश्य ही यकीन आ जायेगा।आपको यकीन आ जायेगा तो आप मेरे गवाह बन सकते हैं।और हो सकता है आपकी गवाही से ही मैं इस इल्ज़ाम की सज़ा भुगतने से बच जाऊं।
इस खून की साज़िश आज से सात रोज़ पहले ही शुरू हो गयी थी।सच कहता हूं मैं इस साज़िश में कतई शामिल नहीं था।आप पूछेंगे कि यदि मैं इसमें शामिल नहीं था तो मुझे यह सब कैसे पता चला।मुझे कैसे पता चला यह तो मैं नहीं जानता लेकिन मैं परमात्मा की कसम खा कर कहता हूं कि मैं इस साज़िश में शामिल नहीं था।और फिर आपको अच्छी तरह याद होगा कि आज से सात रोज़ पहले तो मैं आपके पास ही था।सात दिन की छुटिटयां जे ली थीं मैंने।इन सात दिनों में क्या-क्या हुआ मैं एक-एक बात बिल्कुल सही-सही बता दूंगा आपको ताकि आपके मन में मेरे प्रति कोई सन्देह की भावना न बनी रह जाए।
आज से सात रोज़ पहले मैं आपके पास पहुंच गया था।अपने आने की सूचना मैंने आपको पहले से पत्र दवारा दे दी थी।
मेरे आने की आपको कितनी प्रसन्नता हुई थी इसका अनुमान मुझे पूरा-पूरा हो गया था।और सच कहूं आपके इस व्यवहार से मैं पिघल-पिघल गया था।
मैं मानता हूं कि मैं शुरू से ही कुछ कठोर स्वभाव का रहा हूं जैसा कि आप कहा करते हैं।लेकिन मेरे इस कठोर स्वभाव ने आपकी भावनाआें को कभी न समझा हो ऐसा भी नहीं है।और मेरा यह कठोर स्वभाव इस कद्र भी नहीं है कि मैं किसी का खून कर बैठूं।परन्तु आज जे खून हुआ है उस व्यक्ति के जिस्म पर मेरी ही अंगुलियों के निशान हैं।लेकिन बाबूजी मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि यह खून मैंने नहीं किया है।
मैं आपके पास सात दिन रहा। इन सात दिनों में ढेर सारी बातें हुई थीं हमारे दर्मियान।आप उन दिनों आर्थिक परिस्थितियों से गिरे हुए थे।आपने बताया था कि पिछले दिनों अतुल काफी बीमार रहा जिसकी वजह से उसकी आठ-दस रोज़ की तन्खवाह भी कट गयी।
आपकी परेशानी देख मैंने उसी वक्त आपके हाथ में दो हज़ार रूपये थमा दिये थे ताकि आप घर-भर का राशन-पानी ला सकें।मैं केवल सात दिन के लिये आया था और मैं नहीं चाहता था इन सात दिनों में किसी तरह का बोझिल वातावरण इस घर में बना रहे। आप भी सोच रहे होंगे कि मेरी इन बातों का उस खून से क्या वास्ता।क्या आप मेरी उन बातों से उस व्यवहार से ऐसा जान पाये थे कि मैं किसी का खून करने वाला हूं।सच कहता हूं मैंने अपने चेहरे पर अपने शब्दों पर कोई लबादा नहीं ओढ़ा था।
तीन दिन किस तरह गुज़र गये पता ही नहीं चला था।चौथे रोज़ पता नहीं कैसे मेरा ध्यान घर की एक-एक चीज़ की ओर उठने लगा था।मुझे लगा था इस घर की जीव और निर्जीव सभी वस्तुएं कुछ अव्यवस्थित सी हुई पड़ी हैं।मां की टूटी हुई चप्पलें रज्जो की फटी हुई कमीजें़ अतुल की बेरौनी आंखें कुछ भी तो नहीं समझ पाया था मैं।ऐसी हालत तो कभी नहीं थी इस घर की।आपका हर बात में यह कहना कि महंगाई बहुत बढ़ गयी है मुझे अब सही लगने लगा था।यहं पर मुझे अपने अकेले होने की वजह से शायद इस बात का कभी अहसास नहीं हो पाया होगा।मेरे हर माह केवल तीन हज़ार रूपया भेज देने से क्या बन सकता है आप लोगों का।
शाम को मैं मां और रज्जो को बाज़ार ले जाने वाला था।जाते-जाते मैंने आपसे पूछा था- बाबूजी आपको कुछ चाहिये हम बाज़ार जा रहे हैं।आपने ज़रा सी झिड़क लगाते हुए कहा था ् क्यों पैसा खराब करते हो मुझ पर।मुझे कौन सा दफ्तर जाना होता है।जो दो पैसे मुझ पर खर्च करना चाहते हो मुझे दे दो।कभी मुसीबत में काम आएंगे।
मुझे एक बात अब भी नहीं भूल रही।मां और रज्जो चीजे खरीदते वक्त इस कदर सकुचा रही थीं जैसे मैं उनके लिये बिल्कुल अजनबी हूं।उनका वो डरा-डरा ् सहमा-सहमा चेहरा अब भी मेरे ज़हन में उसी तरह छाया हुआ है।
पांचवें रोज़ रज्जो ने मुझे डरते-डरते बताया था कि वह जल्दी ही कहीं नौकरी करने की सोच रही है।शायद उसने सोचा होगा कि कहीं यह सुन कर मुझे बुरा न लगे। मुझे कतई बुरा नहीं लगा था।आज के वक्त में सभी लड़कियां स्वावलम्बी होना पसन्द करती हैं। लेकिन इस बात के लिये आप जैसा पुराने विचारों वाला व्यक्ति इजाजत दे देगा इसकी सोच मुझे अवश्य पड़ गयी थी।और मैंने रज्जो से हंसते हुए कहा था- बाबूजी से तो पूछ लिया होता।
यह सलाह उन्हीं ने तो दी है।यह बात उसने इस ढंग से कही थी जैसे वह आप पर कोई इल्ज़ाम लगा रही हो।गुस्सा तो बहुत आया था उस पर।लेकिन मैं खामोश बना रहा।सच मानिये बाबूजी आपके बदलते हुए विचारों को देख कर मुझे बहुत खुशी हुई थी।
बाबूजी आपको मेरी इन बातों से अवश्य ही ऊब और खीज हो रही होगी।दरअसल जब से उस व्यक्ति का खून हुआ है मैं कुछ बौखला सा गया हूं।कभी-कभी मुझे वाकयी में खुद पर ही सन्देह होने लगता है।इसीलिये मैं आपको सारी बात बतला कर किसी स्पष्टीकरण तक पहुंचना चाहता हूं।अगर गलती मेरी है तो मुझे सज़ा मिलनी ही चाहिये।आप मेरे पिता हैं आप तो इन्साफ कर सकते हैं।
मेरे यहां लौटने में तीन दिन बाकी रह गये थे।उस रोज़ बाज़ार से लौटा तो कदम दरवाजे पर ही रूक गये।भीतर से आपकी किसी को डांटने की आवाज़ आ रही थी।मैं तेज़ी से भीतर गया।रज्जो दीवार से सर टिकाये सुबक रही थी।
-क्या बात हो गयी बाबूजी? मंैने भीतर प्रवेश करते ही आपसे पूछा था।
-अच्छी -भली पांच हज़ार की नौकरी मिल रही है और इसे पसन्द नहीं।आप झुंझलाते हुए बाहर चले गये थे।
म्ंौं रज्जो के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला था- कैसी नौकरी है मुझे भी तो पता चले?
-भैया आप इसे नौकरी कहते हो।यह तो मुझे बेचने की साजिश चल रही है।
-रज्जो! मैं चौंका था।
-हां भैया! जिस व्यक्ति ने यह नौकरी दिलाई है बाबूजी उसके लड़के से मेरी शादी करना चाहते हैं और वह लड़का...।
-तुम्हें यह सब कैसे पता चला? मैंने उसकी बात लगभग काट ही दी थी।
-आज सुबह बस-स्टॉप पर मेरा पीछा करता आ गया।उसी ने सब कुछ बतला दिया।
उस वक्त मैं यह नहीं समझ पाया था कि आप गलत हैं या रज्जो।भला आप उसका बुरा क्यों सोचने लगे।और मुझे रज्जो की नादानगी पर हंसी आ गयी थी।
अगले रोज़ शाम को मैं लौटने की तैयारी में था।अटैची में कपड़े़ बगैरा डाल रहा था तो अतुल आ गया।मेरे सामने ही बैठा वह कहीं शून्य में ताकने लगा था।अटैची में अपना गर्म कोट डालते हुए मेरे हाथ सहसा रूक गये।
-अतुल! मैंने आहिस्ता से पुकारा था उसे।
-हुं! किसी गहरी सोच में डुबा था वह।
-यह कोट तो पहन ज़रा।
-कोट! वह चौंका था जैसे।-आपका कोट मुझे कैसे पूरा आयेगा?
-पहन तो जरा मुझे छोटा हो गया है।वहां नया सिलने के लिये दे आया था। जाते ही मिल जायेगा।यह बात झूठ ही कही थी मैंने।लेकिन इतनी सर्दी में अतुल को बिना कोट के देख मुझे अच्छा नहीं लगा था।
-एक बात पूछूं भैया? उसने कोट पहनते हुए कहा।
-हां-हां पूछो!
-आपको कितनी तन्खवाह मिलती है? उसका इस तरह से पूछना मुझे बहुत अजीब लगा था।
-क्यों? तुझे क्या ज़रूरत पड़ गयी यह सब पूछने की? कोई पैसे-वेसे चाहियें क्या?
-नहीं मुझे कुछ नहीं चाहिये।आप जब से आये हैं हम पर पैसा ही पैसा खर्च करते जा रहे हैं।क्या वाकयी में आपकी इतनी तन्खवाह है?
-तो तू सोच रहा है कोई डाका मारकर लाया हूं मैं।
-नहीं! आप मेरी बात गलत समझ गये।दरअसल आप जैसा सोचते हैं यहां वैसा नहीं है।किसी चीज़ की कमी नहीं है यहां।
-सचमुच! यहां तो सब कुछ नज़र आ रहा है।रईसों जैसा खाना पीना ओढ़ना...! मैंने व्यंग्य किया।
-भैया आप समझते क्यों नहीं...। मुझे लगा था किसी बात के लिये वह बहुत होशियार बनने की कोशिश कर रहा है।
-तू कहना क्या चाहता है।जो मैं नहीं समझा तू समझा दे।मैं गुस्से में आ गया था।
-मैं वही समझाना चाहता हूं भैया! पिछले मास मैं कतई बीमार नहीं था।पूरा मास ऑफिस जाता रहा।पूरे आठ हज़ार तन्खवाह मिली थी।पूरे पांच हज़ार मैंने बाबूजी के हाथ पर रखे थे।बाबूजी ने सब झूठ कहा था आपसे।
-झूठ कहा था! मैं जड़ हो आया था- किसलिये? बड़ी हिम्मत करके पूछा था मैंने।
-इसलिये कि आप आओ और हमारी अच्छी हालत देख कर कुछ दिये बिना ही लौट जाओ।उसकी आवाज़ कांप रही थी और पसीना उसके माथे से छलकने लगा था।
बाबूजी ् मैं नहीं चाहता था कि आप अपने बच्चों की नज़र में ही इस कदर गिर जाएं।स्थिति को संभालने के लिये मैंने कह दिया था- जानते हो बाबूजी सब कुछ तुम्हारे लिये ही तो कर रहे हैं।दो पैसे जोड़ लेंगे तो तुम्हारा ही तो भला होगा।
म्ंौंने आपसे कोई गिला नहीं किया था क्योंकि मैं समझ गया था कि आप किसी न किसी तरीके से भविष्य के लिये कुछ जोड़ लेना चाहते हैं।
शाम पांच बजे की गाड़ी पकड़नी थी मुझे।आपसे विदा लेते हुए मैंने कहा था- बाबूजी! किसी बात की चिन्ता मत किया करें।रज्जो के लिये जल्दी ही मैं कोई अच्छा सा लड़का ढूंढ लूंगा।
आपकी आंखें नम हो आयी थीं।चश्मे को पगड़ी के पल्लू से पोंछते हुए आपने कहा था - हो सके तो अगले मास पैसे थोड़े ज्यादा भेज देना।
स्टेशन तक मां और अतुल छोड़ने आये थे मुझे।गाड़ी आने में अभी कुछ वक्त था।अतुल कहीं भीड़ में टहलने लगा था।मां ने चिन्तित होते हुए कहा था- अपनी सेहत का ध्यान रखा कर।
-अच्छा-भला तो हूं।मेरी चिन्ता क्यों होने लगती है तुझे?
-सुन! मां ने गहरी उदास नज़रों से मेरी ओर देखा।
-क्या बात है मां? मैं किसी शंका से घिर आया था।
-ये कुछ गहने हैं।इन्हें साथ ले जा।मां ने अपनी धोती के बीच ठुंसी हुई पोटली निकाली ।
-किसलिये? मैं विस्मय में पड़ गया था।
-बहु के लिये बनवा कर रखे थे मैंने।
-बहु के लिये! मंै ठहाका मार कर हंसा था- बहु को तो आ लेने दे।और फिर तू कहीं भागने की तैयारी में है क्या?
-भागने की तैयारी में होती तो यह साथ लेकर जाती।मैं अब इस घर में कुछ नहीं रखना चाहती।
-क्यों? मैं लगभग चिल्ला उठा था।
-तुझे नहीं पता तेरे बाबूजी की ऐय्याशी की आदतें अभी भी नहीं छूटीं।घर में जो भी आता है सब लुटा कर आ जाते हैं।
एकाएक मेरे सामने अतुल और रज्जो का चेहरा घूम गया।
-इतने दिन रहा पहले क्यों नहीं बताया?
-हिम्मत ही नहीं बनी।और फिर तू क्या करता?
मन कड़वाहट से भर उठा था।तभी गाड़ी आने का शोर हुआ और स्टेशन पर भाग-दौड़ मच गयी।
-हम घर चलेंगे मां! मैंने आहिस्ता से कहा था।
-क्यों?
-पूछना चाहता हूं बाबूजी से कि यह बरबादी किसलिये?
-जिस बात का जवाब मैं सारी उम्र न पा सकी तू दो घड़ी में क्या पा लेगा।
अतुल पास आ गया था।सामान उठा कर गाड़ी की तरफ जाने लगा था।मैंने उसे रोक लिया।
-हम घर चलेंगे मां! मैंने पुन: अपनी बात पर ज़ोर देते हुए कहा।
-जल्दी चल खड़ा क्यों हो गया तू? गाड़ी थोड़ी देर रूकती है कोई अच्छी सी जगह ढूंढ लेना।मां ने अतुल को लगभग आगे धकेल दिया था।अतुल कुछ भी नहीं समझ पााया था हमारी बात।
-मां! मैं चिल्लाया था।
-पागल मत बन! जितना भी संभाला है बड़ी मुश्किल से संभाला है मैंने उन्हें।मां चलते-चलते बोली थी- आगे से पैसे कम भेजा कर।पैसा नहीं होगा तो अपने आप आयेंगे रास्ते पर।
म्ंौं गाड़ी में कब बैठा गाड़ी कब चल पड़ी अब कुछ याद नहीं आता।अब तो बस इतना याद है बाबूजी कि यहां पहुंचते ही उस व्यक्ति का खून हो गया।खून के इल्ज़ाम में किसी को क्या सज़ा मिलती है आप अच्छी तरह जानते हैं ।सज़ाए मौत न भी मिले तो उम्र कैद तो मिलेगी ही।और उम्र कैद में आदमी घुट-घुट कर गल-गल कर मर जाता है।लेकिन मैं मरना नहीं चाहता।परन्तु एक निर्दोष व्यक्ति तभी बच सकता है यदि उसके पास कोई अच्छा-खासा सबूत हो या फिर वह असली कातिल को ढूंढ निकाले।बाबूजी क्या आप असली कातिल को ढूंढ निकालने में मेरी मदद करेंगे

विकेश निझावन
मई 3, 2006

Top

Hindinest is a website for creative minds, who prefer to express their views to Hindi speaking masses of India.

             

 

मुखपृष्ठ  |  कहानी कविता | कार्टून कार्यशाला कैशोर्य चित्र-लेख |  दृष्टिकोण नृत्य निबन्ध देस-परदेस परिवार | बच्चों की दुनिया भक्ति-काल धर्म रसोई लेखक व्यक्तित्व व्यंग्य विविधा |  संस्मरण | सृजन साहित्य कोष |
प्रतिक्रिया पढ़ें! |                         प्रतिक्रिया लिखें!

HomeBoloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | FeedbackContact

(c) HindiNest.com 1999-2015 All Rights Reserved. A Boloji.com Website
Privacy Policy | Disclaimer
Contact : manishakuls@gmail.com