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नाट्य रचना

श्रीभट्

{सलतान ज़ैनुलाबदीन 'बड़शाह` ;१४२०-१४७०ई०द्ध कश्मीर के एक बड़े ही लोकप्रिय, प्रजावत्सल एवं कलाप्रिय शासक हुए हैं। जनता आदर और प्यार से उन्हें 'बड़शाह' यानी बड़ा राजा के नाम से पुकारती थी। कहते हैं कि एक बार उनके शरीर पर छाती के ऊपर एक जानलेवा फोड़ा नमूदार हुआ जिसका इलाज बड़े से बड़े हकीम और वैद्य भी न कर सके। ईरान,अफगानिस्तान,तुर्किस्तान आदि मुल्कों से नामवर हकीमों को बुलाया गया मगर वे सभी नाकाम रहे। तब कश्मीर के ही एक हकीम पण्डित श्रीभट्ट ने अपनी समझदारी और अनुभव से 'बड़शाह` का इलाज किया और उनके फोड़े को ठीक कर उन्हें सेहत बख्श़ी। बादशाह सलामत ने इस एहसान के बदले में श्रीभट्ट के लिए शाही खज़ानों के मुंह खोल दिए और उन्हें कुछ मांगने के लिए अनुरोध किया..... श्रीभट्ट ने जो मांगा वह कश्मीर के इतिहास का एक ऐसा बेमिसाल पन्ना है जिसपर समूची कश्मीरी पण्डित बिरादरी को गर्व है......}


पात्र

सुलतान ज़ैनुलाबदीन 'बड़शाह` १५वीं शती के कश्मीर के लोकप्रिय शासक
पंडित श्रीभट्ट प्रसिद्ध हकीम
शाहज़ादा हैदर शाह सुलतान का बेटा
हकीम मंसूर शाही हकीम
श्रीवर,सोम पंडित प्रसिद्ध कवि एवं विद्वान्
हलमत बेग एक वयोवृद्ध दरबारी
रमज़ान खां,सुखजीवन लाल दो पड़ौसी
एवं
अन्य दरबारी


दृश्य एक

(कश्मीर की राजधानी नौशहरा के एक मौहल्ले की गली में दो पड़ौसी रमज़ान खाँ और सुखजीवनलाल बादशाह सलामत सुलतान जैऩुलाबदीन की सेहत के बारे में आपस में बातचीत कर रहे हैं........)

रमज़ान शेख:- अरे-रे! आज सवेरे-सवेरे कहाँ चल दिए सुखजीवन लाल ?
सुखजीवनलाल:- ओह-हो! तुम हो? रमज़ान शेख!। अरे भाई....... रात को नींद बिल्कुल भी नहीं आई..... घरवाली भी रातभर करवटें ही बदलती रही......। सोचा जल्दी उठकर दरिया में नहा के आऊँ।
रमज़ान:- म-मगर नींद न आने का कोई सबब?
सुखजीवनलाल:- वाह! जैसे तुमको कुछ ख्ा़बर ही नहीं। सुना है बादशाह सलामत की तबियत बिगड़ती ही जा रही है........ सारे हकीमों और वैद्यों ने जवाब दे दिया है।
रमज़ान:- भाई, सुना तो मैंने भी था कि उनका इलाज करने के लिए ईरान,अफगानिस्तान और तुर्किस्तान से शाही हकीमों को बुलवाया गया है-।
सुखजीवनलाल:- ठीक सुना था तुम ने.......! मगर उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए और अपने-अपने मुल्कों को लौट गए.... सुना है कि बादशाह सलामत का फोड़ा नासूर में बदल गया है। यह फोड़ा नहीं, ज़हरबाद है.....एक जानलेवा फोड़ा- एक रिश्ता घाव!..अब तो बस ऊपर वाले का ही सहारा है।
रमज़ान:- भाई सुखजीवन! तुमने बड़ी ही बुरी खब़र सुनाई.......। मैं तो यही समझता था कि बादशाह सलामत ठीक हो गये होंगे। अल्लाह! अब क्या होगा! खुदावंदा! यह तू किस बात की सज़ा हमें दे रहा है? ऐसे नेक और रहमदिल बादशाह के साथ यह ज्य़ादती क्यों?....नहीं-नहीं सुखजीवन लाल, नहीं......ऊपर वाला इतना पत्थरदिल नही हो सकता। ज़रूर कोई रास्ता निकलेगा....ज़रूर.......
सुखजीवनलाल:- हाँ-हाँ रमज़ान भाई, उम्मीद तो मैंने भी नहीं छोड़ी है....... जाने क्यों मुझे लगता है कि कहीं न कहीं से उम्मीद की कोई किरण फूटेगी ज़रूर.....!!
रमज़ान:- आमीन मुम आमीन!...अच्छा यह बताओ कि क्या शाही हकीम हज़रत मंसूर भी नाकाम रहे?
सुखजीवनलाल:- अरे भाई, उनकी बात ही क्या है? बताया न दूसरे मुल्कों के नामवर हकीम भी बादशाह सलामत के फोड़े को ठीक न कर सके और लौट गए...........!
रमज़ान:- ओफ! हाँ- भूल गया मै! बताया था तुमने....म-मगर अब क्या होगा .... ?
सुखजीवनलाल:- बस दुआ करो। शायद हमारी दुआएँ काम आ जाएं.......बड़े बुजुर्गोंं ने ठीक ही कहा है-जब दवा काम न करे तो दुआ करो.......
रमज़ान:- हाँ-हाँ। ठीक है......। मैं भी अभी मस्जिद में जाकर बादशाह सलामत की सेहत के लिए दुआ माँगता हँू........नमाज़ का वक्त भी हो चला है.....चलो चलो। खुदा ताला के दरबार पें आलीजाह की तंदरुस्ती के लिए दुआ माँगे......
सुखजीवनलाल - ज़रूर ज़रूर! मैं भी नहा कर आता हूँ....(दोनों चले जाते हैं)



दृश्य दो

(बादशाह जैऩुलाबदीन रोग-शरया पर लेटे हुए हैं। कमजोरी के मारे उनके अंग-अंग से थकावट झलक रही है....नजरें उदास हैं और वे किसी गहरी सोच मंे डूबे हुए हैं......उनके ईदगिर्द उनका बेटा शाहजदा हैदर, शाही हकीम मंसूर, कुछेक वज़ीर व दरबारी, रिश्तेदार वगैरह सिर झुकाएं खड़े हैं.....। बादशाह धीरे-से आँखे खोलते हैं....अपने सामने बेटे हैदर, हकीम मंसूर वगैरह को देख वे बहुत ही धीमी एवं लरज़ती आवाज़ में कहते हैं..........)

बादशाह:- ओफ!.......अब यह दर्द सहा नहीं जाता बेटा हैदर। खुदाताला यह मुझे किस खता की सज़ा दे रहा है......? मैंने तो हमेशा नेकी का दामन थामा था, फिर यह कहर क्यों? क्यों बेटा, क्यों? हकीम मंसूर साहब!!..........
मंसूर:- आलीजाह!
बादशाह:- क्या मैं अब कभी ठीक नहीं हो सकूँगा? सच-सच बोलना मंसूर क्या मेरा यह रिस्ता फोड़ा मेरी जान लेकर ही मानेगा?.....कश्मीर को इस दुनिया की जन्नत बनाने का मेरा ख्वाब क्या अधूरा ही रहेगा?.....बोलो मंसूर बोलो.......!
मंसूर:- हुजूर-हिम्मत रखें..... आप यों उदास न हों - खुदा साहब एक दरवाज़ा बंद करते हंै तो दस खोल देते हंै.......मुझे तो.........
बादशाह:- नहीं मंसूर नहीं।.........मुझे झूठी तसल्ली न दो....ओफ!- या अल्लाह! मारे दर्द के सारा बदन जैसे सुन्न हो गया है।.... हज़ारों-लाखों बिच्छुओं ने जैसे मेरी इस छाती को काट खाया हो......!! पूरा बदन ऐंठता जा रहा है....! हाय री तकदीर! जाने खुदाताला को क्या मंजूर है?.........!!
हैदर:- अब्बाजान! दिल छोटा न करें.......! पाक परवरदिगार पर भरोसा रखेें... वहीं अब मददगार हैं....सारी रिआया आपकी सेहतयाबी और सलामती की दुआएँ माँग रही है...हाँ अब्बा हुज़ूर! आप ज़रूर ठीक होंगे.....!
मंसूर:- जी हाँ आलीजाह! मस्जिदों और दूसरी इबादतगाहांे में आपकी सलामती के लिए दुआएँ माँगी जा रही है़....गरीबों और नातवानों में खैरात बाँटी जा रही है--- दरवेेशा, मुल्ला और फ़कीर रातदिन खुदाताला से आपकी सेहत की दुआएँ माँग रहे हैं.......!
बादशाह:- (लम्बा नि:श्वास छोड़कर) हाय! अफसोस-! एक छोटा-सा फोड़ा मेरी जान का दुश्मन बन जाएगा, कभी सोचा न था......बेटा हैदर! (करहाकर) अब तो दर्द सहा नहीं जाता ओफ!-ओह!
हैदर:- अब्बाजान! आप इस तरह से दिल छोटा करेंगे तो हम सब की रही-सही हिम्मत भी जाती रहेगी....... हमें सब्र से काम लेना होगा अब्बू!!
बादशाह:- सब्र-सब्र!! कहँा तक सब्र करूँ? यहँा तो मारे दर्द के जान निकल रही हैं- और तुम.....अब सहा नहीं जाता बेटा...... सच कह रहा हँू......!!
हैदर: - अब्बाजान! (गले से लगता है)
(तभी श्रीवर और सोमपण्डित प्रवेश करते हैं)
श्रीवर:- महाराजाधिराज सुलतान जैऩुलाबदीन 'बादशाह' की जय!-आपका इकबाल बुलंद हो महाराज!
बादशाह:- आओ, आओ श्रीवर! क्या खब़र लाए हो (खाँसते हुए......) ओफ! लगता है यह दर्द मेरी जान लेकर ही रहेगा........
श्रीवर:- ऐसा न कहिए महाराज!........ मैं और सोमपंडित अभी-अभी पूरी कश्मीर घाटी घूमकर आए हैं- मालूम पड़ा घाटी के उत्तर में विचारनाग के निकट एक पहुँचा हुआ हकीम श्रीभट्ट रहता है- उसके हाथों में शफ़ा है महाराज!
सोमपंडित:- हाँ महाराज! मुश्किल से मुश्किल बीमारी को ठीक करने में श्रीभट्ट माहिर है......। हम उन्हें अपने साथ ही लाए हैं......। आपकी आज्ञा हो तो उन्हें अन्दर बुलाया जाए-!
बादशाह:- (कुछ सोचकर) ठीक है-बुलाओ उन्हें अन्दर। देखेें शायद उनके हाथों की शफ़ा़ से मेरा दर्द दूर हो जाए-। क्या नाम बताया तुमने उसका श्रीवर?
श्रीवर:-पंडित श्रीभट्ट महाराज।
बादशाह:- श्रीभट्ट! - नाम से ही लगता है कि इम शख्स़ मंे कोई बात ज़रूर होगी.....। श्री का मतलब इकबाल, खूबसूरती, खुशकिस्मती है ना सोमपंडित?
सोमपंडित:- हाँ महाराज! बिल्कुल सही फरमाया आपने।
बादशाह:- खुदा करे मेरी उजड़ती दुनिया मंे भी खूबसूरती लौट आए - शायद श्रीभट्ट ऐसा कर सके!! जाओ.......उसे अन्दर ले आओ....!
(श्रीवर और सोम पंडित महल के बाहर जाकर कुछ देर बार श्रीभट्ट को अपने साथ अन्दर लिया लाते हैं......)

दृश्य तीन

(मोहल्ले की गली में सुखजावनलाल और रमज़ान खाँ आपस में बातें कर रहे हैं।)
सुखजीवनलाल:- अरे भाई वाह! सुना तुमने रमज़ान खाँ! कमाल हो गया-कमाल!!
रमज़ान:- क्या?क्या हो गया? बड़े खुश नज़र आ रहे हो-!
सुखजीवनलाल:- बस कुछ मत पूछो-कमाल से भी बढ़कर कमाल हो गया........हाँ।
रमज़ान:- भाई कुछ बोलोगे भी या यों ही.........
सुख्जीवनलाल:- कमाल नहीं भाई -जादू। हाँ जादू!! साक्षात् जादू.......सात दिन में ही श्रीभट्ट ने वह कर दिखाया जो दूसरे हकीम तीन महीनों में भी न कर सके......सच में श्रीभट्ट के रूप मे ऊपर वाले ने कोई फरिश्ता भेजा था.......।
रमज़ान:- क्या? हमारे आलीजाह ठीक हो गये? तुम सच कहते हो सुखजीवन भाई?
सुखजीवनलाल:- और नहीं तो क्या.......। कौन सी दुनिया में रहते हो तुम? तुमने मुनादी नहीं सुनी? आज रात ज़ूऩडब के शाही बाग में श्रीभट्ट का खुद महाराज वज़ीरों, दरबारियों और जनता की मौजूदगी में एक खास जलसे में अभिनंदन करेंगे और बहुत बड़ा इनाम भी देंगे........।
रमज़ान:- शुक्र है पाक परवरदिगार का कि हमारे गऱीबपरवर आलीजाह ठीक हो गए.....भाई सुखजीवन, यह खब़र सुनकर सचमुच मेरा रोम-रोम खुशियों से भर गया है....मैं आज रात उस जलसे में ज़रूर हाज़िर हूँगा-तुम भी चलना.....।
सुखजीवनलाल:- हाँ-हाँ मैं भी जाऊँगा.......। दोनों चले चलेंगे साथ-साथ.......।

दृश्य चार

(जूनडब का शाही बाग प्रकाश में जगमगा रहा है। अपार जनसमूह के बीच सुलतान जैऩुलाबदीन अपने तख्त़ पर शोभायमान हैं। उनके दाएँ-बाएँ नीचे की ओर वज़ीर, दरबारी और दूसरे अधिकारीगण बैठे हुए हैं......सारा माहौल खुशियों से भरा हुआ है। बहुत दिनों के बाद जनता अपने प्यारे महाराज के दर्शन कर कृतार्थ हो रही है....जनता में अपार उत्साह है और लोग आपस मंे बाते कर रहे हैं- 'वह देखों महाराज वहाँ पर बैठे हैं - उधर- हाँ उधर तख्त पर.........` 'वो रहे श्रीभट्ट- वहाँ उस तरफ दरबारियों की अगली पंक्ति में दाईं ओर की छोर पर -।` 'हाँ-हाँ, देख लिया......वाह! ऊपर वाले ने क्या नूर बख्शा है उनके चेहरे पर!`........ तभी बुजुर्गवार दरबारी हलमत बेग खेड़ होकर जनता से मुखातिब होते हैं-)

हलमत बेग:- साहिबे सदर और हाज़रीन! कश्मीर की अमनपंसद सरज़मीन पर आज आलीजाह एक फरिश्ते को अपने हाथों से प्यार और मोहब्बत का ऐसा नज़राना पेश करने वाले हैं जिसका कश्मीर की तवारीख में कोई सानी न होगा-। ऐसा नायाब तोहाफा जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल होगा। (जनता में जोश-खरोश -तालियाँ......) वह फरिश्ता है हकीम श्रीभट्ट।.....श्रीभट्ट ने वह काम किया है जिसकी जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है.....(तालियाँ........) आलीजाह की जान बचाकर पंडित श्रीभट्ट ने न सिर्फ शाही खानदान पर बहुत बड़ा एहसान किया है बल्कि कश्मीर की अवाम और यहाँ के ज़र्रे-ज़र्र्रेे को अपनी काबलियत का काायल बनाया है.....(तालियाँ एवं आवाजें.....) हकीम मंसूर और बेटा हैदर, तुम दोनों श्रीभट्ट को बाइज़़्जत आलीजाह के पास ले आओ......
बादशाह:- नहीं-नहीं हलमत बेग! मैं खुद उठकर श्रीभट्ट को बाइज्ज़्ा़त लिवा लाऊँगा...
;तख्त़ सेे उठकर श्रीभट्ट के पास जाते है? उनके साथ शाहज़दा हैदर और हकीम मंसूर हैं। तीनांे बड़े अदब के साथ बारी-बारी से श्रीभट्ट को गले लगाकर उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता तख्त़ के पास ले आते हैं। जनता मंे असीम उत्साह और जोश ठाठें मार रहा है। तालियों की आवाज से फिज़ाएं गूंज उठती हैं.........)
श्रीभट्ट:- बस आलीजाह, बस! मुझे और शर्मिंदा न करें.....मैंंने ऐसा कुछ नहीं किया जिसके लिए मुझे इतनी बड़ी इज्ज़त़ दी जा रही है।
बादशाह:- नहीं श्रीभट्ट, नहीं। तुम नहीं जानते कि तुमने कितना बड़ा काम किया है-तुम्हारे एहसान को मैं कभी भूल नहीं सकता-! तुम को देखक़र मुझे जो खुशी हो रही है उसे मैं बयान नहीं कर सकता.....तुम्हारी काबलियत की माबदौलत ही नहीं बल्कि मेरी पूरी सलतनत कायल हो गई है....आज मैं तुम्हारा दामन बेपनाह दौलत से भर देना चाहता हँू- आओ मेरे दोस्त, आओ....मेरे साथ आओ......
(जनता में जोश और उत्साह -आवाजें)
श्रीभट्ट:- हुजूर! आलीजाह! यह तो आपका बुलंद इक़बाल था जिसने इस नाचीज़ को कामयाबी की मंज़िल तक पहुँचाया.......।
बादशाह:- नहीं श्रीभट्ट नहीं। हम तुम्हारी काबलियत को कम करके नहीं आंक सकते....। जिस हुन्नरमंदी से तुमने हमें नई जान बख्शी है उसे भला हम कैसे भुला पाएंगे? सारे गैर-मुल्कों हकीमों को तुमने दिखा दिया कि कश्मीर की सरज़मीन पर भी एक ऐसा हकीम मौजूद है जिसकी मिसाल वह खुद है।
श्रीभट्ट:- यह हुज़ूर की ज़रानवाज़ी है ....आपकी हौसला अफज़ाई के लिए मशकूर हूं आलीजाह। ;झुककर सलाम करता है।द्ध
बादशाह:- आओ इस तरफ, इस तख्त़ पर मेरे साथ बैठ जाओ...हां मेरे नज़दीक...। आओ, और नज़दीक आओ...मेरे पास।
;श्रीभट्ट बादशाह के पास तख्त़ पर बैठ जाता है....जनता में भरपूर जोश है....तभी एक दरबारी सोने की मोहरों से भरा हुआ एक थाल लेकर आता है और श्रीभट्ट को पेश करना चाहता है...। द्ध

बादशाह:- पंडित श्रीभट्ट! यह एक छोटा-सा तोहफा है।... मैं जानता हूं कि दुनिया की कोई भी दौलत तुम्हारी खिद़मत का बदला चुका नहीं सकती...मगर फिर भी मेरा दिल रखने के लिए इस नज़राने को तुम्हें मंज़ूर करना होगा।...तुम मंज़ूर करोगे तो मेरे दिल को सकून मिलेगा...तुम चाहो तेा कुछ और भी मांग सकते हो...
;जनसमूह में उत्साह/तालियां....सारे दरबारी,वज़ीर,अधिकारीगण आदि समवेत स्वरों में 'सुलतान जैऩुलाबदीन की जय` आवज़े बुलंद करते हैं।...थोड़ी देर के लिए जयघोष से सारा वातावरण गूंज उठता है....फिर धीरे-धीरे खामोशी छा जाती है...और श्रीभट्ट खड़े हाकर निवेदन करते हैंे।...द्ध

श्रीभट्ट:- आलीजाह! इन सोने की मोहरों को लेकर मैं क्या करूंगा? मुझे कुछ भी नहीं चाहिए.....बस,मैंने तो अपना फऱ्ज पूरा किया...जनता का भी तो फऱ्ज बनता है कि वह अपने राजा की सेवा करे..।
बादशाह:- उसी फऱ्ज को निभाने की एवज़ में ही तो मैं तुम्हें इनाम देना चाहता हूं..। तुम कुछ मांगोगे तो मेरे दिल का बोझ हल्का होगा।
श्रीभट्ट:- आलीजाह!
बादशाह:- हाँ-हाँ! बोलो..अपने लिए नहीं तो मेरा दिल रखने के लिए तुम्हें ज़रूर कुछ माँगना पड़ेगा......माँगों क्या चाहते हो?...........
(जनसमूह अशांत है.....फुसफुसाहट)
श्रीभट्ट:- आलीजाह! मेरी एक इल्तिजा है, एक दरख्व़ास्त है।
बादशाह:- क्या चाहते हो-? जल्दी बोलो मेरे दोस्त।
श्रीभट्ट:- सोचता हँू आलीजाह! कहीं छोटे मुँह बड़ी बात न हो जाए।
बादशाह:- बिल्कुल भी नहीं़....तुम कुछ बोलो तो!!
श्रीभट्ट:- आलीजाह! मेरी दरख्वास्त है कि दूसरे फ़िरके की तरह ही मेरे फिरक़े के लोगों को भी सरकारी नौकरी पाने के लिए बराबरी के मौके दिए जाएं......इससे हुज़़़ूर की नेकदिली में चार चाँद लग जाएंगे.....
बादशाह:- खूब, बहुत खूब! श्रीभट्ट! आज तुमने सचमुच मेरी आँखे खोल दी...जो बात मेरे दरबारी, हुक्मरान और वज़ीर आज तक न कह सके, वह तुमने कह दी-। बेशक! बादशाह का काम है अपनी अवाम में गैर-बराबरी को खत्मकर बराबरी का दर्जा कायम करना......! मेरे बुज़ुर्गों ने अगर कोई गल़त काम किया ह,ै मैं उसे दोहराऊँगा नहीं.....! आज से ही मेरे मुल्क में फिरकावाराना गैरबराबरी का दर्जा ख्ा़त्म होगा.....यह मेरा वादा रहा...! म-मगर यह तो तुमने अपने लोगों के लिए माँगा है, अपने लिए भी तो कुछ माँगों श्रीभट्ट!
श्रीभट्ट:- मेरी एक दरख्व़ास्त और है आलीजाह!
बादशाह:- बोलो - मैं अभी उसपर अमल करता हँू।
श्रीभट्ट:- मेरे फ़िरके के लोगों को अपनी मऱ्जी के मुताबिक आज़ादी के साथ खु़दा की इबादत करने का मौका मिलना चाहिए.....और-ओैर.....
बादशाह:- मैं समझ गया मेरे दोस्त.....! ज़रूर-ज़रूर ऐसा ही होगा! आज से हर फ़िरके को अपनी मऱ्जी के मुताबिक खुदा की इबादत करने का हक़ होगा.... और आज ही मैं हुक्म देता हँू कि जिज़या वसूली को भी खत्म कर दिया जाए.......मेरे दोस्त! तुम कुछ और माँगना चाहो तो माँगों.........
श्रीभट्ट:- खौ़फ़ और दहशत से भागे हुए मेरी बिरादरी के बदकिस्मत लोगों को वापस बुलवाकर उन्हें बाइज्जत वादी-ए-कश्मीर में बसाया जाए और हर किसी को बगैर किसी भेदभाव के विद्या की दौलत पाने की छूट दी जाए.......। बस, मुझे और कुछ नहीं चाहिए आलीजाह!
बादशाह:- सुभान अल्लाह! भई वाह! श्रीभट्ट तुम तो सचमुच इंसान की शक्ल में फरिश्ते हो.....तुमने अपनी क़ौम को ही नहीं अपने नाम को भी रोहानास कर दिया है......तुम्हारी यह कुर्बानी बताती है कि कच्चा इंसान वह है जो खुदगऱ्जी से ऊपर उठकर समूची इंसानियत के हक में सोचता है- मर्हब्बा........आफरीं....तुम एक हकीम ही नहीं वर्ना इंसानियत की रोशनी से जगजगाते हुए एक चिराग हो....।
श्रीभट्ट:- हुजूर! मेरे लिए यह चार बातें चार करोड़ मुहरों के बराबर हैं। आप मेरी इन चार मुरादों को पूरा करेंगे तो समझ लीजिए मुझे मेरा इनाम मिल गया।
बादशाह:- तसल्ली रखों मेरे दोस्त! तुम्हारी हर मुराद पूरी होगी.....! हमारे बुज़ुर्गों ने अपनी गैर ज़िम्मेदाराना हरकतों से आपकी कौम पर जो ज्य़ादतियाँ की हैं, उस बदनुमा दाग को मैं दूर करके ही दम लंूगा...। मैं खुद देखँूगा कि तुम्हारी हर मुराद जल्द-से-जल्द पूरी कर दी जाए-मगर, अब मेरी भी एक दरख्वास्त है।
श्रीभट्ट:- हुज़ूर फरमाए! क्या खिद़मत कर सकता हूँ?
बादशाह:- मैं तुम्हे अपने मुल्क का वज़ीर-ए-सेहत बनाना चाहता हँू ताकि अपनी काबलियत और इल्मोहुन्नर से तुम वतन के लोगों को खुशाहाल रख सको। दुनयावी तकलीफों और बीमारियों से उन्हंे निजात दिला सको-। पह मेरी दिली ख्वाहिश है-
श्रीभट्ट:- आलीजाह! इस नाचीज़ को आप बहुत एहमियत दे रहे हैं..........।
बादशाह:- नहीं श्रीभट्ट नहीं। तुम्हें नहीं मालूम कि तुम क्या हो? आने वाली नस्लें तुम पर नाज़ करेगी....कश्मीर की तवारीख पर तुम हमेशा आफ़ताब की तरह चमकते रहोगे-
(गले से लगाते हैं और सुलतान अपनी उंगली में से हीरे की अंगूठी निकालकर श्रीभट्ट को पहनाते हैं.......जन-समूह में अपार खुशी है.....सारा वातावरण खुशियों से गूंज उठता है........।)
संगीत धीरे-धीरे मद्धिम होता है।

डा० शिबन कृष्ण रैणा
 
अगस्त 1, 2006 

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