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झौंका

परेश भाई ने एक - दो - तीन की गिनती को आगे खिसकाना शुरु किया नहीं कि कमरे की खुसुर - पुसुर थम सी जाती है बीस के आंकडे तक जाकर यह गिनती फिर एक से प्रारंभ हो जाती है पहले वार्मिंग अप की कुछ कसरतें लेकिन थोडी देर में गाडी दौड प्राय: हो जाती है चार - पांच की गिनती तक परेश भाई हर ऐंठन - पैंठन को बतौर नमूना साथ करते हैं ताकि हर कोई गाडी क़े साथ ताल बिठा सके शुरुआती कसरतों के बाद कभी ऐंठने वाली कसरतें करते हैं तो कभी खींचने वाली या दौडने वाली उसके बाद बैठ कर अन्त में बारी आती है लेटकर करने वाली कसरतों की - ज्यादातर सीधे सीधे ही, एकाध पेट के बल यह पूरा क्रम करीब चालीस - पैंतालीस मिनट चलता है पूर्ण विराम लगता है शवासन से जिसका सभी लोग प्रार्थनामिश्र होकर इंतजार करते हैं कम से कम पिछले दो सप्ताह, यानि जब से मैं ने इस व्यायाम क्रम में हिस्सा लेना शुरु किया है तब से तो यही स्थिति है

इन कसरतों में ऐसा कुछ नहीं जिन्हें मैं या आप अपने घर या घर के लॉन में न कर सकेंलेकिन वह एक किताबी और अल्पकालिक उपक्रम होगा परेशभाई की गिनतियों की गूंज पूरे समूह का उन गिनतियों पर समर्पण तथा दीवारों के स्पीकरों से उमडता - धधकता संगीत - कुछ ऐसी चीजें हैं जो घर पर मुहैय्या नहीं हैऔर यही है वह चीज ज़ो हर रोज तने लोगों को सुबह सुबह यहां हाजिर करा देती है

यही है या कुछ और भी हैअरे नहीं भाई, और क्या होगाकुछ भी नहीं हैतो क्या वह खूबसूरत चेहरा भी नहीं? वे हृष्ट - पुष्ट अलबत्ता थोडे स्थूल गुदगुदे बदन भी नहीं? अब आप जबरन कोई शरारत मुझ पर थोपना चाहें तो मैं क्या कर सकता हूं? आप स्वतन्त्र हैंमैं तो चुपचाप पौने सात बजे उठकर, नित्यकर्म से निवृत्त होकर, दूध की थैलियों को फ्रिज में ठूंसकर, कचरे की बाल्टी को दरवाजे के बाहर रखकर, पत्नी और बेटे - बेटी को सोता छोडक़र साढे सात तक इस स्वास्थ्य - केन्द्र में आ धमकता हूं। उस समय घर पर तो सभी सो ही रहे होते हैं और इस स्वास्थ्य - केन्द्र में ठहरे निरे अपरिचितयूं समझिये कि मैं आता हूं और चला जाता हूं। बिस्तर त्यागने और वापस घर पहुंचने का अन्तराल दो घण्टे का हो जाता है और यही वक्त है जब मैं नि:शब्द रहता हूं। वरना न तो मुझे ऑफिस की हायतौबा बख्शती है और न पत्नी - बच्चों की संलग्नता मित्रों, पडसियों और टेलीविजन की कांय - कांय को तो मैं कहीं गिन ही नहीं रहा हूं।

मगर आपको एक बात की दाद देनी पडेग़ीआपको दुनिया की खैर - खबर पूरी हैइस तीसरे सप्ताह के बाद मुझे यह महसूस होने लगा है कि प्रसिक्षक की गिनतियां, समूह के अनुसासन तथा भडक़ते संगीत ( वह भी ताजातरीन और शुध्द फिल्मी) के अलावा  उसकी  मौजूदगी का भी कुछ वजूद होता है इत्तफाकन मैं ने दो तीन रोज उसके पीछे खडे होकर वर्जिशें क्या कर लीं, बाहर के साथ - साथ अंदर भी एक ऐंठन संचरित होने लगीवह अकसर ऊपर तो कोई झबली सी टी - शर्ट पहनती है लेकिन टांगों पर प्रतिदिन श्लैक्स ही चिपका कर लाती हैबदन जितना गठीला है, उतना ही गुदगुदाभाई कम से कम मुझे तो तीन फुट के फासले से यही लगा वक्षों के उभार भी ठीक - ठाक कहे जायेंगेमहिला खिलाडियों ( या बकौल मेरे एक मित्र के, मैनचेस्टरों) जैसा कुछ भी नहींऔर हां आपको भी यह इसलिये बता रहा हूं क्योंकि कोई लाग - लपेट करने की आदत अपन को नहीं हैअपने अन्दर कोई ऊलजलूल चीज नहीं पालता हूं। वैसे भी पांच सात वर्ष के शादीशुदा व्यक्ति से जो दो बच्चों का पिता भी है, किसी अपराधिक मानसिकता की उम्मीद नहीं की जा सकती हैमेरा मतलब है जब तक उसमें विशेष वृत्ति की झलक न हो

मैं यह भी दर्ज कर दूं कि मैं ने उसकी ऐंठनों और वक्रों को पीछे से देखा जरूर, कुछ हद तक तृप्त भाव से पिया भी लेकिन अंतत: सच कुछ ऊपरी - ऊपरी घर्षण से अधिक नहीं कहा जा सकता हैएक दो बार जब मैं और वो उस वर्गाका हॉल के विपरीत छोरों पर खडे थे तब गर्दन घुमाते वक्त क्षणांश के लिये हमारी नजरों ने एक दूसरे को क्रॉस किया था लेकिन प्रशिक्षक की यंत्रवत गिनतियों तथा कसरत की पिघल रही थकान के समक्ष वह उतना ही हस्बेमामूल और निष्क्रिय सा उपक्रम था जैसे प्लेटफार्म से गुजर रही गाडी क़े यात्रियों का किसी चाय - गर्म वाले को देखनाहां, जब वह कभी कभार नहीं आती थी, या सामूहिक कसरतों के बजाय सामाने वाले कमरे में ( दोनों कमरों में उभयनिष्ठ पारदर्शी कांच था) मल्टीजिम पर अपनी भेंट चढाती तब जरूर कुछ अखरता थामुझे गुस्सा कम रहम अधिक आता कि यदि मोहतरमा को अपने वजन और अतिरिक्त चर्बी के प्रति सर्तकता है तो व्यायामों को नियमित क्यों नहीं रखती हैकोई इसको समझाये कि इसकी सारी मेहनत गुड गोबर हो रही है, बेवकूफखैर मुझे क्याकिसी खेल - भावना के तहत ही ऐसा भाव मन में कौंध आया था

उस दिन सोमवार थायानि साप्ताहिक रविवारीय अवकाश के बाद का दिनअमूमन मैं नियत समय से पहले ही आ जाता हूं। व्यायामों के पहले के समय को या तो कमरपट्टी के सहारे रगडता हूं या एकाध डम्बल - सम्बल संभालकरमुझे मिस्टर भारत की तरह स्टड आकार नहीं बनाना हैमैं ठहरा एक पढा लिखा आदमीअपने हाजमे और तंदुरुस्ती के रखरखाव की खातिर मैं यहां आता हूं। जो लोग जी तोड क़र बाजुओं की मछलियों और छाती की धमनियों को उजागर करने की नियत रखते हैं, मुझे आला दर्जे के ठुस्स गंवार लगते हैं निकम्मे कहीं केअक्ल नहीं, शक्ल नहीं, बस शरीर के पीछे पड ग़ये हाथ धोकरइनके पास इतना समय आता कहां से है?

हां तो मैं कह रहा था कि उस दिन मैं थोडा देरी से पहुंचा था प्रवेश पर रखे रजिस्टर पर फटाफट अपने हस्ताक्षर घसीटे, समय लिखा और अर्दली के अभिवादन को स्वीकारता दरवाजे में प्रवेश ही कर रहा था कि  कि वह सामनेपसीने से सराबोरमुझे एक दो तीन के बिगुल में घुसटने की जल्दी थीलेकिन यकबयक सामना होते ही उसने ऐसी मुस्कान बिखेरी  कि मैं कुर्बान नहीं, नहीं, गदगद हो उठामेरा अपना चेहरा भी कैसे मुस्कुराहट में डूब गया, पता नहींधडक़न जैसे धम्म से ठहर गई ठहर गई या कुंलाचें मार कर भभड - भभड क़रने में जुट गई, कह नहीं सकताऊपरी तौर पर एक बेहद ही सामान्य प्रक्रिया से गुज़रने के बाद में उस वर्गाकार कक्ष की नियत कतार में थोडा झांक - झूंक कर सम्मिलित हो गया

चालू व्यायाम की गिनती को बीस तक पहुंचा कर परेशभाई ने जब पैंतरा बदलकर फिर से एक - दो - तीन की गुहार की तो मुझे लगा वह अब बिलकुल सही आंकडा गिन रहा हैउस तरह से यंत्रवत् तो कतई नहीं जैसा पिछले एक महीने से ऊपर हो आये समय से बोलता आया हैक्या इसी को कहते हैं बर्फ का पिघलना

ये परेश भाई भी अजब हैंबीस के बाद फिर से एक - दो - तीन क्यों करता हैगिने आगे तकचलने दे सिलसिलाझूठ नहीं बोलूंगा, उस पारदर्शी विभाजन में भी पता नहीं किस वैज्ञानिक अविष्कार की खातिर वह मुस्कुराहट बिम्ब लेने लगी थीकहीम् बहुत पहले पढा था कि व्यक्ति की लिखावट और मुस्कुराहट व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ उंडेल देती हैं लिखावट में फिर भी दो राय हो सकती है, मुस्कुराहट के लिये तो यह सौ फीसदी सच होगाबिना मुंह खोले ही एक गहरी पिंक लकीर एक गाल से दूसरे गाल तक खिंच गयीत्वचा की उस सिकुडन में आंखें भी कुछ मिंच सी गईंचेन्ज, एक, दो, तीनये तेरी पलकें झुकी -झुकी, ये तेरा चेहरा खिला - खिला ठीक - ठीक है, मुझे लगता है जैसे हंसने का आवाज से रिश्ता है, उसी तर्ज पर मुस्कुराने का आंखों से सम्बन्ध हैकिसी आमंत्रित मुस्कान को तो आंखों के बिना मुकम्मल माना ही नहीं जा सकता हैथोडा मिच जाने के बावजूद छलकने का आभास जहां होता होबहुत पुरातन और ढर्रेदार चाहे लगे लेकिन मैं फिर भी कहूंगा कि जैसे वहीं - कहीं गुलाब का फूल खिल आया था

और कमाल ये कि पहल उसीने की थीमैं तो दरवाजे में प्रवेश बहुत ही निरपेक्ष होकर कर रहा थाउसी ने ऐसा पासा फेंका तो मैं क्या करुं सोलह  सत्रह अठारह कितना सही बोल रहा है परेशभाईइससे ज्यादा तो वह नहीं होगी, और बीस से ऊपर तो हर्गिज नहींचलो शवासन

गुलाब का फूल हर सांस के साथ मेरे अन्दर उतरने लगा हैसांस दर सांसअहम्
आगे क्या किया जाये? आज बहुत बडी शुरुआत हो गई है
आगे पता नहीं क्या होएक कमी मुझे हमेशा सालती आई है - किसी प्रेमिका के प्रेम कीजिस व्यक्ति से मेरा विवाह हुआ है उसने मुझे भरपूर स्नेह दियाप्यार और रोमांस के सैंकडों चरमोत्कर्ष के पल दिये - लियेलेकिन उसमें कहीं न कहीं पति - पत्नी होने का अधिकार भाव तो घुला ही था - दूध में जामन की माफिक, जो थोडे समय बाद ही अपनी खटास छोडने लगता हैवह निर्बाध, निर्बोध और आकारहीन भाव उसमें कहां होता है जिसकी उज्जवलता खुश्बुओं की तरह शाश्वत और बहाव की तरह अनवरत होती है

खैर, यह मेरी निहायत ही व्यक्तिगत सोच है जिससे दुनिया की आधी से अधिक आबादी हो सकता है, इत्तफाक न करे मर्दों को वैसे भ अपनी सुविधा के लिये हर मौलिक तर्क आता हैअरे, इसमें औरत मर्द की क्या बात हैकिसी मादा के लिये भी यह उतना ही सच है जितना कि किसी पुरुष के लियेलेकिन क्या सच है, क्या नहीं इसे जांचने का कोई मौका तो होन सूत न कपास और..

अगले दिन हमारा आमना - सामना तो नहीं हुआ लेकिन व्यायाम करते करते ही एक क्षण ऐसा आया जब हमने अपनी मुस्कानों का हौले से विनिमय कर लिया थाफिर से वही गुलाब का फूलमेरी जुबान तो बेआवाज ही हलो कहकर पलट गयीक्या भरपूर मुस्कान हैबात आगे बढी तो कभी समझाऊंगा कि सरेआम थोडा हल्के से खिला करोतुम नहीं जानतीं, ये दुनिया वाले कितने कमीने और लीचड होते हैंएक स्वस्थ, सकारात्मक मुस्कान के भीतर ही हजारों तरह की दुर्गन्ध सूंघ लेते हैंअबी उम्र में कच्ची है ना, इसीलिये ऐसा करती हैसमय आने पर खुद ब खुद... उसके बाद पूरे दस दिन बीत गयेइक्की - दुक्की मुस्कानों के आदान - प्रदानों के अलावा कुछ भी नहीं हुआएक दो रोज तो उसमें भी नागामैं भी कौनसा उघारा बैठा थानजरें मिल जाती हैं तो कुछ हो जाता है, नहीं तो किसे फुर्सत हैबोनस है, कोई पगार थोडे ही है

उस दिन शनिवार थापूरे पैंतालीस मिनट की परेशभाई की एक - दो - तीनी रगडाई से चूर होकर हमदोनों ने साथ - साथ ही बाहर आकर जूते पहनेक्या सुखद संयोगअभी तक कभी वो बीच में ही '' हैं''  बोलकर खिसक जाती थी या मल्टीजिम पर आजमाईश करती थीहो न हो आज किसी उद्देश्य के तहत रुकी होमेरी हलो के बटन के साथ गुलाब का फूल फिर खिल उठा
'' हाऊ आर यू?''
आजादी की इस पचासवीं सालगिरह में अपरिचित स्थानों और व्यक्तियों के बीच अंग्रेजी से सेंध मारना कितना सहज - स्वाभाविक लगता है
हिन्दी तो जैसे कोई अतिरिक्त योग्यता है
'' आयम फाईन''
हम लोगों ने केन्द्र से बाहर की तरफ रुख कर लिया था
उसने अपने जूडे क़ी ढील को चलते - चलते ही कसाअरे बाप रे, क्या गोरी चिट्टी गर्दन हैहल्के हल्के सुनहरी बालों की वजह से बिलकुल मखमली प्रतीत हो रही थी
'' व्हाट्स योर नेम?''
'' आयम लावन्या''
ये आयम पिछली बार भी बोला था मैं आई सी की मुद्र
में गर्दन हिलाता हूं।
'' एण्ड यू?''
'' आयम प्रांजल गर्ग''
गुलाब का फूल हल्के से फिर खिलता है
मुझे तुरंत ही खयाल आया कि पूरा नाम बताने की क्या जरूरत थीवो कोई यू पी एस सी थीकहीं संर्कीण संस्कारों में पली बढी हुई तो कहीं इसी बिंदु पर न बिदक जाये
'' व्हाट डू यू डू''
अभी तक पहले मैं प्रश्न कर रहा था
इस बार उसने कियाकितनी अच्छी बात है
'' आयम इन गौरमेन्ट सर्विस
'' मैं ने मात्र सूचना भाव से कहादरअसल यह मेरी चाल थीआज तक जिससे भी मैं ने, परिचय में सरकारी नौकरी की बात कही, सभी ने विभाग ही नहीं सर्विस और पद की बारीकियों तक की बकायदा टोह लीआई पी एस सुनने के बाद तो व्यवहार में गमक नौगुनी हो उठती थीमैं मंद मंद सोचता कि इससे मेरी शालीनता ही संप्रेषित होती थी

पहली बार ऐसा हुआ कि किसी ने एक सूत भी आगे कदम नहीं बढायाकोई बात नहींआगे कभी मुलाकातों में तो उसे पता लगेगा हीतब तो प्रभाव और अधिक तल्ख हो जायेगामुझे ठण्डा खाने की आदत है सिलसिला जारी रखते हुए मैं ने पूछा
'' व्हाट अबाउट यू''
'' आई आलसो वर्क फॉर मैक्स पेज'' '' मेरी तर्ज पर उसने भी सालीन बनने की कोशिश की लेकिन पल भर में ही छिटक गयी
उम्र और अनुभव कहीं तो असरदार होते हैं

तब तक हम लोग केन्द्र की इमारत के बाहर आ चुके थेसामने ही पार्किंग थीवह  ओके कहकर अपनी गाडी क़ी तरफ मुडी तो मेरे मुंह से एकदम तहेदिल से सी यू निकल गयामैं अपनी सडक़ की तरफ भी नहीं मुडा था कि उसकी मारुति मेरे बराबर से हूम करके चली गईशीसे चढे ही हुए थे और जाते जाते अलविदा का हाथ कहीं भी नहीं उठा हुआ थाचलो गाडी क़ा नम्बर तो पता लगा : बारह अठहत्तर किसी भी बडे मुकाम की इससे बेहतर शुरुआत और क्या हो सकती हैकितने आराम - आराम से बातचीत होती रही संक्षिप्त ही सही, पर कम नहीं कही जा सकती हैभई, पहली बार में ही सब कुछ थोडे ही हो जाता हैलेकिन मानना पडेग़ा लडक़ी में आत्मविश्वास की कमी नहीं हैकितने सामान्य भाव से बोल रही थीकोई जल्दबाजी नहीं, कोई लडख़डाहट नहींनाम भी कितना अद्भुत और अनसुना लावन्यासही नाम लावण्या है और हर चीज नाम के कितने अनुरूपलेकिन लावन्या क्या? गुप्ता, सिंह या मिश्राजो भी हो क्या फर्क पडता हैमैं भी कभी -कभी कितना सिकुड क़र सोचने लगता हूं।
आगे अन्तरंगता आयेगी तो क्या कुछ छुपेगा?
गडबड बस यही है कि उससे यह भेंट सनिवार को हुई
कल की छुट्टी खामखाह बीच में आ गईमन तो यही कर रहा है कि जल्दी से सोमवार की सुबह हो जाये

आगे क्या बात की जाये? स्कूल - कॉलेज की पढाई, अभिरुचियां, फिल्में, टी वी तथा समाज के साथ साथ साहित्य और कला जैसे विषयों पर मैं कुछ न कुछ बात तो कर ही सकता हूं। मौका मिला, चाहे थोडा विलम्ब से ही सही, तो अपनी कोई कविता भी सुना सकता हूं। कविता की वैसे उसे समझ होगी नहींपचास फीसदी कवियों को नहीं हैलेकिन सबकुछ मौका देखकर ही किया जायेगाकहीं कविता सुनकर मेरे बारे में ऊलजलूल अवधारणा बना बैठी तो सब मिट्टी पलीत हो जायेगीवैसे मैं जो सोच रहा हूं उसकी नौबत आने वाली नहीं हैउम्र में मुझसे दस वर्ष तो छोटी है हीबाप की गाडी में चाहे सेहत सुधारने जरूर अकेले आ जाती है, दीन दुनिया की कोई खास खबर इसे कहां होगीइस उम्र में होती भी कहां है लडक़ियों का मन तो और अधिक चंचल होता हैवो किसी बोरियत के मोड पर कहां टिकने देगी

रविवार का दिन जैसे तैसे कटावह लगातार अपने अक्स से मेरे दिलोदिमाग पर दस्तक देती रहीमैं अखबार की रविवारी पत्रिका को गौ से पढा करता हूं लेकिन उस रोज जैसे सब तितर - बिखर रहा थाकभी वह नैख ट्विस्ट करने की मुद्रा में हाजिर होती तो कभी जूडे क़ी पिन पिन को दांतों में दबा कर गर्दन नीची करके बालों का जल्दी जल्दी घेरा लगाते हुएकभी कभी तो यह लगता कि किसी आलीसान रेस्तरां में अधपिये गिलास के बराबर में पंजे पर अपनी ठोढी साधे वह मुझे निहारे जा रही है

लेकिन एक बात माननी पडेग़ी मेरे जैसा हवाई पुलाव बनाने वाला भी चिराग ढूंढे न मिले सर्विस के पांच साल, शादी के सात साल और दो बच्चों का पिता बनने के बाद एक लडक़ी की गिरफ्त में ऐसे चला जा रहा हूं जैसे सदियों से कुंआरा बैठा थाआखिर वह मुझे ऐसा क्या दे सकती है जो पहले से ही मेरे पास नहीं है? कभी सोचता हूं कि क्या वकई मुझे उसकी तरफ बढना चाहियेअपना एक भरापूरा हंसता खेलता परिवार हैदो चार दिन लुक छिप के उससे मिल भी लिया तो क्या हासिल हो जायेगाइस सहर में हर आठवां - दसवां आदमी तो मुजे जानता ही होगा पल्लवी तक बात पहुंचते देर न लगेगीमेरे हाव भाव या चाल ढाल से मुमकिन है वह एक रोज मेरी चोरी पकड लेतब जो कुरुक्षेत्र मचेगा उसे कैसे संभालूंगा फैमिना या सैवी में कई औरतों मर्दों के आडे तिरछे संबंधों के बारे में समस्यायें होती हैं लेकिन दूर से उन्हें रस लेकर पढना एक बात है उनका भुक्तभोगी होना निहायत दूसरीएक स्टेज के बाद कहीं ऐसा न हो कि कोई विकल्प ही न रहे

लेकिन यूं अनायास किसी से प्यार किये जाना पूरे जीवन में कौनसा रोज रोज या सबके साथ होता है स्थितियां यदि ऐसी बनती जा रही हैं तो मुजे उनसे भागना नहीं चाहिये, अनुभव करना चाहियेआगे जो होगा, देखा जायेगाआखिर प्यार करना इतना अमानवीय कृत्य तो नहींमहज दोस्ती तो आप किसी से भी कर सकते हैं पल्लवी भी तो अपने कॉलेज के एक दो पुराने साथियों से बराबर मिलती रहती है - मेरी अदृश्य इच्छा के खिलाफकभी कभी उन सालों को फोन तक करने की हिमाकत हो जाती है

जब तक शारीरिक संबन्ध नहीं है तब तक तो कम से कम कोई डर जैसी चीज दिल में लानी ही नहीं चाहियेऔर मान लो किसी आवेग या परिस्थितिवश ऐसा कुछ हो भी गया तो इससे मेरी पल्लवी के प्रति जो निष्ठा है या नीयत है उसे तो एक झटके से निरस्त नहीं किया जा सकता हैपिछले पांच सात वर्षों से हर महीने की तनख्वाह और सुबह से शाम तक की दौड भाग पल्लवी और परिवार को ही चढावे की तरह अर्पित करता आया हूं निष्ठा अपनी जगह फिर भी रहेगीमुझे लगता है हमारे समाज ने निष्ठा से शारीरिक संबन्धों को उद्भूत मानकर बहुत संर्कीण और सरासर गलत नजरिया अपनाया है
तो यह तय रहा कि पलायन नहीं करना है
थोडे साहस और रिस्क के बिना जीवन में प्यार क्या, कुछ भी नहीं किया जा सकता है

चार पांच वर्षों पहले मेरी एक महिलामित्र (शादीशुदा) ने स्त्री मानसिकता को लेकर एक काबिले गौर गुरुमंत्र दिया था - बाद में चाहे वह आपकी दासी बन जाए, लेकिन स्त्री कभी पहल नहीं करती है, इसी में उसकी गरिमा हैलेकिन यहां तो पहल उसी ने की हैवो ठीक है लेकिन मुझे भी तो उसमें अपनी रुचि को जाहिर करना चाहियेसबकुछ उसी पर छोड दिया तो संकोच सबकुछ नेस्तनाबूद न कर दे

तो कल सुबह फिर मुलाकात हुई तो क्या कहूं - करुं? उसके नाम और सौम्दर्य को लेकर उकसया जाए? कौन स्त्री अपने बारे में अच्छा सुनकर गद्गद नहीं होती है पल्लवी तो कोई भी नई साडी या सूट पहनने के बाद  अच्छी लग रही हूं की अदम्य अपेक्षा आज भी पालती हैनहीं, शुरुआत में यह कहना अटपटा लगेगाकुछ और मेलजोल और सहजता आने के बाद ही इतने अधिकार भाव पर सवार हुआ जा सकता हैईद के चक्कर में रोजे न पीछे पड ज़ायें
कैन वी हैव ए कप ऑफ कॉफी  कैसा रहेगा
उसकी मंशा का भी इस बरीक सवाल के बाद खुलासा हो जायेगा  हां का मतलब होगा हां व्यायाम केन्द्र में छोटी सी कैन्टीन है हीवो मगर उस लिहाज से बहुत तंग और अनुपयुक्त रहेगीकोई नया नया कसरती ही आ धमका तो मेरी तो हो गई पौ बारहबात ढाई रुपये की नहीं माहौल की है

क्यों न  हॉली डे इन  में जाया जायेवहां, बस यही है कि मैनेजर समेत दो चार लोग मुझे जानते हैंअभी दसेक रोज पहले ही तो अपने नये डी जी पी को वहां दारु पार्टी दी है पुलिसिये परिवारों समेतकोई आके सहाब - सहाब करने लगा तो सब खाली - पीली गुड ग़ोबर हो जायेगारॉक रिजैन्सी कैसा रहेगा? नहीं, वो भी नहींउसकी लोकेशन बहुत केन्द्रीय हैक्यों न इस फैसले का अधिकार उसके ही सुपुर्द कर दिया जाये? जो होगा देखा जायेगा
बमुश्किल सोमवार की सुबह हुई
उसकी बारह अठहत्तर कहीं नहीं दिकीहो सकता है आज बाप की दूसरी गाडी उठा लायी होमैं एक भयंकर आशंका को संभालते संभालते व्यायाम कक्ष की तरफ बढने लगाएक बार अपने से ही चोरी सी करते हुए पीछे घूम गया - कहीं पीछे से तो नहीं आ रही है
लेकिन वह नहीं आई तो नहीं ही आई

इस तरह जरूर हो जायेगी स्लिम - ट्रिम स्वास्थ्य का एक अपना अनुसासन होता हैघूमते - फिरते दुनिया को दिखाने के लिये ही हाथ - पैर चटकाने हैं तो न तीन में रहेगी न तेरह मेंमैं उसकी उमर का था तो कैसे इकहरा और दुबला सा थावो तो नौकरी ऐसी मिल गयी कि दफ्तर में बैठने को मिला ए सी कमरा और दौड - धपड क़े लिये सरकार ने थमा दी जीपथोडा सा डबल चिन तो इस हालत में कंकाल भी हो जायेफिर भी घर से इस केन्द्र तक रोजाना जॉग करके आता हूंदेख लेना, एक दो महीने में ही डबल चिन न गायब कर दूंपरेश बाई वैरी गुड - एक - दो - तीन चेन्ज विन्डमिल्सकभी आये न जुदाई, जुदाई, जुदाई

बुधवार को जरूर बारह अठहत्तर मुस्तैद थीकोई जरूरी काम लग गया होगातभी तो दो दिन नहीं आईकोई बात नहींआज तो आ गयीलेकिन समूह के साथ व्यायाम करने के बजाय आज वह फिर मल्टीजिम से उलझी रहीमुझे पता नहीं क्यों यह विचार कौंधा कि कहीं उसे वो जरूरी तीन दिन तो नहीं हो रहे थेअपनी सोच पर जहां एक तरफ मुझे विस्मय हुआ वहीं उसके प्रति मन में सहानुभूति भी तैरने लगीउसका दो दिन न आना, चेहरे पर हल्की सी मुर्दनी और व्यायामों की बजाय आज मल्टीजिम को तरजीह गुरुवार यानि अगले दिन सब कुछ ठीक ठाक रहा वर्गाकार हॉल में फिर एक बार गुलाब का फूल खिलाकितनी मुद्दत बाद परेशभाई की नजरों ने संभवत: लक्ष्य भी कियाऔर भी किसी ने देखा हो तो कह नहीं सकताये हरी कमीज पहन कर जो सफेद घुटन्नेबाज आता है, मुझे बेहद शक्की और खडूस लगता हैसाले को कतई सौंदर्यबोध नहीं हैउसे और कभी कभी मुझे कैसी गिध्द नजरों से देखता
है
मन करता है किसी सिपाही से कहकर साले पर दो चार डण्डे पडवा दूंसारी अक्ल ठिकाने आ जायेगीवो तो मैं ही हूं जो पूरी एनॉनिमिटी बनाये रखता हूं, नहीं तो इसका मुकम्मल इलाज है मेरे पास

वर्जिश पूरी होने के बाद मैं अपने जूते चढा रहा था कि वह भी अपनी चप्पलें पहनने लगीमैंने फीते बांधने के बहाने प्रस्थान को उसके साथ एक - स्वर कियाउसकी झबले सी टी सर्ट पर लिखे शब्दों से मैं ही जानता था कि वह मैक्स पैज के लिये काम करती हैशरीर वैसे पुलिस विभाग के लिये भी चलेगागठित और गुंथा हुआ हैथोडी मांसलता ( या कहूं लावण्य) अधिक हैरंग भी ज्यादा दूधिया हैलेकिन किसी चौराहे पर सुबह शाम तीन - तीन घंटे डयूटी बजायेगी तो सब कुछ एक साथ चाक चौबन्द हो जायेगा
'' हाऊ आर यू
'' हम लोग निकास की ओर अग्रसर हैं
'' आयम फाईन
''
'' कब से आ रही हैं आप यहां?''
'' कोई दो महीने होने आये
''

मेरा पूछने का मन है कि क्या नतीजा रहा है अभी तक? मतलब कुछ वजन कम - कुम हुआ?
'' आप काफी अच्छा करती हैं
''
'' थैंक्स, लेकिन एक दो एक्सरसाइज क़रते वक्त तो ऐसा लगता है कि मैं कुलैप्स कर जाऊंगी
''
'' कौन सी वाली पर?''
'' जब नीज क़े ऊपर खडे होकर अपर बॉडी की रोईंग करनी पडती है
''
'' हां वो थोडा मुश्किल है, रिवर्स रोईंग के वक्त तो खासकर
''
मेरे अन्दर कभी कॉफी का प्याला आकार ले रहा है तो कबी उसकी अभिरुचियों के प्रति जिज्ञासा
निकास से ठीक पहले किसी व्यक्ति को वह पूरे मनोयोग से हाय करती हैकैसे हो  भी जोडती हैवह सख्स आनन - फानन में तिरोहित हो जाता हैमुझे लगा उस व्यक्ति से इसका कोई विशेष परिचय नहीं थामेरे साथ चलते - चलते किसी डर या असुरक्षा की भावना के तहत उसने ऐसा किया था - मुझे जताने के लिये

पार्किंग तक जाने में बस चार छह कदम और लगने हैंआज भी कोई ब्रेक थ्रू नहींअभी भी वक्त हैलेकिन अब ये ही बचकाना हरकतों पर उतर रही है तो मुझे क्या
कुछ हिम्मत जुटा कर फिर भी मैं कहता हूं-'' इट्स रियली नाइस तू सी यू हियर ऐवरी मार्निंग
''
इस पर गुलाब का फूल खिल उठता है
बारह अठहत्तर की तरफ जाने से पहले एक थकी - थकी सी ओके मुझ तक आती है, जिसे में सी यू  के दस्तानों में लपक लेता हूं।

आज का कब से इंतजार था लेकिन सब कुछ ऐसे फिसका गया जैसे रेत से सांपइतने गैप के बास्द तो मुलाकात हुई थी, वो भी यूं ही खाली चली गईकहीं उसे ये तो नहीं लगता कि मैं उसके मुकाबले उम्रदराज हूं या कम हैसियत का मालिक हूंयदि उम्र के फेर के कारण उसका रुख उदासीन है तो पहल करके उसने पानी में कंकड मारा ही क्यों? वैसी बीस और तीस में क्या अंतर होता हैसोलह सोलह साल की लडक़ियों के चालीस पार पुरुषों के साथ संबंधों से घरेलू पत्रिकाएं रंगी पडी रहती हैं
हां हैसियत के प्रति लडक़ियां जरूर ज्यादा सतर्क रहती हैं
लैला -मजनूं का दौर कब का चला गया हैआजकल तो जो उनके नखरे सहे, खिलाए - पिलाए या घुमाए डुलाए वही मीरऔर इस सबके पीछे आदमी की हैसियत एक अंर्तधारा की तरह प्रवाहमान रहती हैउस रोज अपनी ही एक बैचमेट प्रेरणा गिल से बात हो रही थीमैं ने एक शाश्वत और मतलबपरक सवाल किया उससे
'' वो क्या खूबी है जो एक पुरुष की तरफ औरत को खींचती है
व्हाट अटरैक्ट्स ए वुमैन टु अ मैन?''
'' उसकी सफलता
''  प्रेरणा गिल ने बिना किसी अतिरिक्त सोच विचार के स्पष्ट कहायानी कि पुरुष की सोच समझ का कोई महत्व नहीं?  उसके व्यक्तित्व ( जिसमें मेरे हिसाब से कुछ हद तक शक्ल सूरत समाहित होती है)  का भी कोई वजूद नहीं लडक़ियों की गणनाओं में टिकती है तो आदमी की सफलता - वह चाहे उसने खुद हासिल की हो या विरासत में मिली होकॉलेज और पुलिस एकेडमी के अनुभवों पर नजर डालता हूं तो प्रेरणा गिल का फलसफा दिन के उजाले की तरह साफ और सत्य दिखता हैहर चुसा मुंह और लमढेंक (लडक़ा) एक अदद गर्लफ्रेण्ड के बिना कभी जिया ही नहीं

तो दिखा दूं इसे अपनी हैसियत और सफलताफिर तो दौडी चली आयेगीलेकिन सोचता हूं क्यों इस फालतू पचडे में पडूंमैं यहां कसरत करने आता हूं , कौनसा इश्क लडानेदिल के सुरक्षित कोने से तो मैं खुद नहीं चाहता कि इसके साथ कुछ बात बनेक्योंकि जानता हूं इस सबकी कीमत कितनी विध्वंसक हो सकती हैयहां तक कि अभी तक कोई विशेष  प्रगति  के न होने से मेरे अंदर एक गुमनाम सा विजय भाव भी उखडने लगता है
लेकिन उसे जिस रोज देख लेता
हूं, सभी भारीभरकम तर्क बगलें झांकने लगते हैंउसमें मुझे अकसर ऐश्वर्य राय जैसा  चिकना सौंदर्य नजर आता है( उसकी नाक ऐश्वर्य से मिलती भी है) और अरुन्धती रॉय जैसी गहरी मासूमियत भी

आज सुबह आई थी व्यायाम भी कियेमैं चार छह दफा सायास होकर, एक - दो - तीन के दौरान ही नजरें मिलाने की कोशिश कीलेकिन वह वर्जिशों में मशगूल रही मुझे लगता है वह जानबूझ कर तटस्थ हो रही हैआते वक्त मेरे सामने से ही गुजरकर अपनी कार तक गई थी लेकिन कहीं भी गुलाब का फूल नहीं दिखा लडक़ियों की इसी जटिलता से मुझे चिढ हैजो उनमें रुचि लेगा उसके प्रति तो हो जायेंगी तटस्थ और बेरुख, और जो उन्हें नजरअन्दाज क़रे उसके लिये करेंगी सांगोपांग समर्पण
ठीक है बनी रहे तटस्थ

मैं उससे दुगुना तटस्थ हो जाऊंगा, तब सीधी हो जायेगी

मित्रों मुझे यह स्वीकारने में कोई संकोच नहीं है कि उसी दुगुनी तटस्थता को जीते हुए अब डेढ महीना और गुजर गया हैवापस आए मेरे कदम अब परेसभाई की एक - दो - तीन के साथ अधिक तालमेल बिठाने लगे हैं हरी कमीज और सफेद घुटन्ने ने मध्यान्तर में एकाध बार अपने गोभी के फूल से मेरा स्वागत भी किया है
केन्द्र से बाहर हर रोज बारह अठहत्तर आती है, लेकिन वैसे ही चली भी जाती है


 

ओमा शर्मा
अप्रेल 1, 2005

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