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अपरान्ह के रंग

स्कूल के गेट से बाहर निकलकर अंजलि कितने समय में बस स्टैंड पहुँची उसका उसे होश नहीं था. आज सुबह से ही उसका मन एकदम खीझ और गुस्से से भरा हुआ था. वो ठीक- ठीक गुस्से का कारण ढूंढ़ नहीं पाई थी या फिर स्थिर होकर कुछ भी सोचना नहीं चाहती थी. कल देर रात को अपू का घर लौटना, सूबह-सुबह सहायिका रमा का बिन बताये छुट्टी कर जाना, दो दिन पहले अचानक कभी पति रहे पंकज का फ़ोन आना, स्कूल में पेरेंट-टीचर मीटिंग में झिकझिक और उसके बाद अपू के चार मिस्ड कॉल. फ़ोन करने पर अपू ने बताया कि वो आज रात को घर नहीं लौट रही. जब अंजलि ने कारण पूछा तो बस इतना बताया कि लौटकर बताएगी, फ़ोन में बताना संभव नहीं. अपू यानि अपर्णा अंजलि की बेटी है और वो अब बड़ी हो रही है, इस साल ग्रेजुएशन पूरा हो जाएगा. अंजलि हमेशा हर मामले में मुद्दों को सलीके से सोचने और समझने को लेकर बहुत संजीदा रही है और शायद इसलिए हमेशा उसे ही आखिर पीछे हट जाना पड़ा है, बहुत कुछ अपना छोड़ दिया है जीवन में. बस अपना सम्मान ही बचे रहने दिया. पर इस बार अंजलि का मन इसके लिए तैयार नहीं. वो मन ही मन ये भी चाह रही थी कि उसका गुस्सा बना रहे. कई दिनों से एक शक बर्रे की तरह अंजलि के दिमाग में लगातार भनभना रहा है, एक अनजाना सा डर, एक असुरक्षा की भावना उसे अन्दर ही अन्दर कुरेद रही है. अंजलि देख रही है कि कुछ दिनों से अपू अक्सर बातचीत के बीच पंकज का प्रसंग ले आती है. वो पंकज के बारे में अचानक आग्रही हो गई है. जितना ज़रूरी है उतना अंजलि ने बता दिया था. लेकिन......

बस यहीं से अंजलि असुरक्षित महसूस कर रही है. वो सचमुच नहीं चाहती कि अपू अब पंकज से मिले.
अभी अप्रैल का महीना है और तीन दिन से अजीब मौसम है शहर में, आकाश में बादल भरे हुए है पर बारिश नहीं हो रही, साँस बंद हो जानेवाली घुटन है आब-ओ-हवा में. बस स्टैंड में खड़ी होकर अंजलि को लगा कि वो शरीर और मन दोनों से बहुत थक गई है. उसे लगा कि उसी वक्त वो घर नहीं जाना चाहती. वो समझ नहीं पा रही थी क्या करे, कहाँ जाये. अनजाने में ही वो फुटपाथ से धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी. अचानक पीठ पर किसी का स्पर्श पाकर वो चौंक उठी. मुड़कर देखा तो झूमर का हँसता हुआ चेहरा दिखा. झूमर और अंजलि बचपन की पक्की सहेली हैं, सिर्फ इतना ही नहीं, अगर वो झूमर की तरह बंगाली होती और सवर्ण परिवार में न जन्मी होती तो शायद उसकी ज़िंदगी अलग होती.

“ किस ख्याल में डूबी हो ? ऐसी तो तुम कॉलेज के ज़माने में भी नहीं थी.” झूमर की आँखों में शरारत थी.
अंजलि ने कुछ नहीं कहा लेकिन इस वक्त झूमर को देखकर उसके चेहरे पर मुस्कराहट खिल गई. झूमर ने बनावटी नाटकीयता के साथ पूछना जारी रखा, “इस भट्टी जैसी गर्मी में ढलती दोपहरी के साथ-साथ ढीली-ढाली चाल में कहा जा रही हो तुम?”
“ मैं तो स्कूल की छुट्टी के बाद घर जाने की राह पर हूँ. पर तुम इस वक्त यहाँ कैसे ?” अंजलि ने कहा.
“ क्या पैदल जा रही हो घर? और तुम्हारा स्कूल तो बहुत पीछे छूट गया और बस स्टैंड भी !” झूमर ने आश्यर्य से पूछा. वो अभी तक हलके-फुलके अंदाज़ में ही बोल रही थी पर अंजलि का चेहरा गौर से देखने के बाद गंभीर हो गई. अंजलि उसके सवाल को नज़रअंदाज़ करती हुई फिर से अपना सवाल दोहराया, “ तुम यहाँ..”
“ मुझे तो रोनी के फुटबॉल कोच से मिलने जाना था, इस बार रोनी भी टीम के साथ जा रहा है चंडीगढ़, वापसी में अपने पुराने स्कूल के बाहर मुरारी भैय्या की दूकान में पान खाने के लिए गाड़ी रोकी थी, सोचा था पुराने दिनों की तरह तुम्हारे साथ पसंद का गुलकंद वाला पान बनवाऊंगी. इसलिए थोड़ी देर वहीं रुकी रही, बच्चों के बीच में तुम्हे ढूंढा भी, तुम नहीं दिखी इसलिए फिर से गाड़ी में बैठी. दूर से तुम्हे देखा तो समझ नहीं आया इतनी गर्मी में पैदल कहाँ जा रही हो इसलिए पीछे-पीछे गाड़ी बढ़ा ली. तुम तो बस से घर जाती हो न?” झूमर जैसे अंजलि का चेहरा पढने की कोंशिश कर रही थी.
“ हाँ, पर अपू आज रात को घर नहीं आ रही, मुझे खाली घर में लौटने का मन नहीं हो रहा था.” अंजलि ने संकोच के साथ धीरे-धीरे कहा.
“ हाँ, आजकल दोस्तों के घर में रुक जाना, पार्टी करना बहुत आम बात हो गई है. माँ-बाप का काम है बस इन दोस्तों के बारे में पता रखना. हमारा रोनी भी दोस्तों के घर में रुकता है कभी-कभी. उसके तो बहुत सारे दोस्त हैं. हिसाब रखना मुश्किल है. अपू तो बहुत अच्छी लड़की है, सात-पाँच में नहीं रहती, तुम्हारी बहुत सुनती है.”
जवाब में अंजलि ने धीरे से सिर्फ “हूँ” कहा.
झूमर को लगा कोई बात तो है जो अंजलि को डिस्टर्ब कर रही है. उसने अब अंजलि की तरफ सीधी नज़र से देखा और कहा, “ तुम्हें अभी घर जाने का मन नहीं है तो मेरे साथ चलो.”
“कहाँ?”
“ चलो न. कहीं बैठकर कुछ खायेंगे. तुम्हें तो भूख लग ही रही होगी, मैंने भी लंच के बाद अभी तक कुछ खाया नहीं. चलो, गाड़ी में बैठो.”
अंजलि को सचमुच घर जाने का मन नहीं हो रहा था, कम से कम थोड़ी देर तक झूमर की बकबक सुनकर मन हल्का करने की उम्मीद से वो चुपचाप गाड़ी में बैठ गई. झूमर ने गाड़ी का म्यूजिक ऑन कर दिया. गंभीर स्वर में मेहँदी हसन की ग़ज़ल बजने लगी.
“अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिले
जैसे सूखे हुए कोई फूल किताबों में मिले”

अंजलि आज तक समझ नहीं पाती कि बात-बात पर जलतरंग की तरह हंसकर झूम जाने वाली झूमर को ऐसी गंभीर गजल सुनकर क्या मिलता है. ख़ास सहेली होने के बावजूद अंजलि को बहुत बाद में पता लगा था कि झूमर बहुत अच्छी कवितायेँ भी लिखती है. उसको एक डायरी रखते हुए अंजलि ने हमेशा देखा था, पर उसमे कवितायेँ होंगी ये अंदाज़ा बिलकुल नहीं था.
झूमर चुपचाप गाड़ी चला रही थी. ट्रेफिक ज्यादा होने के कारण अंजलि ने भी कोई बात नहीं छेड़ी. दिनभर की थकान के बाद एयरकंडीशंड गाड़ी में बैठकर अंजलि को बहुत सुकून महसूस हो रहा था. गाड़ी के बंद शीशे की खिड़की से द्रुत गति से पीछे जाते हुए नज़ारों के साथ-साथ उसे पीछे छूटी हुई जिंदगी भी दिख रही थी.

अपू जब सिर्फ तीन साल की थी तब अंजलि और पंकज अलग हो गए थे. इसका कारण समझने में अंजलि को काफी वक्त लगा था. पहले तो पंकज की अपने पिता के साथ इसलिए अनबन हो गई कि उसने कह दिया पुश्तैनी बिसनेस नहीं करेगा. फिर जब अंजलि प्रेग्नेंट हुई तो जिद करने लगा कि बच्चा नहीं चाहिए, उसे ये जिम्मेदारी चाहिए ही नहीं. उसे अंजलि को साथ लेकर संगीत का काम करना है. ये सच था कि पंकज म्यूजिक को लेकर बहुत बड़ा सपना पालता था. उस ज़माने में अंजलि भी बहुत अच्छा गाती थी. दोनों की मुलाकात भी दुर्गा पूजा के संगीत समारोह में ही हुई थी. पंकज अपने ग्रुप के साथ वहाँ गाने आया था. वो उसके संघर्ष के दिन थे. उसके पिता शंकरलाल जोशी का बड़ा बिजनेस था जो उनको अपने पिता से मिला था. इकलौते बेटे के संगीत के प्रति रुझान को उन्होंने गंभीरता से नहीं लिया था. उनको अपनी दोनों बेटियों की शादी की चिंता थी, उन्होंने सोचा कि इस उम्र में लड़के बहुत कुछ करना चाहतां है, घर में कोई कमी नहीं कि उसे काम ढूँढना है. बेटियों की एकबार अच्छी जगह शादी हो जाये तो धीरे-धीरे पंकज को भी बिजनेस में लाया जायेगा. लेकिन बड़ी बेटी की शादी को अभी एक साल भी पूरा नहीं हुआ था और पंकज की दादी ने बिस्तर पकड़ लिया. दिल की मरीज तो वो थी ही, एक रात शुगर भी अचानक हाई हो गया और तमाम परिचर्या के बाद भी उन्होंने बिस्तर पकड लिया. उनका दायाँ हाथ सुन्न पड़ गया और अपने पति की असमय मौत के बाद हिम्मत और दबंगई के साथ पूरे बिजनेस को अकेले संभालनेवाली पंकज की दादी अब मन से भी कमज़ोर पड़ने लगी. उसने अपनी बहू, पंकज की माँ स्वर्णलता से कई बार अपनी ये इच्छा बताई कि अब पंकज की दुल्हन को देखने का मन है. स्वर्णलता अपने पति से इस बारे में कुछ कहने का मौका ढूंढ ही रही थी, ठीक उन्ही दिनों पंकज ने घर में घोषणा कर दिया कि वह शादी कर रहा है, लड़की उसने पसंद कर ली है.

शंकरलाल को इस बात से मन में सिर्फ एक ही आशंका थी कि न जाने कैसे घर-परिवार की लड़की होगी. उन्होंने तुरंत पता लगाया और वो लगभग संतुष्ट हो गए. संयोग ही सही लड़की की जात-बिरादरी को लेकर समस्या नहीं हुई. अंजलि के पिता बैंक में अच्छे पद पर थे और समाज में उनकी इज्ज़त थी. बहुत जल्द अंजलि जोशी-परिवार की बहू बनकर आ गई. अंजलि ने देखा कि परिवार के साथ पंकज की जीवन शैली का कोई मेल नहीं. दोनों की मांग बिलकुल अलग अलग है. पंकज अक्सर संगीत समारोह को लेकर घर से बाहर रहता, दूसरे शहरों में जाता. कुछ दिनों के लिए घर आता, फिर चला जाता. अंजलि परिवार वालों के साथ तालमेल बैठाने में लगी रहती. अंजलि माँ बननेवाली है, इस खबर को सुनते ही उसने साफ़ कह दिया कि अगर अंजलि बच्चा पैदा करेगी तो वो घर छोड़ देगा. परिवारवाले बच्चा चाहते थे. अंजलि के मायकेवाले भी यही चाहते थे. अंजलि की राय यहाँ कोई मायने नहीं रखती थी.
आखिर एक शाम पंकज ने अंजलि से कहा, “ मैं अब जा रहा हूँ. मुझे यही सब नहीं करना था. मेरे पास बहुत काम है, सपने है. तुमसे इसलिए शादी की थी कि तुम मेरा साथ दोगी.”
“ तो मैं क्या करती. अब बच्चा आ गया तो...”
“ तुम्हारी इस एक गलती से मेरा सारा सपना बिखर जायेगा. तुम्हारी आवाज़ अच्छी है, अच्छा गाती हो, ये मेरे काम का था. मेरा कितना प्लान था. बच्चा पालकर टिपिकल घर गृहस्थी मुझे नहीं करना.” पंकज ने गुस्से से कहा.
“ तो परिवार के साथ मुझे रखा क्यों ? अपने साथ साथ क्यों नहीं ले गए. और मेरी गलती ? बच्चे के लिए तुम भी जिम्मेदार हो न ?” अब अंजलि को भी गुस्सा आया. “ और यहाँ सबने अपनी अपनी मर्ज़ी बता दिया. ये किसी ने पूछा ही नहीं कि मैं क्या चाहती हूँ.”
“ मुझे सब मालूम है तुम क्या चाहती हो. बड़े घर-परिवार का धन- दौलत और प्रतिष्ठा देखकर तुम्हारा दिमाग ख़राब हो गया है. तुम्हे बस गहने-कपडे से लदी बहु बनने का शौक है.” पंकज ने सूटकेस में कपडे भरे और पैर पटकता हुआ कमरे से निकल गया. अंजलि देखती ही रह गई. ये वही पंकज है जिससे वो मिली थी !
उसके बाद चार महीने तक पंकज घर नहीं लौटा. अंजलि सातवे महीने का गर्भ लेकर मायके गई तो पंकज दिल्ली आया था लेकिन अंजलि से मिले बगैर ही चला गया था. वो मुंबई में रहने लगा था. फिर एक दो बार आया ज़रूर लेकिन न अंजलि से बात की न बेटी का मुँह देखा. और अब फ़ोन करके अपू के बारे में किस मुँह से पूछ रहा वो ! और जब अंजलि को पंकज ने बताया कि वो अब मुंबई और दिल्ली दोनों जगह रहता है, दिल्ली में पुराना घर है, माँ भी अब अकेली हो गई है, बहनें अपने अपने घर में, पंकज को ये भी मालूम है, अपू बहुत अच्छा गिटार बजाती है. आखिर बेटी किसकी है वो !

अंजलि का चेहरा कठोर हो उठा. अब बेटी याद आई है ! इतने सालों से कहाँ था ! और वो अंजलि और अपू का सारी खबर भी रखता था ! अंजलि ने तो उसी दिन पंकज को मन से निकाल दिया था जिस दिन उसने सुना था कि पंकज अब किसी फार्महाउस ओनर की बेटी के साथ रहने लगा था. वो पंकज के प्रोजेक्ट के लिए काफी पैसा लगा रही थी. अंजलि बेटी को लेकर मायके आ गई थी, फिर कभी वापस नहीं गई. जो करना था कोर्ट ने किया. तीन साल माँ के घर में रहकर एम् ए की पढाई पूरी की, जिस सरकारी हाई स्कूल में पढाई की थी उसी स्कूल में टीचर बनी और फिर छह साल की बेटी का हाथ पकडती हुई किराये के घर में अकेले रहने आ गई, किसी की भी नहीं सुनी.
गाड़ी गेट से अन्दर आकर झटके से एक दोमंजिला मकान के सामने रुकी तो अंजलि को जैसे होश आया. अरे, ये तो झूमर उसे अपने घर ले आई ! वो अपने खयालों में इतनी डूबी हुई थी कि न समय का पता चला न रास्ते का. झूमर जल्दी से गाड़ी से उतरी और अंजलि से बोली, “अब ज़मीन में पैर रखो सखी, क्या यहीं बैठोगी?” झूमर की आवाज़ में वही पुरानी शरारत थी.
“ तुम मुझे अपने घर ले आई !”
“ अब अन्दर भी चलो, आराम से बातें करेंगे.”
“ पर यहाँ से तो जमुनापार बहुत दूर है. ये तो साउथ है. मुझे जाना भी होगा वापस.”
“ आज यही रहना है डिअर, आज मेरे साथ रात गुजारो. वैसे भी तुम्हे खाली घर में नहीं जाना था.”
झूमर ने अंजलि का हाथ पकड़ा और अन्दर ले गई.

शाम को आखिर झमाझम बारिश आई. हवा में काफी ठंडक आ गई थी. दोनों सहेलियां बाहर बरामदे में बैठी थी. झूमर की सासू माँ के दिनों से हमेशा रहनेवाली शांता चाय दे गई और प्लेट में गरम पकोड़े. अंजलि से पूछा, “ इसबार बहुत दिनों में आई हो दीदी.”
“ हाँ.” अंजलि मुस्कराई.
झूमर के पति नीलाभ अक्सर दफ्तर के काम से शहर से बाहर जाते रहते है. वो अपने काम में डूबे रहनेवाले इंसान है. झूमर और नीलाभ के दो बेटे है, रोनी और दीपू. दोनों हाई स्कूल में है. दोनों बच्चो की ट्यूशन, हॉबी क्लासेज से लेकर सारी जिम्मेदारी झूमर संभालती है. इसी कारण उसने शादी के बाद ड्राइविंग सीखी थी.
अंजलि चुपचाप चाय पी रही थी. झूमर ने चुप्पी तोड़ी, “ अब मुझे बताओ, बात क्या है.”
“ कौन सी बात ?”
“ फालतू नखरा न करो. मैं समझ गई थी कि कोई बात है. इसलिए तुम्हें घर ले आई.”
अंजलि फिर भी चुप रही.
“ अब क्या मुझ से भी छुपाओगी ?” झूमर ने अंजलि का हाथ पकड़ लिया. अंजलि के लिए झूमर के मन में कोमल कोना रहा है हमेशा. हर जरुरत में अंजलि के पास खड़ी हुई है वो.
“ समझ में नहीं आ रहा क्या कहूँ. पंकज आजकल अक्सर दिल्ली में रहने लगा है और मुझे शक है कि उसने अपू से भी संपर्क किया होगा.” इतना कहकर अंजलि थोड़ी देर रुकी, फिर एकदम से बोली, “ मैं नहीं चाहती कि वो मेरी बेटी से मिले.” अंजलि की आवाज़ रूआँसी हो गई.
“ तुम्हे कैसे मालूम हुआ?” झूमर को उत्सुकता हुई.
“ पंकज ने मुझे फ़ोन किया था तो मैंने अंदाज़ा लगाया और इधर अपू भी पंकज के बारे में बहुत सवाल पूछ रही है. मैंने उसे जितना ज़रूरी था बता दिया है. लेकिन मुझे डर है कि....” अंजलि ने झूमर को देखकर कहा, “मुझे डर लग रहा है झूमर, अपू मुझे छोड़कर तो नहीं जाएगी न ! अगर पंकज ने...”
“बिलकुल नहीं. मैं अपू को जानती हूँ. वो पंकज को जानना चाहती है तो जानने दो. मिलना चाहे तो मिलने भी दो. उसकी उम्र ही ऐसी है, खुद परखकर देखने दो.”
“ पंकज को ये भी पता है कि अपू अच्छा गिटार बजाती है. मेरी छठी इन्द्रिय कह रही है कि ये बेटी के लिए प्यार नहीं उमड़ पड़ा है अचानक, कोई प्लान होगा ज़रूर. अपू कोई लालच में न आ जाये.” अंजलि के चेहरे पर आशंका थी.
“ कुछ नहीं होगा. वो बहुत समझदार लड़की है. लोग अक्सर अपने से छोटी उम्र के पीढ़ी को कमतर समझते है, ये ठीक बात नहीं. अगर फिर भी कोई बात होगी तो मैं हूँ तुम्हारे साथ.” झूमर ने आश्वासन दिया.’’
“ मैं अपू के बिना कैसे रहूंगी ?” अंजलि असहाय स्वर में बोली.
“ तुम तो बहुत हिम्मतवाली हो. इतना कुछ अकेले संभाला अभी तक. ससुराल से भी कुछ नहीं लिया. अपने दम पर हो हमेशा. मैंने देखा है किस तरह तुमने अपू को बड़ा किया. अब उसे रोको मत. उसे खुद समझने दो.” झूमर ने अंजलि की आँखों में देखा. “और तुम्हारी बेटी कौन सा जिंदगी भर पास रहेगी ? उसकी अपनी जिंदगी होगी. हम अपनी ड्यूटी कर रहे है बस. अगर हमने बच्चों को सही से पाला है तो वो दूर रहकर भी पास होंगे और अगर नहीं पाला तो बगल में रहकर भी नहीं पूछेंगे.”

अंजलि हैरत भरी नज़रों से झूमर को देख रही थी. ये कितनी अलग झूमर है. कितनी अलग तरह से सोचती है. अंजलि को काफी हल्का महसूस हुआ.
दो-ढाई घंटे की बारिश ने पूरे शहर को धो दिया था. आंगन में लगे हुएं पेड़ों के पत्तों से बारिश की आखिरी बूंदें टपक रही थीं. अंजलि और झूमर काफी देर तक बरामदे में बैठी रहीं.

रात को एक ही बिस्तर में लेटे-लेटे दोनों सहेलियों में और भी बहुत सारी बातें हुई. पुरानी यादें ताज़ा हुई. झूमर ने अलकेश के बारे में भी बताया. अलकेश उनके दोस्तों के ग्रुप में था. बहुत अच्छा गाता था. किसी भी प्रोग्राम में हारमोनियम बजाने की जिम्मेदारी अलकेश को ही मिलती थी. अंजलि की शादी के बाद वो अचानक नौकरी करने पूना चला गया था, वही किसी मराठी लड़की से शादी भी कर ली. अब फिर से दिल्ली में बसना चाहता है. पुराना अमर कोलोनी वाला मकान बेचकर द्वारका में उसने एक फ्लैट खरीदा है. नौकरी तो उसने घर चलाने के लिए की, गाना-बजाना लेकर ही रह गया वो अब तक. झूमर से बातचीत होती है कभी-कभी, झूमर और अलकेश की माँ किसी रिश्ते में बहनें हैं. अलकेश ने ही झूमर से कहा था, दिल्ली में फिर से एक कल्चरल ग्रुप बनाया जाये क्या. उसे बहुत मन है.

अगला दिन रविवार था. पिछली रात की बारिश ने धरती को नहलाकर नए रूप में सजा दिया था. प्रकृति निखर आई थी. सूरज के चटख रंग चारों दिशाओं में प्रतिफलित हो रहे थे.
अंजलि के स्कूल की छुट्टी थी. झूमर ने बिना नाश्ता किये अंजलि को जाने नहीं दिया. वो तो दोपहर तक रोक रही थी, पर अंजलि को अपू की चिंता थी. वो कभी भी घर लौट सकती है. रात को अंजलि ने जानबूझकर उसे कॉल नहीं किया था.

टैक्सी  में बैठकर अंजलि को अलकेश का ख्याल आया. इतने सालों से कैसे भूली रही वो उसे ! अलकेश ने कभी अंजलि से कहा था, “ तुम गाना छोड़ना नहीं अंजलि, कितनी प्यारी आवाज़ है तुम्हारी. हमेशा गाती रहना.”
शायद वो और भी कुछ कहना चाहता था, अंजलि ने मौका ही नहीं दिया. बहुत जल्दबाजी में शादी कर ली पंकज से. दरअसल अंजलि भी गाना लेकर ही रहना चाहती थी. इसलिए नहीं कि उससे कोई फायदा हो, बस आनंद के लिए, संगीत एक दूसरी दुनिया में पंहुचा देता है. अलकेश बेंक में नौकरी करना चाहता था, अंजलि को लगा था कि बेंक में काम करके गाना कहाँ बच पायेगा उसका. पंकज के गाने के प्रति पागलपन देखकर वो मुग्ध हो गई थी. लोगों को जांचने में कितनी गलती हो जाती है अक्सर. अंजलि ने गहरी साँस ली.

गेट से अंदर घुसते ही अंजलि ने देखा कि घर का दरवाज़ा आधा खुला हुआ है और अपू बरामदे में रखे पौधों में पानी डाल रही है. अंजलि ने राहत की साँस ली. घर की एक चाभी उसके पास रहती है. वो बेटी के पास जाकर खड़ी हो गई. अपू कोई गाना गुनगुना रही थी, उसने माँ की तरफ देखा, “ तुम कहाँ चली गई थी सुबह सुबह माँ, आज तो सन्डे है.”
“ कल स्कूल के बाद तुम्हारी झूमर मौसी मिली थी, जब उसने सुना कि तू रात को घर नहीं लौट रही तो मुझे अपने घर ले गई. फिर शाम को इतनी बारिश हो गई, वैसे भी वो मुझे आने नहीं दे रही थी. तुम कब आई ?”
“ अच्छा ! तुम कल वहाँ थी. मैं तो दो घंटे पहले ही आ गई थी, दरवाज़ा खोला और रमा दीदी को फ़ोन किया. तुम्हारे बारे में पूछा, उसे मालूम नहीं था, उसके बेटे को बुखार है, वो कल ही आ पायेगी.”
“ हाँ, वो कल भी नहीं आई थी. अब अन्दर चलो, मैं तो नाश्ता करके आई हूँ. तुम्हारे लिए कुछ बना दूं.”
“ मैंने भी दूध ब्रेड खा लिया था. अभी और कुछ नहीं.”
अंजलि ने और कुछ नहीं पूछा. पता नहीं क्या था जो उसे कुछ पूछने से रोक रहा था.
“ माँ, आज दोपहर का खाना बाहर से मंगाएंगे. आज चाइनीज खायेंगे.” अपू अन्दर चली गई.
अंजलि के मन में हलचल मची रही. अपू ने अब तक नहीं बताया कल रात को कहाँ थी, हमेशा तो घर पहुचते ही वो पूरी कथा सुनाने लगती है. कोई और बात तो नहीं. अंजलि के मन में कई आशंकाए आती जाती रहीं.

बात खुली खाने की मेज पर . अपू ने ही शुरू की, “ माँ, मैं कल शाम को आपकी ससुराल गई थी.” इतना कहकर उसने चम्मच से फ्राइड राईस मुँह में भरा. अंजलि आश्यर्य से अपू का निर्विकार भाव देख रही थी. उसके मुँह से बोल नहीं फूटे. अपू ने माँ का चेहरा देखकर कहा, “ सोचा तुम्हे शायद अच्छा नहीं लगे, इसलिए पहले नहीं बताया. तुमसे उन लोगों के बारे में पूछा भी, लेकिन पूरा जवाब नहीं मिला. फिर सोचा खुद ही इसे हेंडल करते है.”
“ मतलब?”
“ मेरे पास कई फोन आया था.”
“ किसका फ़ोन ?”
“ पंकज कुमार जोशी का, जो मेरे बॉयोलोजिकल पिता हैं. वो मुझसे मिलना चाहते थे. इसलिए उनके बारे में मैंने तुमसे पूछा था.”
अंजलि जैसे खाने का कौर निगलने भूल गई थी.
“ उन्होंने मुझे अपने ऑफिस में बुलाया था, लेकिन मैंने ये शर्त रखा कि उनके घर में मिलूंगी. वो मान भी गए.”
“ फिर ?”
“ वहाँ मेरी बड़ी आवभगत हुई, वहाँ उनकी माँ भी थी, मेरी पढाई के बारे में पूछा. पंकज जी ने उनकी म्यूजिक कंपनी में मुझे ज्वाइन करने का ऑफर दिया. वो लोग मुझे घर की बेटी कह रहे थे और ये भी कहा कि घर का इतना बड़ा बिजनेस है, मेरी म्यूजिक सेन्स की तारीफ कर रहे थे, मुझे ये भी कह रहे थे कि उनकी कम्पनी के बैनर में मैं बहुत तरक्की कर सकती हूँ, फेमस हो सकती हूँ.
“तुमने क्या कहा ?” अंजलि का सब्र ख़त्म हो रहा था.
“ मैंने अपना चॉइस बताया और क्या. म्यूजिक मेरा पैशन है लेकिन मैं आगे बहुत पढ़ना चाहती हूँ, सोशियोलॉजी में पी.एच.डी करना चाहती हूँ, कुछ सोशल वर्क भी करना चाहती हूँ, मुझे लिखने का शौक है, ट्रेवल करना पसंद है, मुझे किसी फॅमिली बिजनेस में बंधने का बिलकुल मन नहीं है.” अपू अपनी माँ की तरफ देखकर मुस्कुराई. “ मैंने उनको इतने अच्छे ऑफर के लिए और इतने सालों बाद मुझे याद करने के लिए धन्यवाद भी कहा और फिर लौट आई. रात को मैं सुमिता के घर में रुक गई थी,वहाँ से पास पड़ता है न.”
“ तुमने इतने सपाट तरीके से मना कर दिया ?” अंजलि को विश्वास नहीं हुआ उसकी बेटी अपू इतनी सहजता से इतनी बड़ी बात कह देगी.”
“ वो एक बिजनेस डील थी माँ, इसमें हाँ और ना कहना ज़रूरी होता है. उन लोगों के लिए मेरी मेमोरी में कुछ भी नहीं है जो घर-परिवार से रिलेटेड हो. जो काम मुझे नहीं करना उसके लिए तो ना ही होगा न.” उसने थोडा रूककर कहा, “ उन लोगों में से किसी ने भी पूरे समय तुम्हारे बारे में कुछ नहीं पूछा. शायद इसीलिए भी मैं इतनी आसानी से मना कर पाई.”
अंजलि की आँखों में आंसू झिलमिला रहे थे. माँ-बेटी ने चुपचाप खाना ख़त्म किया. अपू जूठे बर्तन उठाकर सिंक में रखने के लिए उठ गई. अंजलि बची हुई चीज़े फ्रिज में रखती रही.
आज दोपहर बाद फिर से बूँदें गिरीं. ये मौसमी बारिश नहीं, लेकिन ठंडक सुकून दे रही है. अपू फ़ोन में किसी से बातों में लगी हुई है. अंजलि ग्रीन टी का कप लेकर खिड़की के पास बैठी है. सामनेवाली सड़क के अमलतास के पेड़ में फूल खिले है. कुछ दिनों में पूरा पेड़ सुनहरे फूलों से भर जायेगा.
अंजलि चाय पीती हुई खिड़की के पास बैठी रही. उसका मन अब शांत हो गया था. अचानक उसके मन में ख्याल आया कि अलकेश अगर कल्चरल ग्रुप शुरू करेगा तो वो भी ज्वाइन कर लेगी. फिर से गाना शुरू करेगी. अंजलि ने महसूस किया कि उसके मन में दबा हुआ कोई बीज अब धीरे-धीरे अंकुरित होने लगा है.

-पापोरी गोस्वामी

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