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फितना

इधर नौरंगी कुछ रोज से बहुत परेशान था।  आँखों में न जाने कैसी वीरानी उतर आई थी, जो सनीमा के प्रीत-प्यार के गाने सुन कर और गहरी हो जाती थी।  बहुत दिन पहले कानपुर में दंगे हुए, तभी उस रेलमपेल में उस के हाथ एक टेपरेकॉर्डर लग गया था।  पार साल बस में कहीं जाते हुए ड्राईवर की नजरों से खूब नजरें मिलाते हुए जो कैसेट उठाई थी, वही अब उसकी जान का अजाब हो गई थी

'' इस ससुरे अताउल्लाह खाँ ने सारी गजलें मेरे ही लिये गाई हैं क्या? ''

अकसर रो-रो कर हलकान हो जाने के बाद वह अपने आप से पूछता।  शौकिया हज्जाम से गुजारिश कर जो कानों के पीछे लम्बे बाल रखवाए थे, अब जैसे उसके जोगी हो जाने का सबूत थे।  पूरी रात पूरा दिन खटिया पर गुडा-मुडा पडा रहता, घर भर की बातों का हाँ-हूँ में जवाब दे करवट बदल लेता।  माँ की मिरचों की धूनी और चौराहे पे सतनाजे के टोटके भी जब यूँ ही होकर रह गए और नौरंगी की आँखों की वीरानी और-और बढती गई, तब दिन भर की प्लास्टिक की फैक्ट्री की मजदूरी और दमघोंटू धुँए से आजिज आया बाप दहाडा,

'' दुई लात लगा दे तो एकरा दिमाग ठिकाने पर माँ ने बाप की दुलत्ती को फिलहाल यह कहके पोस्टपोन करवा दिया कि, अबहीं तेल देखो तेल की धार देखो।  जवान लडक़ा के कहीं अहसन? मुदा कहीं चलईं गए तो का करोगे? ''

और नौरंगी के चेहरे पे गीत-गजल सुन के कभी एक आध, बाज दफा पूरे नौ के नौ रस उतरते रहे।  बेशक इनमें करूणा का रस प्रधान होता जब वह अताउल्लाह खाँ की गज़ल  इसक में हम तुम्हें का बताएँ आवाज में आवाज मिला कर गाता।  फिर बाईस नम्बर बीडी क़े कितने खाली बन्डल खटिया के पास से सुबह माँ बटोरती और मुहल्ले भर को कोसने भेजती, अईसन सुन्दर रहा हमार बिटुआ, कौन जाने किसके दीदे जले रहें

यूँ सबको पता था कि ये इसक की चोट गली के नुक्कड पे परचूनी लाला की बिटिया ने दी थी नौरंगी को

परचूनी लाला को जैसे बस्ती का हर बच्चा नाल काटने के वक्त से जानता है।  किसी जेल की काल कोठरी जैसी बित्ते भर की दुकान में जैसे मालो असबाब की पूरी लंका बसा रखी थी लाला ने।  बच्चों का पेट चल जाने पर दी जाने वाली हरड से लेकर सुखी विवाहित जीवन के भी सारे रामबाण अचूक उपाय थे वहाँ।  दाल, चीनी, नमक , तेल, सूजी और गुड क़ी बोरियों के बीच लाला पटरे पर कहाँ कैसे अटका था, बस ईश्वर का ही चमत्कार था।  तेल से चीकट बनियान पहने लाला का घर से दुकान और दुकान से घर का कभी न टूटने वाला क्रम बाप के मरने पर भी नहीं टूटा था।  सात बजे मरे बाप को आनन-फानन में बारह बजे तक निपटा कर एक बजे दुकान पर पहुँच गया।  दबी-दबी जुबान में किसी ने लोक लाज की गुहार लगाई तो लाला का फलसफा जैसे मुँह सिल गया सबका,

'' देखा भैया, पिताजी ऐन मरे के वखत कहे रहे कि बिटुआ दुकान पर बैठे का फरज आज से तोहार है और ई टूटना ना चाही।  तो आज का जो कल होता तो अभी-अभी जन्नतनशीं हुए बाप की ताजी रूह इस सदमे को कैसे झेलती। ''

किसी ने समझा, किसी ने नहीं, पर फिर लाला को टोकने की हिम्मत किसी की नहीं हुई।  इसी परचूनी लाला की शोख मोटी-मोटी आँखों वाली बेशक मोटे-ताज़े जिस्म की मालिक बेटी ने बेचारे दुबले-पतले नौरंगी को कब आँखों के रास्ते से कलेजे तक घायल किया, मुहल्ले तो मुहल्ले खुद नौरंगी तक को पता न चला।  उस गरीब को तो बस दिन याद है , मंगलवार था।  दिन भी यूँ याद रह गया कि माँ ने जब परशाद नौरंगी के हाथ में रखा तो पतंग के पीछे पगलाए उस नामुराद ने हथेलियों की अंजुली न बना बेपरवाही से एक ही हाथ में परशाद झपट लिया था और जीने की तरफ पैर बढाया था कि माँ न उसे इस बेपरवाही पे हैजा, ताउन हो जाने के कतई जाने पहचाने शाप दे दिये थे जो कभी फले नहीं थे

'' परशाद का अपमान करोगे तो बजरंग बली का कहर टूटेगा। ''

और उस दिन जो कहर छत पर नौरंगी पर टूटा वह खुदा का नाजिल किया हुआ ही था।  वरना नौरंगी क्या ऐसा था कि किसी देसी साबुन से धोई जुल्फों के पेंच में फँस जाता और फँसता तो ऐसा कि जीना तो जीना मरना भी मुहाल हो जाता।  पर छत में बाल सुखाने को खडी लाला की बेटी रसवंती में उस दिन नौरंगी के कमरे की पूरी ही तो दीवार हथियाए अधगीली साडी में लिपटी हीरोईन पोस्टर से उतर कर बस गई थी और बेचारा नौरंगी जब छत से गई शाम नीचे उतरा तो, पैर किसी लम्बी बीमारी के बाद उठे रोगी से काँप रहे थे।  हलक सूखा था जो नीचे आकर छह सात गिलास पानी पीकर भी सूखा ही रहा

फिर दिन गुजरे, हफ्ते गुजरे।  नौरंगी पतंगे थाम सुबह से छत पर आ बैठता।  पतंगें उडतीं, पेंच लडते और विरोधी खेमे के पंतगबाज भौंचाए से नौरंगी की कटी पतंगे सहेजते

पेंच आसमान में होते और नौरंगी की
आँखे छत पर कभी पापड क़भी धनिया तो कभी लाल मिर्च सुखाती रसवंती की बिना पतंग की डोर में ऐसी उलझतीं कि इसी डोर में गरीब का दिल उलझा उसकी छत पर जा गिरता और आसमान की पतंग दुश्मन लपक लेते।  इस दुतरफा नुकसान को झेलता नौरंगी रोज सुबह शाम जीना चढता रहा।  आसमान में बादल होने पर बीडी क़ी तलब लिये लाला की दुकान पर आता तो आँखे उस दरवाजे पर लगी रहतीं जो घर और दुकान को जोडता था।  हाथ में चाय का लौटा और स्टील का गिलास थामे रसवंती आती भी और बाप को चाय थमा चट से चली भी जाती पर नौरंगी के बीडी क़े धुँए के छल्लों में उसके नक्श बनते और बनते ही रहते, बिगडते यूँ नहीं बस कि गम का मारा नौरंगी बीडी बुझने कहाँ देता था

यह लुका-छिपी का खेल चलता ही रहता अगर ईश्क में रसवंती ने खतोकिताबत का सदियों पुराना सिलसिला शुरू न किया होता।  नौरंगी हर्फों से उलझ कर रह गया और रसवंती ने घडे क़े ठीकरे में जो कागज लपेट कर उसकी पीठ पर दे मारा, उसने सारा मंजर ही बदल दिया।  खत लिखती हूँ खून से स्याही न समझना का हौलनाक काम लडक़ी ने लिखा ही नहीं था, कमबख्त ने कर भी दिखाया था।  याद आया नौरंगी को कि आज सुबह छत पर कपडे सुखाते में उसने उसके हाथ की तर्जनी पे बँधी पट्टी देखी जो थी, कलेजा मुँह को आ गया नौरंगी का।  आँखों के आगे छाया अँधेरा खत की आखिरी लाईन पर आकर और भी गहरा गया।  कल शाम घूरे बाबा के मसान पर मिलना

बित्ते भर की छोकरी और ऐसी हिम्मत! घूरे बाबा के मसान की तरफ तो लोग दिन में जाते कतराते थे तो शाम को।  भूत , चुडैल, डाकिनिया, पिशाच सभी तो बास करते हैं वहीं, अम्मा ने बताया था नौरंगी को।  पूरी रात घिघ्घी बँधी रही नौरंगी की।  सुबह हुई तो लगा साँस ठीक से आ-जा नहीं रही।  क्या-क्या ना करके साँस को सिलसिलेवार किया नौरंगी ने दोपहर तक।  पर शाम आते आते वही आलम।  अलगरज उलझा-उलझा सा नौरंगी उन्हीं उखडी सांसों के साथ मसान पर पहुँच गया, जहाँ वह पहले से मौजूद ऊँचे चबूतरे पर बैठी पांव हिला रही थी।  नजरें मिलीं और न जाने कौनसी बिजली लपकी कि बिचारे नौरंगी की आँखे जमीन में जा गडीं

''देखो ना हमारी तरफ..'' की सीधी-सीधी फरमाईश पर भी लोक लाज के सताए नौरंगी ने अपनी आँखे न उठाईं तो कयामत ही टूट पडी।  ऐसी बेजा हरकत उसके साथ आज तक न हुई।  तब भी नहीं जब लुका-छिपी खेलते उसने नीम अँधेरे का फायदा उठा कर पडौस की धनपतिया को चूम लिया था।  पत्ते सी काँप गई थी लडक़ी।  छोडो कोई देख लेगा कह कर वह घर की तरफ लपक ली थी।  फिर एक दो दफा ऐसे मौके आने पर कोई देख लेगा का मीठा डर नौरंगी के पूरे जिस्म में सनसनी फैला जाता था।  उसके अन्दर का मर्द गहरा सुकून महसूस करता था कि वह डर किसी लडक़ी को उसका दिया हुआ है।  प्यार के लम्हों में अपने पूरे वजूद को एक पूरे माहौल पर छाए देखने के आदी नौरंगी को यह गहरा झटका लगा जब उस शोख, बिंदास लडक़ी ने उसके होंठ चूम लिये और वह घबरा कर चिंहुक उठा, '' एए...कोई देख लेगा। ''

'' कोई नहीं देखेगा, और देखता हो तो देखे..'' का जंगी ऐलान करती वो उसके सीने पर पसर गई।  नौरंगी हाय-हाय करता रह गया और वह उसके तमाम सीखे-सीखाए, किताबों से जहन में दर्ज हुए ईश्किया दरसों पे झाडू फ़ेर कर उसे आँधी के बाद तहस-नहस हुए शहर सा छोड क़पडे झाड यूँ चल दी मानो कुछ हुआ ही न हो।  लुटा पिटा नौरंगी घर लौटा तो दरवाजे पर ही अम्मा ने माथे को छू के बहुत तेज ताप का अनुमान लगा लिया।  लाला की दुकान से मँगाई आनंदकर की दवाई और रात भर अम्मा का पट्टी पे पट्टी बदलने का जतन भी इस बुखार को तोडने में नाकामयाब रहा।  सुबह ही माँ ने बाप को किसी भूत पिशच का असर होने के खौफनाक अंदेशे से वाकिफ करवाया।  चूँकि नौरंगी रात भर इस बुखार में कैसी-कैसी आवाजें निकाल रहा था।

'' छोडो देखो कोई देख लेगा.. '' कह के नौरंगी ने जब माँ का सीने पर रखा हाथ दबा दिया तो जानकार अम्मा को समझने में पल न लगा कि हो न हो, भूत कोई औरत का है।  पर बुखार टूटा छत पर जाकर, जब अपनी छत की बरसाती की ओट में खडी रसवंती ने अपना निचला होंठ दाँतों में काट कर फिर वहीं मिलने का इशारा किया।  अजब बुखार था।  सुबह उतरता तो शाम होते होते उसका पूरा जिस्म तपने लगता।  उस तूफानी बला के सामने पहुँचते ही उसका सारा वज़ूद जैसे भट्टी हो जाता था।

शुरू के दिनों में ऐसे मौकों पर नौरंगी हनुमान चालीसा का पाठ करता पर जब उस शैतान की खाला ने कतई बेहतियातन तरीके से उसे ईश्क के मजे देने शुरू किये तो नौरंगी ने बजरंगबली को इस मुआमले से हटा दिया।  बिचारे ब्रह्मचारी की भी क्यों मिट्टी खराब करवाऊँ अपने साथ।  सो बिना किसी देव या भगवान की ओट के सीधे-सीधे इस तूफान के हवाले खुद को करता रहा नौरंगी।  रोज-रोज घूरे बाबा के मसान पर धूनी सा तपते उसके जिस्म का पोर-पोर रफ्ता-रफ्ता इस अघोरन के पास गिरवी हुआ जा रहा था।  यूँ वो खास कुछ करती नहीं थी, पर कपडे निहायत गैरसलीकेदार पहनती थी।  कुर्ते का गला ऐसी बेहूदगी से नीचे तक कटा रहता कि एकाध दफा नहीं बल्कि कई दफा नौरंगी मुँह के बल गहरे गङ्ढे में गिरता-गिरता बचा।  पीठ पीछे से इतनी नंगी कि उसे गले से लगाए उसके हाथ जब भी उसकी पीठ के उस हिस्से को छूते तो जैसे हजारहां चींटियाँ उसके बदन पर रेंगती रहती।  कभी साँस आती कभी जाती और वह एक टेमर की तरह अपनी आँख के इशारे से जरूरत के पिंजडे में कसे इस शेर को बस जिन्दा भर रहने के लिये दो बोटियाँ दे अपनी राह लेती

भूख दहाडती रही - दहाडती रही।  और इसी बीच कहर यह टूटा कि न जाने कैसे घूरे बाबा के मसान पर जलने वाली इस रोजमर्रा की धूनी का धुंआ लाला की नाक ने सूंघ लिया।  सो इस किस्से की इब्तदा में दर्ज नौरंगी का यह बेहाल हाल उसी दौर की दास्तां है, जब रात होने पर बुखार चढा तो, पर घर में ताले में कैद रसवंती के न दिखने पर नहीं उतरा।  बौराया नौरंगी रोज धूनी पर जाता, लौट आता।  आँखे रात-रात भर जाग कर जेसे सुर्ख अनार हो गईं थीं।  उसे किसी का होश न था, न खबर थी।  यह खबर भी नहीं कि इसी मुद्दे पर लाला और उसके बाप में आज सुबह खूब जूतमपैजार हुई थी।  एक दूसरे की माँ-बहन को चौक में इकट्ठी भीड क़े सामने जलील कर दोनों अपने-अपने धंधे पर लौट गए थे।  नौरंगी छत से आँगन, आंगनसे गली और गली से फिर घर के चक्कर लगा-लगा कर पगला गया

यूँ पडौस की धनपतिया भी थी, मुसद्दी चाचा की रधिया भी थी जिसके साथ बीते साल नौरंगी ने सनीमा देखा था।  सनीमा क्या देखा था, बस अँधेरे में जरा हाथ आजमाये थे और पूरी फिल्म के दौरान सैकडों बार कोई देख लेगा छोडो ना का दिलनशीं जुमला सुना था।  पर आज कोई भी, कोई भी तो नहीं चाहिये था उसे रसवन्ती के सिवा।  कभी-कभी उसे लगता था कि बोटियों की दी हुई इस भूख को झेलने से क्या ही अच्छा होता अगर वो एक ही झटके में पूरी की पूरी रसवंती को निपटा देता पर दिल में जानता था कि कयामत कर देती वह।  कौन जाने इन बोटियों से भी महरूम कर देती वह।  यूँ शायद वो आम औरत है भी नहीं।  आम औरतें तो उसकी अम्मा की तरह होती हैं, जो रात में कैसे भी इधर-उधर असामान-असबाब की तरह बिखरे बच्चों से पैरों को बचाती बाप के कमरे में जाती हैं और पन्द्रह मिनट बाद लौट भी आती हैं।  ऐसे प्यार कैसे हो जाता है?

उस पर फाश हो गया था तमाम किस्सा कि कुछ भी पूरा पा जाने के बाद किसी अनछुए की प्यास मर्द के हाथों की लकीरों में दर्ज होती है।  बेमुरव्वती से पटके पेट भर गोश्त से कहीं बेहतर लगती है रूह को तस्कीन देने वाली वो बोटियाँ जिनमें प्यार के वो मजे होते हैं जो अकसर इन्सान और खुदा का ताल्लुक आसान कर देते हैं।  थोडे पर भी पूरा पा जाने की खुशी, फुरसत और तजुर्बों की चाशनी में पगी हुई

दिन, हफ्ते।  रसवन्ती नहीं दिखी तो नहीं दिखी।  कहीं कोई मौका दिखता न था।  यूँ महाराजिन से पता चलवा लिया था नौरंगी ने बख्शीश देके कि रसवन्ती के लम्बे-लम्बे बालों में खूब ढेर सारा तेल डाल के जब भी उसकी माँ चुटिया बनाती है तो यूँ ही ऐहतियातन बाल खींच के उसे सुबह शाम नाना किस्म के श्राप देती रहती है।  इन दिनों रसवन्ती का घरेलू नाम रस्सो कम पुकारा जाता था।  मुँहजली, करमजली, निगोडी क़े हाल ही में अता हुए नामों में बदस्तूर इजाफा हो रहा था।  और लडक़ी ऐसी ढीठ कि मजाल है, मुँह से कुछ फूटे..।

'' कहाँ मिलती थी? कहीं मुँह तो नहीं काला करवा लिया? '' के तमाम सवालों पर वह पैर के उसी अँगूठे से जमीन कुरेदने लगती, जिस अँगूठे को नौरंगी के पैरों की अँगुलियों में फँसा कर उसे बजरबट्टू सा घुमाया था लडक़ी ने।

न जाने कब तक यह चलता रहता कि भगवान ने जैसे खुद आकर मोर्चा सम्हाल लिया इस असंभव काम का।  हुआ यूँ कि एक दोपहर तमाम घरों के ताले धमाधम बन्द होने लगे।  मुद्दतों तक हिन्दुस्तान में बहने वाली भूली-बिसरी दूध की नदियाँ आज फिर बहने लगी थीं।  जिसे देखें दूध का लौटा लिये मंदिर की तरफ भागा जा रहा था।  नौरंगी की माँ भी गई, भाई-बहन भी गए।  गणेस जी की ' दूध  की ललक आज कैसे भी बुझती न थी।  धनपतिया की माँ, इसकी-उसकी चाची, ताई, बुआ, फूफी सब ही तो अपने-अपने हिस्से का पुण्य बटोरने में लगे थे।  ऐसे में न जाने कैसे लाला की बुध्दि में भी बैकुण्ठ का मोह पसर कर बैठ गया।  ललाईन को ले उसने भी मंदिर की राह ली पर जाते-जाते दरवाजे पर पिता जी के जमाने का अलीगढ से खरीदा वह ताला ठोंक दिया जिसका किस्सा मुहल्ले वाले यों बयान करते हैं, आज भी नुक्कड पर कि चोरों के तमाम औजार फेल कर दिये इस ताले ने।  कोई लोकल मेड ताला होता तो दुअन्नी न बचती लाला के घर।  बस इसी ताले के भरोसे रह गया लाला और जब दूध के कईयों चम्मच अपनी बेटी का नौरंगी से कैसे भी पीछा छुडाने के एवज में गणेश जी को पिला कर वह लौटे तो चिडिया उड चुकी थी।  रोने पीटने के बाद लाला ने अनुमान लगाया कि शायद जल्दबाजी में वह चाभी को पूरा ताले में उमेठना भूल गया होगा

उधर रसवंती न जाने कौन से गाँव में और किसके घर में कपडों की गठरी सी बँधी-बुँधी बैठी थी।  सब कुछ ऐसी जल्दी में हुआ कि उसे तो याद है बस रिक्शा में नौरंगी के दोस्त सदाकत अली की बहन का बुरका पहन के स्टेशन तक आना, वहाँ नौरंगी का मिलना, फिर रेल की धुक-धुक।  किसी स्टेशन पर उतर कर सूने प्लेटफार्म और बाहर आने पर ढोरों-डंगरों की आवाजों से, खेतों से अन्दाजा लगाया कि कोई गाँव है।  वहाँ से सीधे गाँव की सीमा पर बसे एक छोटे मन्दिर में नौरंगी ने जब उसे गणेश जी की मूर्ति के आगे न जाने कब का खरीद कर रखा चाँदी का मंगलसूत्र पहनाया तो रसवन्ती की आँखों में प्यार के ढेरों-ढेर दरिया उमड आए वरना अब तक तो बराबर उसे उन तमाम लडक़ियों की याद आती रही जो घर से भागने के बाद मुंबई के फारस रोड पर अपने शहर के लोगों ने ही देखी थीं।  सुकून और इत्मीनान के चनाब में उसने अपने आपको फिर ढीला छोड दिया था।  जहन अब किसी डर से आजाद था, रूह किसी दोशीजा का पाक साफ दामन थी।  किसी दोस्त के घर लाया था उसे नौरंगी।  घर की औरतों ने उसे अपनी किसी अज़ीज़ा सा पहलू में लपक लिया।  दोस्त की अम्मा ने दरवाजे पर उससे पानी में सिक्का डलवा कर उसे बकायदा एक बहू का दरजा दे दिया था।  तमाम दिन किसी रौनकखेज सिलसिले के मानिंद गुजरा।  फिर जब उसे घर की सबसे अलग कोठरी नुमा लेकिन साफ सुथरे कमरे में बिठा घर की औरतें चली गईं तो रसवंती को पहली बार अम्मा पिताजी की याद आई।  आँसू छलके तो पल्लू में जज्ब हो गए।  माँ-पिताजी के साथ ही याद आगई थी घूरे बाबा के मसान की।  एक बिजली सी लपक गई उसके पूरे बदन में।  न जाने कब तक अपने ही माजी क़ी यादों में मुब्तिला गुलनार होती रही कि कमरे में आकर नौरंगी उसके पास बैठ गया।  गठरी और सिकुड ग़ई भीगी हुई, जैसे किसी ने अभी-अभी घाट पर धुले कपडों की बिना सुखाए पुटलिया बाँध दी हो

अजीब चुप्पी थी, नौरंगी हैरत में था।  भला इतनी देर उससे ऐसे दूर कहाँ बैठती थी वह।  इत्ती सी देर में तो वह घूरे बाबा के मसान पर जाने कै दफा इसी रसवंती ने लगभग उसकी इज्जत पर हमला ही बोल दिया था।  पलंग की पाटी पर जैसे-तैसे टिका नौरंगी धडक़ता दिल और उखडती सांसोंवाला वही नौरंगी था, जो मसान पर अपने साथ हुए कतई गैरशरीफाना हादसों का जिक़्र अपने करीबी दोस्तों से भी यूँ नहीं करता था कि कौन यकीन करेगा।  फिर आज क्या हो गया है? हैरान परेशान नौरंगी ने जैसे-तैसे थूक गटकते हुए पूछा था, कोई खता हो गई का हमसे? गठरी थोडी हिली, फिर सिमट गई।  अब चौरंगी का कलेजा हिल गया।  जैसे-तैसे हौसला करके उसने चादर के भीतर हाथ डाल कर उसके मुँह को उपर उठाया तो चौंक गया।  दूर-दूर तक भी उन मोटी-मोटी आँखों में कहीं कोई अध्दा या पव्वा नहीं था जिसे पीकर वह हमेशा से होश खोता आया था।  पलकों की कोरों पर दो सितारे टिमटिमा रहे थे, जो यकीनन आँसू थे, यह नौरंगी ने अपने होंठों में उन्हें छुपाने पर जाना।  फिर आहिस्ता से दो होंठ हिले,

'' हम वैसी नहीं हैं जइसन तुम समझते हो।  हम जानती हैं तुम क्या सोच रहे हो, पर हम और का करते? लखपतिया थी, धनपतिया, सरोज थी, ऊषा थी और भी न जाने कौन-कौन रहीं।  सबने ही बताया था हमें कि तुम बोले थे उन्हें कि यह कोई देख लेगा क्या होता है? प्रेम में कैसा डर? हम भी जो यह कहते तो उनकी तरह हमें भी न छोड देते तुम? तुमसे प्रेम करते थे सो अपनी लाज सरम सब आज तक के बख्त के लिये भूल बैठी थीं।  पर अब हमसे न होगा।  हम वैसी नहीं हैं। ''

जाने कितने रोज, कितने हफ्तों, कितने महीनों से भूखा शेर अपनी भूख बिसरा पूँछ दबा कर बैठ गया था।  आसमान के चाँद ने उस रात एक जानवर का इन्सान में तब्दील हो जाना खूब देखा था।  उस रात बिस्तर पर रात भर जो एक दूसरे से दीवानावार लिपटे पडे रहे, वे आदम और हव्वा अपने-अपने जिस्मों के साथ ही नहीं रूह से भी एक थे।  सुबह लडक़ी की पलकें चूमते मर्द ने नींद में खो जाने से पहले डूब कर कहा थामैं तो शुरू से जानता था, तुम वैसी नहीं हो

- सीमा शफक़

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