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ढाई आखर

याद आती हैं
आधी अधूरी सी बातें
कुछ ना कह कर भी
सब कुछ कह जाना
जुबां को शब्दों का
ना मिल पाना
नज़रों से हकीकत का
बयां हो जाना
दिल की हर इक बात का
वह मूक सफर
ना कुछ कहा
ना कुछ सुना
सिर्फ मेहसूस किया
वह ढाई आखर .

- आस्था
जनवरी 20, 2002

  

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