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समय को तोड़ती है चीख

एक महीन चालाकी से काती जा रही है संवेदना
सबसब मूक बधिर से गिनते हुए घड़ियां
चुपचाप स्तब्ध खडे. हैं सिर झुकाए
तुर्रा ये कि फरी आवश्यक कार्रवाई में शामिल हैं
सब कुछ जाने कब तब्दील हो चुका एक श्रद्धांजलि सभा में
जो उन्हीं की मृत्यु की है
आत्महंता में उकसाहट लो चीखो रे
चीख सन्नाटे की नहीं समय को तोड़ती है
बल्कि समय को ही
समय का टूटना सन्नाटे का टूटना है
समय का जमना
सक्रियता पर नहीं आदमी पर हमला है
हमले के विरद्ध चीखना
हमलावर पर बड़ा हमला है
विरुद्ध होना अपने आपमें होना है
अपना होना है
होना है कम अज कम।

अभिज्ञात


 

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