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सात प्रेम कविताएं फिर कभी
मस्ज़िद में
अदा करनी है नमाज़
पढ़ने है वेद मंदिरों में
पाताल लोक में उतरना है
स्वर्ग में लगानी है छलांग
साफ़ करनी है
मुल्ला जी की ढाढ़ी में से तिनके
और पण्डित जी की जनेऊ पर जमीं मैंल
आख़री बच्चे का पेट
दूध से भरना है
फ़सल पर करना है छिड़काव
कीटनाश
को का
इस जर्जराती हुई व्यवस्था के ख़िलाफ
लिखनी है तमाम कविताएँ
फिर कभी बैठेंगे फु.र्सत में
पलाश के नीचे
तुम अंगूठे से कुरेदना धरती
मैं तोड़ूंगा नर्म घास की फुनगियाँ।

जिन्दा रहने के लिये
किसी मज़दूर के घर
शाम को बनती हुई
मोटी रोटियों के प्रति
उसके दिन भर के भूखे
बच्चे की चाह की तरह
मैं चाहता हूँ
तुम्हें।
धान और गेंहूँ के साथ–साथ
तुमको भी रोपकर
अपने खेत में
मैं जता देना चाहता हूँ लोगों को
कि तुम भी
रोटी की तरह ज़रूरी हो
ज़िन्दा रहने के लिये।

मैं और तुम
मैं रोपूंगा
धान का नन्हा पौधा
तुम सहला–सहलाकर
खड़ी करना फ़सल
मैं रोपूंगा
गुलाब की कलम
तुम तैयार करना फुलवारी
मैं गढ़ूंगा दो पहिये चार पाँव
तुम बुहारना पगडंडियाँ
न मैं थकूंगा रोपते–गढ़ते
न तुम थकना सहलाते–सवाँरते
हमें साथ–साथ चलना है
ड्योढ़ी से क्षितिज तक।

सात–सात जनम
हाड़–तोड़ मेहनत कर
जब पस्त हो लौटते घर
मिलतीं हँसती – विहँसती
उतर जाती सारी थकान
रोंसतीं नमक–रोटी
इतनी आत्मीयता से
आए छप्पन भोग का स्वाद
प्रेम करतीं तो इतना लम्बा कि
गुजर जाए सात–सात जनम
इतना लम्बा प्रेम सिर्फ
पत्नियॉं ही कर सकतीं हैं ।

 


   
 
        

 


कनुप्रिया
एक अदना सा मन
ढुलक कर ठहर गया है
तुम्हारी ओट में
तुम्हारी नज़रें टहलने लगीं हैं
रसोई से बैठक तक
बैठक से अटारी तक
ओट झरोखे खोजती हु
सपने पसर गये हैं
अन्तरिक्ष से अन्तस तक
पलकें सीखती जा रही हैं
दिन–प्रतिदिन अदब
एक चाहा क्षण देखने के लिये
तुम्हारा घंटों अनचाहा देखना
मुझे आतंकित करता है कनुप्रिया !
कहीं ठहरा हुआ अदना
सुगबुगाने तो नहीं लगा है
तुम्हारी ममतामई छाँव में।


खिड़कियाँ
खिड़कियाँ
सिर्फ खुलती और बन्द नहीं होतीं
बल्कि रिश्ता जोड़तीं हैं
एक मकान से दूसरे का
नजर रखतीं हैं
सडकों से गलियों तक
बनते–बिगड़ते रिश्तों पर
खुली खिड़की वाले मकान
जरूरत हैं मुहल्ले की
खिड़कियाँ चाहे जितनी छोटीं हो
इनका खुलना ही बहुत है ।

करोगी तुम प्यार
पेड़–पौधो से
करोगी तुम प्यार
और वे विफल कर देंगें
प्रदूषण का षडयन्त्र
समन्दर से
करोगी तुम प्यार
और मीठा लगने लगेगा उसका पानी
घर से
करोगी तुम प्यार
भूलकर अपने सारे दुःख
खुशहाल हो जाएगा घर
बच्चों से
रोगी तुम प्यार
और वे भविष्य की भयावहता से
घबराऐंगे नहीं
मुझसे
रोगी तुम प्यार
और मैं फैलकर व्योम हो जाऊंगा ।

-प्रदीप मिश्र
 

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