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हाइक
बिना धुरी के
चल रही है चक्की
पिसेंगे सब ।
कुछ कम हो
शायद ये कुहासा
यही प्रत्याशा ।
चींटी बने हो
रौंदे तो जओगे ही
रोना धोना क्यों ।
उगने लगे
कंकरीट के बन
उदास मन ।

(नवगीत)

पीपल की छाँव निर्वासित हुई है
र पनघट को मिला वनवास
फिर भी मत हो बटोही उदास।
प्रात की प्रभाती लाती हादसों की पाती
उषा किरन आकर सिन्दूर पौंछ जाती
दानौ की टो में भटकती गौरैया का
खण्डित हुआ विश्वास।
फिर भी मत हो बटोही उदास।।

अभिशापित चकवी का रात भर अहँकना
मोरों का मेघों की चाह में कुहकना
कोकिल का कुंठित कलेजा कराह उठा
कुहु–कुहु का संत्रास।
फिर भी मत हो बटोही उदास।।

सूखी–सूखी

कोपले हैं आम नहीं बौरे
खुलेआम घूम रहे बदचलनी भौंरे
माली ने दो घूँट मदिरा की खातिर
गिरवीं रखा मधुमास।
फिर भी मत हो बटोही उदास।।

सृष्टि ने ये कैसा अभिशप्त बीज बोया
’व्योम‘ की व्यथा को निरख इन्द्रधनुष रोया
प्यासो को दें अँजुरी भर न पानी
भगीरथ का करें उपहास।
फिर भी मत हो बटोही उदास।।

माना कि अंत हो गया है वसन्त का
संभव है पतझर यही  वस अन्त का
सारंग न ढ़ उदासी की चादर
लौटेगा मधुमास।
फिर क्योहोता बटोही उदास।।
अब मत हो तू बटोही उदास।।

 

नववर्ष
नव वर्ष के
नव भोर की
नव रश्मियां
नव प्रेरणा देवें सदा
नव सृजन की
सत् सृजन की
ऐसी हमारी कामना
नव वर्ष की शुभकामना ।

–डा0 जगदीश व्योम

आहत युगबौध के

आहत युगबौध के जीवंत ये नियम
यू ही बदनाम हुए हम।
मन की अनुगूँज ने वॆधव्य ववेष धार लिया
काँपती अँगुलियोने स्वर का सिंगार किया
अवचेतन मन उदास
पायी है अबुझ प्यास
त्रासदी के नाम हुए हम।
यू ही बदनाम हुए हम।।
अलसायी कामनाएँ चढ़ने लगी सीढ़ियाँ
टूटे अनुबंध जिन्हें ढ रही थीं पीढ़ियाँ
वॆभव की लालसा ने
ललचाया मन पाँखी
संज्ञा से आज सर्वनाम हुए हम।
यू ही बदनाम हुए हम।।
दुःख नहीं तो सुख कैसा‚ सुख नहीं तो दुःख कैसा
सुख है तो दुःख भी है‚ दुःख है तो सुख भी है
दुख–सुख का अजब संग
अजब रंग‚ अजब ढंग
दुःख तो है सुख की विजय का परचम।
यू ही बदनाम हुए हम।।
कविता के अक्षरो में व्याकुल मन पीड़ा है
उनके लिए तो कविकर्म शब्द क्रीड़ा है
शोषित बन जीते हैं
नित्य गरल पीते हैं
युग की विभीषिका के नाम हुए हम।
यू ही बदनाम हुए हम।।
युग क्या पहचाने हम कलम के फकीरोको
हम तो बदल देते युग की लकीरोको
धरती जब माँगती है विषपायी कंठ‚ तब
कभी शिव‚ मीरा‚ घनश्याम हुए हम।
यू ही बदनाम हुए हम।।
व्योम गुनगुनाया जब अन्तस अकुलाया है
खड़ा हुआ कठघरे मे खुद को भी पाया है
हम भी तो शोषक हैं
युग के उद्घघोषक हैं
घोड़ा हैं हम ही‚ लगाम हुए हम।
यू ही बदनाम हुए हम।।

–डा0 जगदीश व्योम


 

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