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आहूति
हो जाता है ज़रूरी पुर्नजन्म
जब जीवन में हों कुल पांच वर्ष
लोग इस जीवन में करते हैं सुकर्म
कि और अच्छा हो अगला जीवन
कुछ लोग धर्म की शरण में जाते हैं
कुछ लोग अधर्म की शरण में जाते हैं
मेवा सब पाते हैं
दीनबन्धु से प्रार्थना करते हैं
कि वे अगले जनम में भी सेवा करें
पूजा में‚ यज्ञ में भी होता है होम
यज्ञ की वेदी में
सती ने किया था अपना होम
जब भरी सभा में
पिता दक्ष ने किया था
उनके मूल्यों का अपमान
रक्षक बनने लगे थे भक्षक
और किया था आरक्षण
कुंओं और मन्दिरों का
प्यास से तड़पते रहे हरिजन
वैश्यों ने‚ ब्राह्मणों ने
क्षत्रियों ने‚ शूद्रों ने
सत्य के फावड़ों से
अहिंसा की गिट्टियों से
प्रेम के सीमेन्ट से
नये रास्ते बनाना शुरु किये थे
विशाल बांध के मन्दिरों तक
लोक सभा के कुंए तक
खुशी में मारे लोग
चलना सीखने के बजाय
दौड़ने लगे
और गिरने भी लगे
उन अधबनी ऊबड़ – खाबड़ सड़कों पर
सीखने के बजाय
चोटों पर मरहम लगाने के लिये
फिर होना है आरक्षण
रोटियों और ओहदों का
मिट्टी के तेल में स्नान कर
लड़के
अपना होम कर रहे हैं
क्योंकि भरी लोक सभा में
अपमान
दक्षता का हुआ है
गण लोग
सब तरफ
विध्वंस कर रहे हैं
अरे यह कौन गिरा!
क्या शब्द हैं ये!
हे राम!हे राम!हे राम!

-विश्वमोहन तिवारी‚ पूर्व एयर वाईस मार्शल

कण तरंग
मैं एक व्यक्ति हूँ
एक अदद व्यक्ति
हैं मेरी सीमाएं
सीमाएं यही
मुझे देती हैं आकार
यदि मैं दूं यह सीमाएं लांघ
तब बढ़ेगा मेरा विस्तार
बनेगी एक अलग पहचान
मैं माना जाऊंगा महान
जब भी हृदयाकाश में
खोजता हूं अपना आप
ढूंढता हूँ पहचान
तब मुझे
अपना
नहीं दिखाई देता कोई आकार
कोई निश्चित बिन्दु
नहीं आता पकड़
बस सारे आकाश में
होता हूँ‚ मैं ही मैं
क्या ये पांच तत्त्व
हैं तरंग के रूप
ज्यों प्रकाश कण ' फोटोन '
है प्रकाश तरंग का रूप!

-विश्वमोहन तिवारी‚ पूर्व एयर वाईस मार्शल
 

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