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औरत
अश्क बरसाए तो सावन की झडी है औरत ।
मुस्कराए तो सितारों की लडी है औरत ।।

लुत्फ आता है वहां ये जहां हिलमिल के रहें ।
आदमी है जो पकोडा तो कढी है औरत ।।

आदमी जब इसे पाता है तो बन जाता है मर्द।
कोई टानिक कोई बूटी जडी है औरत ।।

सिर्फ औरत की ही हर बात चले जिस घर में ।
उसमें हर आदमी छोटा है बडी है औरत ।।

गैर की हो तो नहीं रूपमती से कुछ कम ।
और अपनी हो तो लगता है सडी है औरत ।।

सुबह होते ही वो बच्चों पे बरस पडती है ।
अपने घर में तो अलाराम घडी है औरत ।।

चाहे झांसी का किला हो के हो वो चिकमंगलूर ।
कोई मैदान हो मर्दो से लडी है औरत ।।

लोग इसे चांद से सूरज से हसीं कहते है ।
बावजूद इसके अंधेरे में पडी है औरत ।।

इसमें कुछघ्क नही सब कहते है 'हीरा' मुझको ।
पर मेरे दिल की अंगूठी में जडी है औरत ।।
 


-डॉ. हीरा इंदौरी

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