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कौन हो तुम
– हिन्दु‚ मुसलमान या

इन्सान आज किसीका सब कुछ लुट गया
आज कोइ रास्ते पर आ गया
आते जाते लोगों से देखा ना गया
उस मनुष्य से पुछा गया
कौन हो तुम…हिंदु मुसलमान या इनसान।
हिंदु हो तो मेरे साथ चलो
गर मुसलमान हो तो पड़े रहो
गर इन्सान हो तो डुब मरो।
आज किसीका पुरा परिवार मारा गया
उनको गोलियो से उड़ाया गया
आस पड़ोस के लोगों से देखा ना गया
उस मनुष्य से पुछा गया
कौन हो तुम…हिंदु मुसलमान या इनसान।
मुसलमान हो तो मैं तुम्हें मदत करूँगा
गर हिंदु हो तो खुदा कसम ना छोडुँगा
गर इन्सान हो तो पत्थर मारूँगा।
आज इक लड़की की इज्ज़त लूटी गयी
वह लड़की घर से निकाली गयी
किसी शरीफ औरत की उसपर नज़र पड़ गयी
वह उस लड़की से पुछने गयी…
कौन हो तुम…हिंदु मुसलमान या इनसान।
गर हिंदु हो तो देवदासी बन जाओ
गर मुसलमान हो तो तवायफ बन जाओ
मगर इन्सान हो तो मेरे साथ आओ
एक नये जीवन की शुरूवात करो

– आरती होनराव

मौसम

 

 

 

 

सचमुच आज मौसम बड़ा रंगीन है।
बादल छाये है. धूप कहीं गुम है.
हवा बह रही है. पंछी गा रहे हैं.
इक नयी हरियाली छायी है।
पत्ते मुस्कुरा रहे हैं.
कौन कहेगा ये मौसम.
मौसम ये बरसात का नहीं।
गरमी के मौसम में लगता है जैसे.
खो गयी है गरमी कहीं ।
आकाश में पंछी यूं पंख फैलाये हुए है.
जैसे मानो धरती का नाप ले रहे हो।
यूं ही बिना मक्सद.
आकाश की सैर कर रहे हों।
अर्भीअभी हवा का इक झोंका पत्तों को हिलाकर.
मुझे चूमकर चला गया.
जाते–जाते मेरे रोम रोम को महकाकर.
जैसे प्यार का संदेस दे गया।
अभी अचानक कहीं से.
इक डिब्बे के गिरने की आवाज़ आयी.
लगा मुझे यूं के बादलो की गड़गड़ाहट हुई।
मगर फिर जाना और समझा मैने
मौसम है, मौसम है ये गरमी का.
फिर भी आज फिज़ा में मस्ती है छायी।
आलम है ये अनजानी चाहत की खुशी का।
बादलों के पीछे छिपा सूरज़ …अब बाहर निकल आया है.
छा गयी है धूप मगर फिर भी –
पत्ते लहरा रहे हैं पंछी मुस्कुरा रहे हैं।
धूप है ये पर कड़कती धूप नहीं.
इस धूप में भी है छिपी शीतलता की छवि।
ना जाने क्यों आज ऐसा आलम है.
ना जाने क्यों मौसम लग रहा है रंगीन।

– आरती होनराव

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