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अनुत्तरित प्रश्न
सीता ने सतीत्व की ख़ातिर
मर्यादाओं मे रहते रहते
राम को मर्यादा पुरूषोत्तम बना दिया
राधा ने प्रीत की पीर सहते–सहते
कृष्ण को प्रेमसागर बना दिया
अहिल्या ने पतिव्रत्य की परीक्षा में
स्वयंम् को निर्जीव‚
निश्चल पाषाणी बना लिया
द्रौपदी ने पाण्डु–पुत्र की द्यूत लिप्सा में
स्वयंम् को सभा में निर्वसना बना दिया!
फिर भी सीता को धरित्री के अंक में
अपना पावन अस्तित्व खोना पड़ा
फिर राधा को भी चिर वियोग सहना पड़ा
फिर भी अहिल्या को
चरित्र लांछन सहना पड़ा!
आदि से अब तक
आख़िर कब तक?
सीता‚ राधा‚ अहिल्या‚ द्रौपदी को
सहते हुए
अपनी अस्मिता खोकर
एक प्रश्न चिन्ह बन कर
जीने को मोहताज होना होगा
आख़िर क्यों?
आख़िर कब तक?
सदियों से प्रश्न अनुत्तरित है …

– डा मिथिलेश शर्मा‚ कनेक्टीकट
जनवरी 15‚ 2001
आभार – हिन्दी जगत‚ न्यूयोर्क

 

अजनबी
अजनबी रास्तों पर
पैदल चलें
कुछ न कहें
अपनी अपनी तन्हाइयां लिये
सवालों के दायरों से निकलकर
रिवाज़ों की सरहदों के परे
हम यूं ही साथ चलते रहें
कुछ न कहें
चलो दूर तक
तुम अपने माज़ी का
कोई ज़िक्र न छेड़ो
मैं भूली हुई
कोई नज़्म न दोहराऊं
तुम कौन हो
मै क्या हूं
इन सब बातों को‚
बस रहने दें
चलो दूर तक
अजनबी रास्तों पर पैदल चलें

– दीप्ति नवल‚ मुम्बई
जनवरी 15‚ 2001
आभार – हिन्दी जगत‚ न्यूयोर्क

दो मुक्तक
1
किसी पेड़ पर टांग दो
अपनी निष्ठा‚ विश्वास‚ ईमानदारी
के अस्त्र–शस्त्र
चलते बनो
अज्ञातवास की ओर
ध्यान रहे इस युग में
इसकी कोई समय सीमा नहीं।
2
पैरों से जुते कन्धों की गाड़ी पर
हर इन्सान ढो रहा है अपनी ज़िन्दगी
स्वयं ही सवार है किस्मत के पथ पर
अपनी मिट्टी की गाड़ी पर
क्या पता वह कब टकरा जाये
उस समय के पत्थर से
जो उसे मंज़िल की दूरी नहीं
उम्र का हिसाब बता रहा हो
शायद बोझ समझ इसलिये वह ज़िन्दगी
अपनी मिट्टी की गाड़ी पर ढो रहा हो।

– अतुल शर्मा‚ लखनउ
जनवरी 15‚ 2001
आभार – हिन्दी जगत‚ न्यूयोर्क

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