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सबसे बड़े सेलिब्रिटी चाँद से प्रेम की कहानी
 
गरिमा दुबे

चाँद हमारा सबसे प्राचीन खिलौना ,किसी भी बच्चे की आँख में उभरने वाला पहला कौतुक । माँ की उंगली का इशारा आसमान में चमकने वाले गोले को जब मामा कहकर कोई गीत गुनगुनाता है तो बच्चे की आँख की पुतलियों में दो चाँद एक साथ झिलमिला उठते हैं । बच्चा चाहे कान्हा हो न हो , "मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहूँ" का भाव हर बालक के मन में जन्म ले लेता है । और अगर यह चाँद पूनम का चाँद हो तो इसका आकर्षण गुरुत्वाकर्षण को भी मात दे देता है । मन के कोमल मानस पर चाँद की पवित्र ,धवल, शीतल मदमाती छवि की मासूमियत ताउम्र ख़त्म नहीं होती । ये बात और है कि मन का भावराज्य उम्र के साथ साथ तर्क के जंजालों से घिर जाता है और चाँद हमारे मन का धूमिल होने लगता है । बड़े होते होते जान लिया था पृथ्वी और चाँद के बीच के गुरुत्वाकर्षण का रहस्य । वैज्ञानिकता ने बता दी थी चाँद की शुभ्र चाँदनी की असलियत, तो थोड़ी कठोरता से ही मन ने सोचा था "हूंह उधार की चमक पर इतना गुमान ", लेकिन मन तो मासूम होता है ना, तमाम वैज्ञानिक व्याख्याएं चाँद और चाँदनी के सम्मोहन को कम नहीं कर सकीं।

ये जो लूनार है ना यह मुझे हमेशा लूनाटिक बना देता है । इसकी लुनाई की ऐसी धमक है कि अब से कुछ बरस पहले तक हर पूनम का बेसब्री से इंतज़ार रहता था मुझे । ना ना तुम्हे देख कोई व्रत नहीं किये मैने, लेकिन व्रत करने वालों से कोई बैर भी नहीं है मेरा ,तुम सबके प्रिय हो । मैं अपने तरीके से तुम्हे प्रेम करती रहीं हूँ ,उन्होंने अपने प्रेम का साक्षी तुम्हे माना, अपने प्रेमी में तुम्हे देखा, मैने तुममे ही सब देख लिया । भेद तो केवल भाव का है न शशि, प्रेम तो दोनों ही को है तुमसे । तुम्हारा वैश्विक योगदान ही प्रेम है मेरे लिए, मैं किसी से तुम्हारी तुलना नहीं कर सकती, तुम तो तुम्हारी तरह के अकेले अनोखे हो ना, किसी को तुम जैसा बता मैं तुम्हारे अनोखे पन को ख़त्म नहीं करना चाहती ।

खैर, हर पूनम को तुम मेरे एक घर के सामने की मस्जिद की मीनार के ठीक ऊपर टंग जाते थे । उस पल का मैं बेसब्री से इंतज़ार करती थी । ऐसा लगता था कि पूरे आसमान पर झूला झूलते तुम धप्प से आकर मीनार के ऊपर विश्राम लेने ठहर जाते । मैं आपने कमरे की बत्ती बुझा बूंद बूंद चाँदनी को अपने अंदर और अपने कमरे में भर लेती थी, मेरे बिस्तर तक वह भर जाती थी और मैं चाँद के जितने गाने आते थे सब अपने बेसुरे स्वर में गाती थी । कभी मुझे लगता तुम मुस्कुराए और कभी लगता अपने अदृश्य हाथों से तुमने अपने कान बंद कर लिये हैं, मैं शरारत से तुम्हे मुँह चिढ़ा और जोर से गाने लगती । स्माइली और फोन के सारे एक्सप्रेशन तुम पर बहुत प्यारे लगेंगे चंदा मामा । तुम सबके कमरों में झांकते रहे हो विधु । सबकी तुम्हे ले कर अपनी अपनी कल्पनाएं हैं । क्या तुम कभी चकराते नही कि यह कौन है जो मुझे ले कर कविता कर रहा है, या सपने बुन रहा है । यह कौन है जिसे मेरी चाँदनी शीतल लग रही है, किसके लंबे विरह का अंत है और चाँद शीतलता दे रहा है, वहीं चाँद किसी के विरह की तीव्रता बढ़ा रहा है और उसे दग्ध कर रहा है । केमेरा नही था उन दिनों मेरे पास वरना तुम्हारी वो तस्वीर अवार्ड विनिंग होती और आज मैं वहाँ होती तो मेरे फेसबुक पर तुम्हारी तस्वीर डाल ढेरों लाइक्स बटोरती, तुम तो अब भी वहाँ आते होंगे लेकिन मैं वहाँ नहीं हूँ । या कि एक दूसरे घर के सामने के पीपल के बीच तुम्हारी छवि, ओह अद्भुत, पीपल के हर पत्ते से झरती चाँदनी और हरे पीपल को धीरे धीरे श्वेत में तब्दील होते देखना, और तिस पर उस पेड़ पर किसी मयूर की मौजूदगी कैसा महारास सा सौन्दर्य ही रच देती थी । ओह कैसा अद्भुद दृश्य होता था वो जब मयूर के पंखों के रंग चाँदनी को परावर्तित कर रात में ही दिव्य इंद्रधनुष रच देते थे । धवल चाँदनी से भीगी सी मैं उस सौन्दर्य को पीती रहती । वह दृश्य याद कर आज भी रोमांचित होती हूँ। तुम्हारे प्रेम का आलम यह था कि केवल शरद पूर्णिमा को नहीं हर पूर्णिमा को अपने दूध का गिलास तुम्हारी रोशनी में रख पीती थी । मेरे दिमाग में विज्ञान और कला के ऐसे अनोखे मिश्रण को देख मैं खुद ही अपने पर मुग्ध हो जाती ।

विज्ञान के विद्यार्थी के लिए चंदा सूत कातती बुढ़िया का घर, स्नेहिल मामा, प्रजापति के जामाता, राजयक्ष्मा के रोगी, अहिल्या के शील भंग के साक्षी होने का कलंक लिए, अवढर दानी के सर लग उनके चंद्रमौलि होने का गर्व लिए, दुनिया भर को अपने रूप से लुभाने वाली शै क्योंकर होने लगी, उसके लिए तो चाँद उबड़ खाबड़ क्रेटर वाला, जिस पर नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने अमेरिका का झंडा फहराया हो वैसा एक रूखा सूखा ग्रह ही होना चाहिए ना, लेकिन क्या करूँ चंदा प्यारे ,तुम तो मुझे कभी रूखे सूखे ग्रह लगे ही नहीं । जब पढ़ा कि चंद्रमा पर जल की खोज हो रही है और जल के केवल चिन्ह मिले, जल नहीं, तो मन बुझ सा गया, जल का कारक ग्रह और उसपर जल नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है । लेकिन मन कहता है तुमने अपनी सोलह कलाओं में से एक कला से कहीं अपने जल तत्व को अदृश्य कर रखा होगा । जब इस धरती का पूरा जल ख़त्म हो जाएगा तब तुम वो सारे स्त्रोत प्रकट कर अपनी बहन (धरती)के बच्चों को शरण दोगे, मामा हो न, अंतिम शरण स्थली । तुमने ही तो मामा शब्द की गरिमा रखी है, कंस और शकुनि से इतर, कल्याणकारी । इसलिए सोचती अमृत की बूंदे तो हर पूर्णिमा पर गिरती होंगी सो हर पूर्णिमा और दूध का गिलास , लेकिन चंद्र मेरी आँखों की रोशनी तेज नही हुई, कुंडली के नीच राशि सूर्य का प्रभाव चाँद की शीतलता से परास्त नहीं हुआ । लेकिन मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं तुम प्रबल हो तो किसी को तो निर्बल होना था सूरज यहाँ निर्बल साबित हुआ है । तुम दुनिया के सबसे बड़े सेलिब्रिटी हो । अक्सर सोचती कितने वाट का बल्ब तुम्हारी चाँदनी से होड़ ले सकता है । उत्तर संभव ही नहीं । इतनी ऊपर ऐसा कैसा बल्ब है यह चंदा जो ऐसी रोशनी फैलाता है, मदमाती सी ।
बचपन से चश्में से संसार को देखने की आदि आँखों का तेज तो क्या नापती मैं इसलिए अपने चश्में का नंबर ही तुम्हारी रौशनी में सुईं में धागा डालकर जांच लिया करती थी । याद है एक बार बड़े जतन से बनाई खीर को छत पर रख हम दोनो माँ बेटी बात करते करते वहीं सो गईं थी तो घात लगाये बैठी एक चतुर बिल्ली ने शरद के अमृतमयी मिष्ठान्न का भोग लगा लिया था । बहुत खीजी थी हम दोनो, रुआंसी भी हो गईं थी मैं कुछ ज्यादा, तुम्हारा मेरा दोस्ताना जो था तो शिकायत भी की तुमसे ,"कोई इशारा देते नहीं बना तुम्हे, तनिक हौले से हिला ही देते, या शोर मचा देते तो उस अमृत मिष्ठान्न के हम भी अधिकारी हो पाते" । पता है कई दिनों तक वह बिल्ली मुझे बड़ी प्यारी प्यारी सी लगी । उसके खूंखार चेहरे में भी मानो तुम्हारी रंगत उतर आई थी शीतांशु ।
जो तुम न होते शशांक तो क्या होता कवियों की कल्पनाओं का ?
कवि त्रिलोचन कहते हैं ना "अगर चाँद मर जाता
झर जाते तारे सब क्या करते कविगण तब? क्या होता प्रेमियों के तप्त हृदय का ? साहित्य और प्रेम का तो बड़ा घाटा हो जाता । किसे देख प्रेमिका यह मानती कि इस चाँद को मेरा प्रेमी भी देख रहा होगा । एक ही वस्तु पर एक दूजे की नज़र की कल्पना मानो उन्हें एक दूजे को ही देख लेने का जो सुख देती रही है वैसे भावोउद्दीपन की क्षमता इस ब्रह्मांड की किसी और रचना में है भला ? चाँद में एक दूजे के होने का भाव क्या किसी और के लिए संभव है ?
चौदहवी हो या पूनम का चाँद उगते समय कांसे के बड़े से थाल सा जगमगाता चाँद शने शने ऊंचाई पर चढ़ते चढ़ते चाँदी की जगमगाती तश्तरी में, प्याली में तब्दील हो जाता है । ऊपर उठने के साथ भाव में वृद्धि का ऐसा संयोग कम होता है ।

बचपन में कभी तुम्हे पीछे छोड़ देती थी तो लगता था तुम मेरी साइकिल के कॅरियर पर बंधे गुब्बारे की तरह मेरे पीछे पीछे चले आ रहे हो । कभी तुमसे जीतने के चक्कर में अपनी साइकिल से गिर घुटने और कोहनियां छिलवाने का दर्द भी भोगा है । और तुम्हें खिलखिलाते मुँह चिढ़ाते आगे बढ़ते देख पत्थर मारकर तुम्हे चोटिल करने का पागलपन भी कर चुकी हूँ मैं । तुम्हे देखने पर लगने वाले कलंक के दिन, चतुर्थी पर जान बूझ कर तुम्हे घूर घूर कर देखती थी । यहाँ मेरा तार्किक वैज्ञानिक मन कहता देखूं कौन सा कलंक लगता है । और सोचती तुम्हारी तरह प्रतिष्ठा हो तो हजार कलंक भी स्वीकार्य होंगे मुझे । शिव के सिर पर तो नहीं शिव की चरणधूलि में ही प्रतिष्ठा हो जाये तो दाग अच्छे क्यों नहीं लगेंगें ?
बस या कार की खिड़की पर तुम्हारी नर्म मुलायम दस्तक की मैं आज भी मुरीद हूँ । तुम्हे देख आँखों ही आँखों में राते काटी जा सकती है । तुम तो वैसे भी नंगे पैर आसमान के मैदान में दौड़ लगाते रहते हो और तुम्हारी ज्योत्सना मानो तुम्हारे पैरों से निकल विष्णुपदी की तरह पूरे ब्रह्माण्ड को श्वेत धवल गंगा से पवित्र कर देती है ।

पूनम हो या महारास के दिन तो तुम्हारा सौन्दर्य अपने चरम पर होता है । हो भी क्यों न आत्मा से परमात्मा के मिलन के साक्षी को तो इसी तरह अपनी चमक बिखेरनी चाहिए । या कि जिसने आत्मा परमात्मा के अद्वैत को जान लिया हो उसकी आभा ऐसी ही दिव्य और शीतल होती होगी जैसी तुम्हारी है । तुम तब भी थे शशी जब इस धरा पर जीवन नही था । महासृजन के महारास की बेला पर भी तुम उपस्थित थे, महाविनाश के समय भी तुम होंगे । चिरकाल से हर परिवर्तन के अनंत साक्षी हे मृगांक, इन दिनों के बदलाव तुमने भी सूंघ लिये हैं कि नही? बड़ी बड़ी अट्टालिकाओं कर भारी भरकम परदों पर तुम दस्तक देते हो लेकिन तुम्हे देखने की फुरसत किसी को नही मिलती । मिलती भी है तो बड़ी बड़ी अट्टालिकाओं के बीच खंड खंड तुम्हारा व्यक्तित्व अब भाव सरोवर में वैसी हलचल नही जगाता । न न दोष तुम्हारा नहीं है । तुम्हारी कुमुदिनी में तो अब भी भावनाओं के ज्वार ,भाटे लाने की शक्ति है पर लगता है धरती और धरती पुत्रों में ही जल तत्व कम हो चला है । जल ही न हो तो कैसा ज्वार और कैसा भाटा ? कभी जो तुम्हे पूरा पूरा देखती हूँ तो लगता है तुम उलाहना दे रहे हो । दौड़ते तो तुम अब भी हो मेरे पीछे, आगे , साथ साथ खींच खींच कर मुझे याद दिलाते हो पर मुझे ही अवकाश नही कि तुमसे बैठ कर बातें कर सकूं ।

लेकिन अब नहीं । इस पूनम पर तुम आना । ओह, कैसी मूर्ख हूँ मैं, तुम तो आओगे ही, इंसान थोड़ी हो जो अपना व्यवहार बदल दो । आना तो मुझे होगा ना । नहीं नहीं मैं आऊंगी और ढेर सी बातें करेंगें हम । बसंत का चाँद हो या शरद का तुम तो अपनी पूरी आभा से रोज आते हो अब मैं आऊंगी तुम तक, मुझे चाँद चाहिए मेरा वही चंद्र खिलौना जो था तो वहीं जहाँ वह होता है बस मैं ही उसे नही देख पाती थी ।

पहले भी और आज भी मन करता है तुम्हारे पास चली आऊँ । कहते हैं कि चाँद पर मेरे वजन का एक बटा छः भार रह जायेगा । कितना अच्छा वजन की समस्या नहीं | खैर, सारे भारी शरीर वालों को चाँद पर भेज दो हल्के हो जाएंगे , लेकिन क्या भारी मन भी हल्के होतें हैं तुम्हारे यहाँ ? अपने अनगिनत कषाय कल्मषों का बोझ ढोते अहंकारी मन भी रुईं के फाहों से हल्के हो परिष्कृत हो हवा में उड़ पाते होंगें ?

चलते चलते एक बात और । तुम्हे देख कितनी ठंडक मिलती है तप्त मानस को सारंग, ज्यों मानो तपते मस्तक पर शीतल जल की बूंदें डाल दी हो किसी ने । लेकिन आजकल तो सब सूरज बन अपनी चमक से सबकी आँखे चुंधिया देने की जुगत में लगें हैं । अपनी तपन से सबको जलाने की तैयारी ही सफलता है । चाँद सी शीतलता और सौम्यता तो कमजोरी मानी जाने लगी है । तुम्हे पता है तप्त धधकते चेहरों पर खींची हुई अहंकार की गर्म लकीरें आज का सच है । आँखों से निकलते अंगारे दूजे को भस्म करने पर आमादा है । चेहरे और आँखों से टपकती मन की शुभ्र धवल शीतल चाँदनी अब कहीं नज़र नहीं आती । नरम मखमली मुलायम मासूम जूनहाई तो अब बच्चों के मुख पर भी नहीं है । तो क्या हुआ तुम तो हो ना प्यारे चाँद, तुम न जाना ठहर जाना ।

तुम्हारे इस मारक संयोग की इस धरती को बहुत ज़रुरत है | कहतें है अलनीनो ने वातावरण में गरमी बढ़ा दी है । वो तो मैं नही जानती लेकिन इस गोले के इंसानी मन और मष्तिष्क की गर्मी ने बहुत उछाल मारा है और उसकी आँच में हर रिश्ता हर भाव झुलस गया है । इस धरती को तुम्हारी शीतलता की बेहद ज़रूरत है । खूब बढ़ाओ अपना गुरुत्वाकर्षण, इतना कि सूखे से सूखे मन के किसी कोने में एक बूंद भी जल बाकी हो तो वह प्रेम के समंदर में तब्दील हो जाये । और उसकी ऊंची ऊंची लहरे ठाठे मार मार कर हर किसी को प्रेम से भिगो दें। । इतनी जल्दी न छुप जाना अपनी कोमलता सौम्यता थोड़ी थोड़ी सबको देते जाना हिमांशु ।

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